संसद में पेश होंगे कई अहम बिल, विपक्ष की इस मांग पर सदन में हो सकता है भारी हंगामा

प्रकाशित
पढ़ने का समय: 7 मिनट

संसद के मॉनसून सत्र के अंतिम सप्ताह की कार्यवाही आज शुरू होगी. सत्र के अंतिम तीन दिनों में जिन विधेयकों पर चर्चा और इनके पारित होने की संभावना है, वे पहले से ही राजनीतिक विवाद और वैचारिक बहस के केंद्र में आ चुके हैं.

यही वजह है कि कांग्रेस ने अपने सांसदों को व्हिप जारी कर संसद में मौजूद रहने को कहा है और इंडिया गठबंधन के सहयोगी दलों से भी पूरी उपस्थिति सुनिश्चित करने का आग्रह किया गया है.

सबसे ज़्यादा चर्चा विदेशी चंदे के नियमों में बदलाव से जुड़े बिल की है, जिस पर अमेरिका तक में विरोध की आवाज़ उठी है.

साथ ही सरकार उच्च शिक्षा क्षेत्र के पुनर्गठन, वंदे मातरम् को कानूनी संरक्षण और ट्रिब्यूनल सुधार जैसे महत्वपूर्ण बिलों को आगे बढ़ाना चाहती है, इन पर पहले से विपक्ष सवाल उठा रहा है.

मॉनसून सत्र के पहले दो सप्ताह के भीतर यानी 20 जुलाई से सात अगस्त के बीच संसद के निचले सदन में छह बिल और ऊपरी सदन में दो बिल पास हुए हैं.

इन बिलों को लेकर विपक्षी दलों ने सरकार पर बिना किसी चर्चा के बिल पास कराने का आरोप लगाया है. वहीं, सरकार का कहना है कि विपक्ष चर्चा में भाग लेने के बजाय हंगामे की राजनीति कर रहा है.

भास्कर समूह के पूर्व राष्ट्रीय राजनीतिक संपादक हेमंत अत्री का कहना है कि "सरकार जिस तरीके से पिछले दो सप्ताह में बिना चर्चा कराए कुछ मिनटों में बिल पास करा चुकी है और अगले तीन दिनों में जो बिल पास कराना चाहती है, उससे यही समझ में आता है कि वो अपने रुख में कोई बदलाव नहीं ला रहे हैं. या कहें कि उन्होंने हाल में हुए युवा आंदोलन के बाद भी अपने तेवर न बदलने की ठान ली है. यही वजह है कि यह स्टैंडऑफ़ सदन में आगे भी बना रहेगा."

वहीं, राजनीतिक विशेषज्ञ शरद गुप्ता कहते हैं, "एफ़सीआरए, वंदे मातरम का सम्मान जैसे बिलों को सदन में पेश करके मोदी सरकार एक बार फिर नब्ज़ टटोलने की कोशिश करेगी, जैसे कोई पानी में पत्थर मारकर देखना चाहता है, सरकार ऐसे ही समय-समय पर अपने राजनीतिक एजेंडा से जुड़े विधेयकों को संसद में रखकर रुख़ आज़माने की कोशिश करती है, ऐसा पहले भी देखा गया है."

साथ ही वह कहते हैं कि विपक्ष के पास हंगामा करके अपनी बात रखने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह गया है.

एफ़सीआरए संशोधन बिल: देश के भीतर और बाहर दोनों जगह विवाद

एफ़सीआरए (विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम) संशोधन विधेयक को इसी साल मार्च में लोकसभा में पेश किया गया था, अब इसे 12 अगस्त को चर्चा और पारित होने के लिए लाया जा सकता है.

यह क़ानून एनजीओ, शिक्षण संस्थानों, सामाजिक संगठनों और धार्मिक संस्थाओं को विदेश से मिलने वाले चंदे को नियंत्रित करता है.

सरकार का कहना है कि इन बदलावों का मक़सद कानून को अधिक व्यावहारिक और सरल बनाना है. प्रस्तावित संशोधनों के तहत, यदि किसी संस्था का एफ़सीआरए पंजीकरण खत्म हो जाता है, तो उसके विदेशी फंड और संपत्तियों का प्रबंधन कैसे होगा, इसके लिए नए नियम बनाए जाएंगे.

साथ ही, कानून के उल्लंघन पर अधिकतम सज़ा को पांच साल से घटाकर एक साल करने का प्रस्ताव भी रखा गया है.

विपक्षी दल बनाएंगे विरोध की रणनीति - कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि विपक्ष, इस विधेयक का विरोध करने और उसे रोकने की रणनीति बना रहा है और इस संबंध में अंतिम फैसला सोमवार को फ़्लोर लीडर्स की बैठक में लिया जाएगा.

एनसीपी-एसपी की वर्किंग प्रेसिडेंट सुप्रिया सुले ने कहा है कि या तो सरकार इस बिल को संयुक्त संसदीय कमेटी (जेसीपी) को भेजे या वापस ले.

इससे पहले तृणमूल कांग्रेस सांसद डेरेक ओ'ब्रायन ने पीएम मोदी को पत्र लिखकर कहा कि इससे एनजीओ, शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करने वाले संगठनों पर सरकार का नियंत्रण बढ़ सकता है.

डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन ने केंद्र सरकार से एफ़सीआरए संशोधन विधेयक वापस लेने और एफ़सीआरए कानून, 2010 की धारा 15 को रद्द करने की मांग की है.

वहीं, केरल के कैथोलिक चर्च और कई ईसाई संगठनों ने भी प्रस्तावित संशोधनों को लेकर चिंता जताई है. मिज़ोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा भी इस मुद्दे को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाक़ात कर चुके हैं.

अमेरिका में विरोध - इस विधेयक को लेकर विवाद केवल भारत तक सीमित नहीं है.

अमेरिका के सांसद राइली मूर ने प्रस्तावित संशोधनों को ईसाई समुदाय के खिलाफ़ कदम बताते हुए कहा कि इससे चर्चों और धार्मिक चैरिटी संस्थाओं पर सरकारी नियंत्रण बढ़ सकता है.

भारत सरकार ने इस आलोचना को ख़ारिज करते हुए साफ़ कहा है कि यह संसद के अधिकार क्षेत्र का विषय है.

हायर एजुकेशन बिल: उच्च शिक्षा की नई बॉडी बनाने पर विवाद

सरकार के एजेंडे में शामिल दूसरा अहम प्रस्ताव "विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025" है, जिसे उच्च शिक्षा से जुड़ा विधेयक भी कहा जा रहा है.

इस बिल को सरकार ने पिछले साल दिसंबर में संसद में पेश किया और विपक्ष के विरोध के बाद इसे जेपीसी को भेजने पर राज़ी हो गई थी. अब इस रिपोर्ट को लोकसभा में पेश किया जाना है, जिस पर हंगामे के आसार हैं.

सरकार इस विधेयक को उच्च शिक्षा में सुधार से जुड़ा बड़ा कदम बताती आई है. इसका मकसद विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) जैसी संस्थाओं की जगह एक ही एकीकृत नियामक संस्था बनाई जाएगी.

हालांकि, विपक्ष और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े कई लोगों को चिंता है कि इससे विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है. उनका मानना है कि इससे शिक्षा से जुड़े कई महत्वपूर्ण अधिकार एक ही संस्था के पास केंद्रित हो जाएंगे.

दिलचस्प बात यह है कि इस विधेयक की समीक्षा कर रही संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की रिपोर्ट मॉनसून सत्र से पहले पेश होने वाली थी, लेकिन इसमें देरी हुई.

यह ही वह समय था जब जंतर-मंतर पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री और शिक्षा व्यवस्था के ख़िलाफ़ प्रदर्शन चल रहा था. तब संकेत मिले कि सरकार शायद इस बिल को मॉनसून सत्र में पेश नहीं करेगी.

मगर अब बीते सप्ताह समिति ने रिपोर्ट को स्वीकृत करने पर सहमति बना ली है, जिसके बाद इस लोकसभा में इसकी रिपोर्ट मॉनसून सत्र के अंतिम सप्ताह में पेश होनी है.

वंदे मातरम् को कानूनी संरक्षण पर विपक्ष के सवाल

यह विधेयक राज्यसभा में 24 जुलाई को पेश किया गया था, जहां विपक्ष के गृह मंत्री को सदन में बुलाए जाने की मांग के चलते हुए वॉकआउट के बाद भी पास हो गया.

अब लोकसभा में आने की संभावना है.

मौजूदा कानून राष्ट्रगान 'जन गण मन' के गायन में बाधा पहुंचाने या उसे रोकने पर दंड का प्रावधान करता है. नए संशोधन में यही सुरक्षा 'वंदे मातरम्' को भी देने का प्रस्ताव है.

सरकार इसे राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान को मजबूत करने वाला कदम बता रही है.

लेकिन विपक्ष के कुछ नेताओं और नागरिक अधिकार समूहों का मानना है कि इस तरह के प्रावधानों के इस्तेमाल को लेकर भविष्य में व्याख्या और दुरुपयोग की आशंकाओं पर भी चर्चा होनी चाहिए. इसलिए यह विधेयक लोकसभा में वैचारिक बहस को बढ़ा सकता है. सरकार पर विपक्ष संघ की विचारधारा को आगे बढ़ाने का आरोप लगाता रहा है.

राज्यसभा में गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कहा था, "कांग्रेस तुष्टिकरण की राजनीति के कारण "वंदे मातरम्" का अपमान कर रही है."

ट्रिब्यूनल सुधार विधेयक: न्यायिक स्वतंत्रता बनाम सरकारी नियंत्रण

अंतिम सप्ताह में सरकार ट्रिब्यूनल सुधार विधेयक, 2026 को भी आगे बढ़ा सकती है. यह विधेयक देश भर में स्थापित 16 अर्ध-न्यायिक ट्रिब्यूनलों की नियुक्ति और प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव से जुड़ा है.

ट्रिब्यूनल सुधार विधेयक, 2026 के जरिए सरकार देश के 16 ट्रिब्यूनलों और अपील सुनने वाली संस्थाओं की व्यवस्था में बदलाव करना चाहती है.

सरकार का कहना है कि इससे इन संस्थाओं का कामकाज अधिक तेज, पारदर्शी और बेहतर होगा. साथ ही नियुक्तियों और प्रशासन से जुड़े नियमों को भी अधिक स्पष्ट और एक समान बनाया जाएगा.

दरअसल यह बिल सुप्रीम कोर्ट के मद्रास बार एसोसिएशन मामले में दिए गए फैसले के बाद सामने आया है. उसमें ट्रिब्यूनल सुधार अधिनियम 2021 के कुछ प्रावधानों पर आपत्ति जताई गई थी और स्वतंत्र राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल आयोग गठित करने की ज़रूरत बताई गई.

विपक्ष का आरोप रहा है कि पिछले कुछ वर्षों में ट्रिब्यूनलों की स्वतंत्रता कमजोर हुई है, जबकि सरकार का कहना है कि नया कानून न्यायिक निर्देशों के अनुरूप पारदर्शी और अधिक प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित करेगा.

इसी मुद्दे से जुड़ा एक नया राजनीतिक विवाद भी सामने आया है.

प्रस्तावित संशोधन की घोषणा के बाद रविवार को कांग्रेस ने एनजीटी से ग्रेट निकोबार परियोजना को मिली पर्यावरणीय मंजूरी की समीक्षा करने वाली हाइ पावर कमेटी की रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की है. उसका आरोप है कि परियोजना को मंजूरी देने का आधार बनी रिपोर्ट में गंभीर खामियां हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें

BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह

कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.