गोरखा सैनिकों की भर्ती के मुद्दे पर भारत के नेपाल से 'बातचीत न करने' की वजह क्या है?

    • Author, फणींद्र दाहाल
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़ नेपाली
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

गोरखा भर्ती के मुद्दे को लेकर जटिलता तब साफ़ हो गई जब भारतीय सेना के एक रिटायर्ड सीनियर अफ़सर ने कहा कि भारत ख़ुद नेपाल के साथ इसका मुद्दा नहीं उठाएगा. उनका कहना है कि "यह मुद्दा अब नेपाल की अपनाई गई नीति पर निर्भर करता है."

नेपाल ने भारतीय सेना में गोरखाओं की भर्ती रोक दी थी, क्योंकि उसने भर्ती प्रक्रिया पर असहमति जताई थी जिसमें नेपाली नागरिक भी शामिल थे.

यह असहमति तब सामने आई जब भारत ने पांच साल पहले भारतीय सेना में नए सैनिकों की भर्ती प्रक्रिया के लिए 'अग्निपथ योजना' लागू की थी.

लगभग डेढ़ महीने पहले बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कहा था कि वो भारतीय सेना में गोरखाओं की भर्ती को लेकर नेपाल, ब्रिटेन और भारत के बीच हुए त्रिपक्षीय समझौते के प्रति प्रतिबद्ध हैं.

उन्होंने कहा था कि अगर संधि की समीक्षा करने की आवश्यकता हो और भारत से कोई औपचारिक प्रस्ताव प्राप्त हो तो नेपाल इस पर चर्चा करने के लिए तैयार है.

नेपाल में पूर्व भारतीय गोरखा सैनिकों के कई संगठनों ने सरकार से भारतीय गोरखा सेना में नेपाल के नागरिकों की भर्ती शुरू करने की मांग की है.

इस संबंध में पिछले शनिवार को भारतीय सेना के पूर्व सीडीएस अनिल चौहान ने कहा कि जब अग्निवीर योजना लागू की गई थी, तब नेपाली गोरखाओं को भी भारतीय नागरिकों की तरह माना गया था.

उनका कहना है कि यह संभव नहीं है कि नेपाली नागरिकों के साथ एक तरह का और भारतीयों के साथ दूसरे तरह का व्यवहार किया जाए.

यह मुद्दा अब क्यों उठा है?

भारतीय ऑनलाइन मीडिया आउटलेट प्रिंट को दिए एक साक्षात्कार में पूर्व सीडीएस चौहान ने कहा कि अग्निपथ योजना के तहत अपने नागरिकों को नामांकन करने की अनुमति देने का निर्णय अब नेपाल पर निर्भर करता है.

भारतीय सेना के सेवानिवृत्त मेजर जनरल अशोक मेहता का कहना है कि इस मुद्दे पर अब भारत को "कुछ नहीं" होने की उम्मीद है.

उन्होंने बताया कि चौहान, जिन्होंने भारतीय सेना की 11वीं गोरखा रेजिमेंट में लंबे समय तक सेवा की थी, जब वो सीडीएस थे तब उनके भी ऐसे ही विचार थे.

उन्होंने कहा, "भारत इस मुद्दे को (नेपाल के साथ) नहीं उठाएगा. इसीलिए पूर्व सीडीएस ने ऐसा कहा था. यह एक ऐसा मुद्दा है जिसे नेपाल को उठाना चाहिए क्योंकि तकनीकी और कानूनी रूप से भारत ने कुछ भी गलत नहीं किया है."

"लेकिन रणनीतिक स्तर पर और मित्र देशों के साथ संबंधों के संदर्भ में, मैंने हमेशा कहा है कि भारत को नेपाल से परामर्श करना चाहिए था या कम से कम हमें सूचित करना चाहिए था कि हम ऐसा करने जा रहे हैं."

तत्कालीन ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1815 में पहली बार गोरखाओं की भर्ती शुरू की थी. यह मुद्दा 1947 में तत्कालीन नेपाल, ब्रिटेन और भारत के बीच हुए एक त्रिपक्षीय समझौते से प्रेरित था.

भारत की स्वतंत्रता के समय छह गोरखा रेजिमेंट भारतीय सेना का हिस्सा बन गईं, जबकि चार इकाइयों को ब्रिटेन को स्थानांतरित कर दिया गया.

द प्रिंट से बात करते हुए चौहान ने कहा कि भारत, ब्रिटेन और नेपाल के बीच हुए त्रिपक्षीय समझौते की शर्तों का अभी भी सम्मान किया जा रहा है.

उन्होंने कहा, "उन्होंने कहा था कि इस सेवा में नेपाली सैनिकों के लिए भी ऐसी ही शर्तें होंगी. यह उस समय ब्रिटिश सरकार द्वारा निर्धारित शर्त थी. यही वादा था."

"इसीलिए उन्हें समान वेतन और समान पेंशन मिल रही है. हमने समझौते के तहत अपने दायित्वों को पूरा किया है."

सरकार का इस बारे में क्या कहना है?

भारत ने अग्निवीर योजना के तहत भर्ती किए गए सैनिकों में से केवल एक चौथाई को ही चार साल की सैन्य सेवा के बाद देश की सैन्य सेवा में बने रहने की अनुमति देने की नीति अपनाई है. बाकी बचे सैनिकों को रिटायरमेंट के समय दस लाख भारतीय रुपये से अधिक का विच्छेद पैकेज दिया जाता है.

भारत के एकतरफा फैसले का हवाला देते हुए नेपाल ने गोरखा सेना में अपने नागरिकों की भर्ती रोक दी थी. पिछली सरकारों का मानना ​​था कि सशस्त्र संघर्ष से गुज़र चुके नेपाल के लिए भारत में युवा सैन्य प्रशिक्षित सैनिकों का प्रबंधन करना एक चुनौती हो सकता है.

भारतीय सेना के पूर्व मेजर जनरल अशोक मेहता को गोरखा रेजिमेंट के अन्य सेवानिवृत्त अधिकारियों के साथ तत्कालीन सीडीएस चौहान के साथ हुई उस चर्चा की याद है, जिसमें उन्होंने भारतीय सेना में नेपालियों की भर्ती फिर से शुरू करने के बारे में बात की थी.

उनका कहना है कि इसीलिए उन्हें लगा कि इस मुद्दे को सैन्य स्तर के बजाय राजनीतिक स्तर पर आगे बढ़ाना आवश्यक है.

"उन्होंने कहा कि यह भारत के प्रधानमंत्री द्वारा लिया गया एक राजनीतिक निर्णय था. हमने कहा कि आपको प्रधानमंत्री से बात करनी चाहिए, लेकिन उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि अब गेंद नेपाल के पाले में है."

उन्होंने कहा कि भारत में अग्निवीर कार्यक्रम लागू होने के बाद से नेपाल और भारत दोनों ही गोरखा भर्ती के मुद्दे पर 'चुप' हैं. उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने नेपाल का दौरा किया था और अधिकारियों को कुछ सुझाव भी दिए थे.

मेहता ने कहा, "केंद्रीय पुलिस रिज़र्व फोर्स में चार साल बाद सेवानिवृत्त होने वालों के लिए आरक्षण का प्रावधान है. लेकिन नेपाल के लोगों के मामले में इसकी अनुमति नहीं है. मैं काठमांडू आया था और नेपाल के तत्कालीन विदेश सचिव से मिला था और उन्हें सुझाव दिया था कि वे इस दिशा में पहल करें."

नेपाली अधिकारियों का कहना है कि गोरखाओं की भर्ती के संबंध में भारत के साथ कोई औपचारिक बातचीत नहीं हुई है.

पिछले महीने बीबीसी को दिए एक साक्षात्कार में विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कहा था कि भारत यात्रा के दौरान इस मुद्दे पर कोई चर्चा नहीं हुई.

उन्होंने कहा, "सत्ता में आने के बाद से भारत ने औपचारिक रूप से इस मुद्दे को नहीं उठाया है. हमारा वर्तमान मत यह है कि यह प्रक्रिया संधि समझौते के आधार पर आगे बढ़ रही थी. हम दोनों पक्षों के बीच हुई संधि के प्रति प्रतिबद्ध हैं."

"अगर इसकी समीक्षा के लिए कोई औपचारिक प्रस्ताव आता है, तो हम इस पर चर्चा करने के लिए तैयार हैं."

लामजुंग में प्रदर्शन से क्या संकेत मिलते हैं?

इस महीने लामजुंग ज़िले में पूर्व भारतीय गोरखा सैनिकों ने विरोध प्रदर्शन किया और मांग की कि नेपाली सरकार अग्निपथ योजना के अनुसार नेपालियों की भर्ती की अनुमति देने के लिए राजनयिक पहल करे, क्योंकि गोरखा भर्ती को लेकर गतिरोध का कोई समाधान नहीं निकला है.

उन्होंने मुख्य ज़िला अधिकारी के माध्यम से प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह को 11 सूत्रीय मांग पत्र सौंपा है. राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के सांसद के माध्यम से विदेश मंत्री शिशिर खनाल और राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के अध्यक्ष रबी लामिछाने के साथ उनकी बैठक के समन्वय का अनुरोध किया है.

लामजुंग भारतीय पूर्व सैनिक विकास समिति के सलाहकार, सेवानिवृत्त सूबेदार मेजर खेमजोंग गुरुंग ने बीबीसी को बताया, "त्रिपक्षीय समझौते के अनुसार नामांकन किया गया था. यदि इसे रोका या रद्द किया जाना था, तो इसे जारी रखना आवश्यक था. यदि ऐसा नहीं किया जा सकता, तो हमें नामांकन के लिए अग्निपथ जाने की अनुमति दी जानी चाहिए."

उन्होंने कहा कि देश के भीतर रोज़गार के अवसर सृजित नहीं हुए हैं और उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि रोज़गार के अवसरों को अब रोका नहीं जाएगा.

"हमने अपनी ताक़त का प्रदर्शन किया है. हमने एक हल्की चेतावनी भी दी है कि अगर सरकार ऐसा करना जारी रखती है, चुप रहती है, हमारी बात नहीं सुनती है और भर्ती शुरू नहीं करती है, तो हम सड़कों पर भी उतर सकते हैं."

संगठन के दिए ज्ञापन में कहा गया है कि अगर केवल 25 प्रतिशत युवाओं को स्थायी रोज़गार मिल जाता है, तो रोज़गार के अवसर तेज़ी से खुलेंगे और सैन्य सेवा प्रमाण पत्र प्राप्त करने वाले युवाओं के लिए विदेश में रोज़गार खोजना आसान हो जाएगा.

नेपाल में विभिन्न वामपंथी दल समय-समय पर विदेशी सेनाओं में नेपाली नागरिकों को 'किराए के सैनिकों' के रूप में भेजे जाने के ख़िलाफ आवाज़ उठाते रहे हैं. हालांकि, सत्ता में रहते हुए इस मुद्दे पर चुप्पी साधने और ऐसे सैनिकों के अधिकारों के लिए आवाज़ न उठाने के लिए भी उनकी आलोचना की जाती है.

भारतीय सेना में गोरखाओं की भर्ती जारी रखने के पक्ष में कुछ विश्लेषकों का तर्क है कि दो शताब्दियों से चली आ रही इस परंपरा को जारी रखने से दोनों देशों के बीच राजनयिक और जन-संबंध मज़बूत होंगे.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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