23 साल पहले लापता हुए बेटे से मिलने जब तमिलनाडु से पंजाब पहुंची एक मां

- Author, ज़ेवियर सेल्वाकुमार और हरमनदीप सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 11 मिनट
चेतावनी: इस लेख में दी गई जानकारी आपको भावनात्मक रूप से परेशान कर सकती है.
"मैं सालों तक रोती रही. अपने बेटे को तलाशती रही. जिस भगवान की मैं पूजा करती थी, उसी ने उसे बचाया. लेकिन जब मैंने उसकी वो तस्वीरें देखीं, जिनमें उसके पैरों में ज़ंजीरें बंधी थीं और उस पर अत्याचार किया गया था, तो मैं न ठीक से खा सकी और न ही सो सकी. अब 23 साल बाद उसे देखकर मैं बहुत ख़ुश हूँ."
सुंदरी ने 25 जुलाई की सुबह तमिलनाडु के कोयंबटूर रेलवे स्टेशन पर बीबीसी से बातचीत के दौरान इन्हीं शब्दों में ख़ुद को बयां किया. वह ट्रेन से पंजाब जा रही थीं.
उनका मक़सद अपने उस बेटे को आधिकारिक तौर पर वापस लाना था, जिसे कई साल तक पंजाब में पाकिस्तान सीमा के पास रखा गया था. सुंदरी का यह सफ़र सफल रहा.
उनके बेटे को तलाशने में मदद करने वाले मुथैया की सहायता से वह ट्रेन से पंजाब पहुँचीं. 28 जुलाई को उन्होंने 23 साल बाद अपने बेटे को देखा.
उनकी आँखों से ख़ुशी के आँसू बह निकले. उन्होंने अपने हाथों से बेटे को खाना खिलाया.
विरुधुनगर ज़िले की रहने वाली सुंदरी और उनके पति रामामूर्ति लगभग 40 साल पहले रोज़गार की तलाश में अपने दो बेटों के साथ कोयंबटूर आए थे.
उन्होंने सबसे पहले कोंडमपलयम के एरुकंपेनी इलाक़े में रहना शुरू किया.
सुंदरी के मुताबिक़, उनका बड़ा बेटा प्रकाशम चौथी कक्षा से आगे नहीं पढ़ पाया था. साल 2003 में जब वह 16 साल का था, तो दोपहिया वाहन चलाने को लेकर अपने छोटे भाई से उसका झगड़ा हो गया.
इसके बाद वह ग़ुस्से में घर छोड़कर चला गया. परिवार ने उसे कई जगह तलाशा. लेकिन उसका कुछ पता नहीं चला. बाद में पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई गई. फिर भी कोई नतीजा नहीं निकला.
कुछ साल बाद परिवार नीलंबूर के अचानकुलम इलाक़े में रहने लगा. रामामूर्ति बिजली सहायक और चौकीदार के तौर पर काम करते थे.
साल 2021 में कैंसर की वजह से उनकी मौत हो गई. सुंदरी और उनका छोटा बेटा प्रभु एक छोटे से घर में रहते हैं. वे पट्टे की ज़मीन पर खेती करते हैं. गाय पालते हैं और सब्ज़ियाँ उगाकर गुज़ारा करते हैं.
पंजाब में 15 साल से ज़्यादा लंबा वक़्त किस तरह गुज़रा

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जून के आख़िर में तिरुपुर के पत्रकार मुथैया ने सुंदरी को बताया कि उनका बेटा पंजाब के एक आश्रम में है. मुथैया कई साल से सुंदरी के बेटे की तलाश कर रहे थे.
उन्होंने सुंदरी को प्रकाशम की तस्वीर दिखाई. साथ ही फ़ोन और वीडियो कॉल पर उनकी बात भी करवाई. तभी सुंदरी को पता चला कि उनका बेटा ज़िंदा है.
प्रकाशम को बचाने वाली संस्था के अनुसार, उसे पंजाब के अमृतसर ज़िले के अजनाला कस्बे में एक खेत पर 15 साल से ज़्यादा समय तक बंधक बनाकर रखा गया था.
अजनाला पाकिस्तान सीमा के क़रीब स्थित है.
पटियाला की ग़ैर-सरकारी संस्था 'अपना फ़र्ज़ सेवा सोसायटी' ने साल 2022 में उसे वहाँ से छुड़ाया. इसके बाद उसे एक सुरक्षित आश्रय गृह में रखा गया.
बीबीसी पंजाबी से बातचीत में संस्था ने बताया कि प्रकाशम को 15 साल से ज़्यादा समय तक वहाँ बंधक बनाकर रखा गया था.
उससे मवेशियों की देखभाल और चरवाही का काम कराया जाता था. लेकिन उसे पर्याप्त भोजन, कपड़े, रहने की जगह या मज़दूरी नहीं दी जाती थी.
रात में उसे लोहे के पलंग से ज़ंजीरों के सहारे बाँध दिया जाता था ताकि वह भाग न सके.
संस्था ने यह भी बताया कि उसके साथ मारपीट और यातनाएँ दी जाती थीं. उस समय प्रकाशम की हालत की तस्वीरें और वीडियो भी रिकॉर्ड किए गए थे.
ये तस्वीरें और वीडियो पंजाबी सामाजिक कार्यकर्ता सुभाष चंद्र ने बीबीसी तमिल के साथ साझा किए थे.

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हरियाणा विधानसभा के पूर्व सचिव सुभाष चंद्र ने साल 2023 में प्रकाशम से मुलाक़ात की थी. उस समय प्रकाशम बहुत कम बोल पाते थे.
वह सिर्फ़ कुछ शब्द ही बोल पाते. उन्हें याद था कि वह तमिलनाडु से हैं. लेकिन अपने गाँव का नाम ठीक से नहीं बता पाते थे.
वो कभी मुंबई का नाम लेते और कभी किसी अन्य जगह का. इस वजह से उनके घर का पता लगाना मुश्किल हो गया. धीरे-धीरे इलाज और देखभाल से उनकी हालत सुधरी.
बाद में प्रकाशम ने बताया कि उनका घर कोयंबटूर में है. इसके बाद सुभाष चंद्र ने अपने दोस्त बालाकिशन से संपर्क किया. बालाकिशन ने यह जानकारी अपने भाई मुथैया को दी.
मुथैया तिरुपुर में एक स्थानीय अख़बार के रिपोर्टर हैं. उन्होंने दी गई जानकारी के आधार पर खोज शुरू की. लेकिन शुरुआती कोशिशों में उन्हें कोई सफलता नहीं मिली.
प्रकाशम की मां ने कलेक्टर से मांगी मदद

कुछ महीनों बाद प्रकाशम ने 'अरुप्पुकोट्टई', 'पूमलैपट्टी' और 'आनाइकुलम' जैसे नाम बताए. इसके बाद मुथैया ने कई महीनों तक लोगों से पूछताछ की.
आख़िरकार जून में उनकी मुलाक़ात वासुकी से हुई. वासुकी ने बताया कि प्रकाशम उनका रिश्ते में भाई है. उन्होंने सुंदरी के बारे में जानकारी दी.
तीन साल की तलाश के बाद मुथैया ने सुंदरी को खोज निकाला और उन्हें प्रकाशम के बारे में बताया. इसके बाद जुलाई के पहले हफ़्ते में मुथैया, प्रकाशम का छोटा भाई और उनका पड़ोसी पटियाला पहुँचे.
वो प्रकाशम को लेने गए थे, लेकिन संस्था ने कहा कि प्रकाशम को केवल उनकी माँ के वैध दस्तावेज़ों के आधार पर ही सौंपा जा सकता है.
सुंदरी के पास सिर्फ़ साल 2005 का राशन कार्ड था. उसमें प्रकाशम का नाम दर्ज था. इसके बाद उन्होंने कोयंबटूर के ज़िला कलेक्टर से मदद मांगी.
कलेक्टर पवन कुमार किरियप्पनवर ने मामले को गंभीरता से लिया. उन्होंने पंजाब के अधिकारियों से संपर्क किया. साथ ही ज़रूरी दस्तावेज़ जुटाने के निर्देश दिए.
'मेरा बेटा मेरे पैरों पर गिर पड़ा और मुझे गले लगा लिया'

प्रकाशम के स्कूल और विरुधुनगर ज़िले से दो दिन के भीतर ज़रूरी दस्तावेज़ जुटा लिए गए. इसके बाद कोयंबटूर के कलेक्टर ने पटियाला के डिप्टी कमिश्नर हिमांशु अग्रवाल को पत्र भेजा.
पत्र में कहा गया कि जाँच से पुष्टि हो गई है कि प्रकाशम, सुंदरी का बेटा है. उन्हें उनकी माँ को सौंपने की सिफ़ारिश भी की गई.
28 जुलाई को सभी लोग पटियाला स्थित 'अपना फ़र्ज़ सेवा सोसायटी' पहुँचे. वहीं पर काग़ज़ी प्रक्रिया पूरी की गई.
23 साल बाद माँ और बेटे का मिलन हुआ. प्रकाशम सिर पर सिख पगड़ी बाँधे हुए आए. उन्हें देखते ही सुंदरी रो पड़ीं. उन्होंने अपने बेटे को गले लगा लिया.

प्रकाशम अपनी माँ को देखकर कुछ कह नहीं पाए और वह उनके पैरों में गिर पड़े, फिर उन्हें गले लगा लिया.
सुंदरी ने संस्था के सदस्यों का धन्यवाद किया. उन्होंने कहा, "आप हमारे लिए भगवान जैसे हैं."
खाना परोसा गया तो सुंदरी ने अपने बेटे को अपने हाथों से खाना खिलाया.
बाद में दोनों को पटियाला के डिप्टी कमिश्नर कार्यालय ले जाया गया. वहाँ अधिकारियों ने उनसे मुलाक़ात की.
बीबीसी पंजाबी से बातचीत में पटियाला के डिप्टी कमिश्नर हिमांशु अग्रवाल ने कहा, "मुझे यह बताते हुए ख़ुशी हो रही है कि तमिलनाडु के रहने वाले प्रकाशम को उनके परिवार से मिला दिया गया है."
उन्होंने कहा, "हाल ही में पता चला कि वह 23 साल पहले अपने घर से लापता हो गए थे और किसी तरह पंजाब पहुँच गए थे."
उन्होंने आगे कहा, "जानकारी मिली है कि उन्हें बंधुआ मज़दूरी के लिए रखा गया था. मैंने श्रम कल्याण विभाग और समाज कल्याण विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि पीड़ित को नियमों के मुताबिक़ मुआवज़ा दिलाया जाए."
"साथ ही उन्हें बंधुआ बनाकर रखने वालों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई भी की जाए."

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माँ और बेटे को मिलाने में अहम भूमिका निभाने वाले हरियाणा विधानसभा के सेवानिवृत्त सचिव सुभाष चंद्र ने कहा, "मैं देश के अलग-अलग हिस्सों में काम कर रही 22 ग़ैर-सरकारी संस्थाओं से जुड़ा हूँ."
"इन संस्थाओं के ज़रिए हम बचाए गए, अज्ञात और बेसहारा लोगों को उनके परिवारों से मिलाने का काम करते हैं."
सुभाष चंद्र ने बीबीसी पंजाबी को बताया, "प्रकाशम मई 2022 में इस आश्रम में आए थे. उस समय वह केवल दो या तीन शब्द ही बोल पाते थे. मैं जो शब्द बोलता था, वह उन्हें दोहराते थे."
उन्होंने कहा, "पिछले तीन साल से मैं उनसे उनके परिवार के बारे में पूछता रहा. इस साल मई में उन्होंने 'अरुप्पुकोट्टई', 'पूमलैपट्टी' और 'आनाइकुलम' जैसे शब्द बोले."
जब सुभाष चंद्र ने गूगल पर इन जगहों की तलाश की, तो उन्हें पता चला कि ये सभी स्थान तमिलनाडु के विरुधुनगर ज़िले में हैं.
जब उन्होंने प्रकाशम से विरुधुनगर के बारे में पूछा, तो उन्होंने सहमति में सिर हिलाया. इसके बाद सुंदरी का पता लगाया गया.
'कोविड में लगा कि शायद अब वो नहीं बचा होगा'

सुंदरी ने कहा, "जब मेरा बेटा हमारे साथ था, तब वह बिल्कुल ठीक था. वह अपने छोटे भाई से झगड़े के बाद घर छोड़कर चला गया था. जब मैंने उसे बंधुआ हालत में देखा, तो जिसने उसके साथ यह किया, उसके प्रति मेरे मन में बहुत ग़ुस्सा आया."
उन्होंने कहा, "मेरे पति अपनी मौत तक बेटे के ग़ुम होने के दुख में रहे लेकिन उन्हें हमेशा यकीन था कि वह ज़िंदा होगा. वह कहा करते थे कि प्रकाश, रोशनी का प्रतीक है और प्रकाश कभी नहीं मरता."
वह बोलीं, "मैं भी इसी बात पर यकीन करती रही. लेकिन कोरोना के दौरान जब इतने लोगों की मौत हुई, तो मुझे लगा कि शायद वह भी अब ज़िंदा नहीं होगा. जब मुझे पता चला कि वह ज़िंदा है, तो मुझे यकीन हो गया कि भगवान ने उसे बचाया है."
सुंदरी ने कहा, "अगर मुथैया, सुभाष और सेवा संस्था के लोग न होते, तो मुझे अपना बेटा वापस नहीं मिलता. मैं उन सभी की ऋणी हूँ."

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प्रकाशम को उनके परिवार से मिलाने में अहम भूमिका निभाने वाले मुथैया ने कहा कि बीबीसी की रिपोर्ट उनकी कोशिशों में काफ़ी मददगार साबित हुई.
बीबीसी पंजाबी से बातचीत में मुथैया ने कहा, "हमने प्रकाशम के परिवार को ढूँढने के लिए बहुत प्रयास किए. अब जब माँ और बेटा फिर से मिल गए हैं, तो मुझे यह संतोष है कि हमने अपने जीवन में एक बड़ा अच्छा काम किया है."
दो राज्यों के आईएएस अधिकारियों ने की मदद

चंडीगढ़ तमिल संगम के महासचिव राजशेखर ने बीबीसी तमिल से बातचीत में कहा, "यह इंसानियत की जीत है."
उन्होंने कहा, "मुझे ख़ुशी है कि तमिल संगम इस काम का हिस्सा बना. क़ानूनी तौर पर प्रकाशम को उनकी माँ से मिलाने में कोयंबटूर के ज़िला कलेक्टर पवन कुमार की अहम भूमिका रही."
राजशेखर ने बताया कि अधिकारियों ने जानकारी दी है कि जिस ज़मीन मालिक ने प्रकाशम को बंधक बनाकर रखा था, उसने साढ़े तीन लाख रुपये मुआवज़ा देने पर सहमति जताई है.
इसके अलावा उन्हें सरकार की ओर से भी मुआवज़ा मिलेगा. हालाँकि बीबीसी इस मुआवज़े से जुड़ी जानकारी की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं कर पाया है.
25 जुलाई को जब सुंदरी अपने बेटे से मिलने के लिए कोयंबटूर रेलवे स्टेशन से पंजाब के लिए रवाना हुई थीं, तब बीबीसी तमिल ने उनसे बात की थी.
उस समय सुंदरी ने कहा था, "मैं अपने बेटे को देखने के लिए बहुत बेचैन हूँ. मैंने कभी इतनी लंबी रेल यात्रा नहीं की है. लेकिन इसकी कोई चिंता नहीं है, क्योंकि मैं अपने बेटे को वापस लेने जा रही हूँ."
प्रकाशम से मिलने के बाद सुंदरी ने बीबीसी तमिल से कहा, "मैंने अपने बेटे को देख लिया है. मैं बहुत ख़ुश हूँ. ऐसा लग रहा है जैसे मेरा दोबारा जन्म हुआ हो."
"वह आज भी वैसा ही है, जैसा मैंने उसे 23 साल पहले देखा था. मुझे चिंता थी कि वह तमिल बोल पाएगा या नहीं. लेकिन उसने मुझसे बहुत अच्छी तमिल में बात की."
जब बीबीसी तमिल ने प्रकाशम से बात की, तो पता चला कि वह अभी भी सामान्य तरीके से बातचीत नहीं कर पाते हैं.
उन्होंने केवल पूछे गए सवालों के जवाब दिए. प्रकाशम ने कहा, "मैं अपनी माँ से मिल चुका हूँ. मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है."
"मैंने नहीं सोचा था कि मैं अपने परिवार को फिर से देख पाऊंगा. मैं कोयंबटूर आ रहा हूँ. वहाँ पहुँचकर बात करूंगा."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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