भारत के पहले जेन-ज़ी आंदोलन ने डॉ. आंबेडकर को ही अपना आइकॉन क्यों चुना?

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, विनायक होगाडे
- पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
"डॉ. आंबेडकर और 'जय भीम' इस देश के हर उस व्यक्ति की आवाज़ हैं जो वंचित और शोषित है. कृपया उन्हें किसी एक समुदाय तक सीमित करने की ग़लती न करें."
अभिजीत दीपके ने एक इंटरव्यू में यह बात कही थी. आंदोलन के दौरान उन्हें जब भी इस बारे में सवाल पूछा गया, उन्होंने लगभग यही बात दोहराई.
मैं जब भी जंतर-मंतर पर इस आंदोलन को कवर करने गया, मुझे दो चीज़ें हर जगह दिखाई दीं. डॉ. भीमराव आंबेडकर की तस्वीर और 'जय भीम' का नारा.
यह मान लेना सही नहीं होगा कि वहां मौजूद हर प्रदर्शनकारी आंबेडकरवादी था या अभिजीत दीपके के विचारों से पूरी तरह सहमत था.
लेकिन व्यापक तौर पर देखें तो इस आंदोलन ने डॉ. आंबेडकर की छवि और 'जय भीम' के नारे को अपनी पहचान के रूप में अपनाया.
'आंबेडकर को सिर्फ़ दलितों तक सीमित न करें'

इमेज स्रोत, Getty Images
जब अभिजीत दीपके 'कॉकरोच जनता पार्टी' नाम के नए आंदोलन के साथ दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचे, तब मीडिया की बड़ी संख्या वहां मौजूद थी.
उन्होंने सिर पर कैप पहन रखी थी. कानों में हेडफ़ोन थे. टी-शर्ट और जैकेट पहनी थी. उनके हाथ में डॉ. आंबेडकर की तस्वीर वाली एक किताब थी. उसे कैमरों के सामने दिखाते हुए वे जंतर-मंतर की ओर बढ़े.
इसके बाद 29 जुलाई को जब वो अपने घर छत्रपति संभाजीनगर लौटे, तब भी उन्हें डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा को नमन करते देखा गया.
उन्होंने शुरुआत से ही साफ़ कहा था, "मैं दलित हूं. मैं डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर को मानता हूं. आज मैं जो भी हूं, उनकी वजह से हूं."
आंदोलन के दौरान जब भी टकराव की स्थिति बनी, अभिजीत दीपके ने डॉ. आंबेडकर को एक प्रतीक के रूप में सामने रखा.
ऐसे तीन मौके ख़ास तौर पर याद आते हैं.
पहला, दिल्ली एयरपोर्ट पर उनकी एंट्री. दूसरा, उन पर स्याही फेंके जाने की घटना. और तीसरा, संसद मार्च के दौरान उनका रास्ता रोके जाने का मामला.

इमेज स्रोत, Getty Images
स्याही फेंके जाने से पहले अभिजीत दीपके कह रहे थे, "यह आंदोलन गांधी और आंबेडकर के रास्ते पर चलेगा. उनकी तस्वीरों के साथ चलेगा. और संविधान के रास्ते पर चलेगा."
इसी बयान के तुरंत बाद उन पर एक महिला ने स्याही फेंकी.
इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा, "नीला तो मेरा रंग है. जय भीम."
संसद मार्च के दौरान पुलिस ने उनका रास्ता रोका. उनके ट्रक के टायरों की हवा निकाली गई. लाठीचार्ज भी हुआ.
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान उनके हाथ में डॉ. आंबेडकर की तस्वीर थी.
गांधी, भगत सिंह और फुले भी थे मौजूद

इमेज स्रोत, Getty Images
इस आंदोलन में सिर्फ़ डॉ. आंबेडकर ही नहीं थे. भगत सिंह, महात्मा फुले, सावित्रीबाई फुले और महात्मा गांधी की तस्वीरें भी बड़ी संख्या में दिखाई दीं.
जंतर-मंतर पर जहां सोनम वांगचुक अनशन पर बैठे थे, वहां मुख्य मंच पर आंबेडकर, बुद्ध और गांधी की तस्वीरें रखी गई थीं.
आंदोलन से जुड़ी सामग्री बेचने वाली एक महिला ने बताया कि सबसे ज़्यादा संविधान की प्रतियां और डॉ. आंबेडकर की तस्वीरें बिक रही थीं.
तिरंगे के बाद सबसे ज़्यादा दिखाई देने वाला झंडा 'जय भीम' लिखा हुआ नीला झंडा था.
एक इंटरव्यू में अभिजीत दीपके ने कहा, "जय भीम का मतलब समझने के लिए डॉ. आंबेडकर को समझना होगा. वे सिर्फ़ दलितों की आवाज़ नहीं हैं. वे हर उस व्यक्ति की आवाज़ हैं जो इस देश में दबाया गया है या शोषण का शिकार है."

इमेज स्रोत, ANI
इस आंदोलन से कई नए चेहरे सामने आए.
इनमें इरफ़ान मोहम्मद भी थे. वो दिल्ली में बर्फ़ बेचने का काम करते हैं. राहुल गांधी भी उनसे मिलने उनके घर पहुंचे थे.
इरफ़ान ने संविधान की प्रस्तावना, उसकी मौजूदा प्रासंगिकता और वंचित लोगों के जीवन पर अपनी राय रखी. उनका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया.
उनकी बातों में भी सामाजिक न्याय और समानता का वही संदेश दिखाई देता था.
आंबेडकर और गांधी का रूप धारण करके आए लोग भी आंदोलन का आकर्षण बने.
मुंबई से आए सुरेश गवई वहां आंबेडकर की वेशभूषा में मिले. उन्होंने कहा, "अगर आज आंबेडकर होते तो देश की ऐसी हालत नहीं होती. उन्होंने ऐसा संविधान लिखा था जिसमें किसी पर अन्याय न हो. लेकिन आज ग़लत लोगों के हाथ में व्यवस्था चली गई है."
'आंबेडकर जाति नहीं, आज़ादी और न्याय के प्रतीक हैं'

इमेज स्रोत, ANI
जंतर-मंतर इस आंदोलन का एक महत्वपूर्ण मंच था. लेकिन सोशल मीडिया भी उतना ही अहम था.
दरअसल, 'कॉकरोच जनता पार्टी' की शुरुआत ही सोशल मीडिया से हुई थी इसलिए वहां होने वाली बहसें भी काफ़ी असरदार रहीं.
सोशल मीडिया पर एक सवाल बार-बार उठ रहा था. डॉ. आंबेडकर ही इस आंदोलन के आइकॉन क्यों बने और 'जय भीम' का नारा क्यों चुना गया?
एक युवती सोशल मीडिया वीडियो में कहती दिखी, "जब भी बदलाव या संघर्ष की लहर उठती है, डॉ. आंबेडकर उसकी पहचान बन जाते हैं. जय भीम का नारा समानता और आज़ादी का प्रतीक है."
आंदोलन के दौरान कई कंटेंट क्रिएटरों ने डॉ. आंबेडकर को लेकर वीडियो और रील बनाईं.
अनुब जॉर्ज पुणे के आंदोलन में शामिल थे. उनका मानना है कि 'रिज़र्वेशन हटाओ आंदोलन' नाम से शुरू किए गए समानांतर अभियान की एक बड़ी वजह यही थी कि इस आंदोलन में डॉ. आंबेडकर एक प्रमुख प्रतीक बनकर उभरे थे.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "आंदोलन के दौरान स्टूडेंट में फूट डालने के लिए आरक्षण विरोधी नैरेटिव आगे बढ़ाया गया. लेकिन उसे सफलता नहीं मिली. आंदोलन में जो एकता बनी थी, उसमें 'जय भीम' का नारा लगाने को लेकर किसी को परेशानी नहीं थी."
वो आगे कहते हैं, "आंबेडकर का नाम अक्सर आरक्षण के मुद्दे से जोड़ दिया जाता है. लेकिन यह आंदोलन किसी एक जाति या समुदाय का नहीं था. इसने धर्म और जाति, दोनों की सीमाओं को पार किया.
यह आंदोलन राजनीतिक दलों से भी दूर रहा इसलिए यहां के नारे भी स्वाभाविक रूप से उभरे. किसी पर थोपे नहीं गए. भीड़ ने ख़ुद 'जय भीम' जैसे नारों को अपनाया."

इमेज स्रोत, Facebook/Dr.Suresh Gawai
मुंबई के आंदोलन में शामिल साम्या कोरड़े का कहना है कि इस आंदोलन ने दिखाया कि आंबेडकर का प्रतीक अब किसी एक जाति तक सीमित नहीं है.
वो कहती हैं, "बाबासाहेब ने 'शिक्षित बनो, संगठित हो और संघर्ष करो' का संदेश दिया था. इस आंदोलन में गांव और शहर, दोनों जगहों के छात्र शामिल थे. सभी ने 'जय भीम' के नारे लगाए."
"आंबेडकर की तस्वीर यह दिखाने का एक प्रतीक बन गई कि आंदोलन संविधान की सीमाओं के भीतर रहकर चल रहा है. जहां भी अन्याय है, वहां संघर्ष के प्रतीक के तौर पर यह तस्वीर दिखाई देती है."
दलित अधिकार कार्यकर्ता और शोधकर्ता केशव वाघमारे का कहना है कि नई पीढ़ी ने आंबेडकर को जाति के प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि मुक्ति, आज़ादी, न्याय और आधुनिकता के प्रतीक के रूप में अपनाया है.
वो बीबीसी मराठी से कहते हैं, "1990 के दशक तक आंबेडकर को एक जाति विशेष के नेता के रूप में पेश किया जाता था. मराठवाड़ा नामांतर आंदोलन जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि महाराष्ट्र में भी उन्हें किस तरह कलंकित किया गया."

इमेज स्रोत, Getty Images
वो आगे कहते हैं, "मगर आज की जेन-ज़ी पीढ़ी जातिगत पूर्वाग्रहों से कुछ हद तक दूर है. पुरानी पीढ़ियों की तुलना में उनके भीतर ऐसे पूर्वाग्रह कम हैं."
वो आगे कहते हैं, "हाल के वर्षों में आंबेडकर सिर्फ़ एक दलित आइकॉन नहीं रह गए हैं. उन्हें भारतीय समाज को आधुनिकता, आज़ादी, तर्क और संवैधानिक मूल्यों का रास्ता दिखाने वाले विचारक के रूप में देखा जा रहा है."
मौजूदा दौर में वो स्वतंत्रता के प्रतीक बनकर उभरे हैं. नई पीढ़ी उन्हें किसी जाति के प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि 'आइडिया ऑफ़ इंडिया' के प्रतीक के रूप में देख रही है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें
BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह
कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.























