You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
भारत में कमज़ोर होते क्षेत्रीय दल किस राजनीतिक बदलाव की ओर इशारा कर रहे हैं?
बीते 10 जून को केंद्र सरकार ने घोषणा की कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के सबसे लंबे समय तक पद पर रहने वाले प्रधानमंत्री बन गए हैं.
हालांकि कांग्रेस ने इसे स्वघोषित रिकॉर्ड बताकर आलोचना की है. पर एक बात तो तय है कि पीएम मोदी के नेतृत्व वाले कार्यकाल ने बीते 12 साल में भारतीय राजनीति को काफ़ी हद तक बदल दिया है.
'कांग्रेस मुक्त भारत' के नारे से शुरू हुई इस राजनीतिक यात्रा ने अब एक नए सवाल को जन्म दिया है- क्या भारत अब एक ऐसे दौर में पहुंच रहा है जहां क्षेत्रीय दलों का महत्व लगातार सिमटता जा रहा है?
एक समय था जब केंद्र की सत्ता तक पहुंचने के लिए राष्ट्रीय दलों को क्षेत्रीय पार्टियों पर निर्भर रहना पड़ता था. लेकिन आज तस्वीर बदलती नजर आ रही है.
महाराष्ट्र, बिहार, पंजाब, उत्तर प्रदेश से लेकर ओडिशा और पश्चिम बंगाल तक, कई राज्यों में क्षेत्रीय दल या तो टूट का सामना कर रहे हैं या अपनी राजनीतिक ज़मीन बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
कहीं नेतृत्व संकट है, कहीं संगठनात्मक कमज़ोरियां, तो कहीं बदलते चुनावी विमर्श के बीच उनकी पकड़ ढीली पड़ती दिख रही है.
ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या क्षेत्रीय दल अपनी ही नीतियों और अंदरूनी चुनौतियों से कमज़ोर हुए हैं, या फिर बदलती राष्ट्रीय राजनीति और मजबूत होती केंद्रीय सत्ता के चलते उनकी भूमिका सीमित होती जा रही है?
और अगर यह एक बड़ा बदलाव है, तो यह भारत की राजनीति को किस नई दिशा में ले जा रहा है?
पूरे सप्ताह चर्चा का केंद्र रहे इस मुद्दे पर बीबीसी के साप्ताहिक कार्यक्रम 'द लेंस' में चर्चा हुई.
कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़्म मुकेश शर्मा ने इस मामले में तृणमूल कांग्रेस यानी टीएमसी की राज्यसभा सांसद सागरिका घोष से बात की.
साथ ही, सत्तारूढ़ एनडीए में शामिल शिवसेना (शिंदे गुट) के मुख्य राष्ट्रीय समन्वयक डॉ. अभिषेक वर्मा ने अपनी बात रखी.
बीजेपी और हिंदुवादी दलों के उभार पर दशकों से नज़र रख रहे वरिष्ठ पत्रकार और लेखक नीलांजन मुखोपाध्याय ने भी कार्यक्रम में हिस्सा लिया.
टीएमसी का संकट: बाहरी दबाव या अंदरूनी कमज़ोरी
टीएमसी में हालिया संकट का कारण क्या है? क्या पार्टी से चुने हुए जनप्रतिनिधि सिर्फ़ कथित दबाव में पार्टी छोड़ रहे हैं, या विचारधारा से जुड़ाव कमज़ोर है? क्या पार्टी से नेताओं के चुनाव में भी ग़लतियां हुई हैं?
टीएमसी सांसद सागरिका घोष मौजूदा संकट के लिए बीजेपी की रणनीति को ज़िम्मेदार मानती हैं. उनके अनुसार केंद्रीय एजेंसियों, धन और दबाव के जरिए पार्टी नेताओं पर कार्रवाई कर उन्हें दल बदलने के लिए मजबूर किया जा रहा है.
वो मानती हैं कि पार्टी से अपने विधायकों या सांसदों को चुनने में कोई ग़लती नहीं हुई.
उन्होंने कहा, "जिन सांसदों ने पार्टी छोड़ी है, वे तीन और चार बार के एमपी हैं. वे लंबे से पार्टी लीडरशिप से जुड़े रहे हैं. अगर आज पार्टी पहले की तरह ही जीत जाती तो भी क्या ये पार्टी को ऐसी ही छोड़ते? मैं नहीं समझती कि ऐसा होता. आज पार्टी हारी तो इन्होंने पार्टी से विश्वासघात किया है, ये इनकी नैतिक कमज़ोरी है."
हालांकि सागरिका घोष ने संगठन और नेतृत्व से जुड़ी कमियों को भी स्वीकार किया.
उन्होंने कहा, "पार्टी के भीतर आत्मचिंतन और सुधार की ज़रूरत है, और पार्टी लीडरशिप भी इसको लेकर जागरूक है. दो अंदरूनी बैठकों में इस पर चर्चा हुई है."
उनके मुताबिक़, इन बैठकों में उन्होंने अपने मत रखे और उन्हें भरोसा है कि इससे समाधान निकलेगा.
उधर, केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग के आरोप से शिवसेना (शिंदे गुट) के नेशनल कोऑर्डिनेटर डॉ. अभिषेक वर्मा सहमत नहीं हैं.
उनका कहना है, "ये नहीं मानना चाहिए कि केंद्रीय एजेंसियां कोई जांच इसलिए करती हैं कि आप इधर हमारे पक्ष में आ जाएं. मैं तो नहीं मानता कि कहीं ऐसी कोई बात है, और अगर है भी तो उसके लिए हमारी स्वतंत्र न्यायपालिका है."
वह उदाहरण देते हुए कहते हैं, "जैसे- अरविंद केजरीवाल से जुड़े आबकारी केस को अदालत ने क्वैश ही कर दिया था."
ध्यान रहे कि आबकारी मामले में निचली अदालत के केजरीवाल और अन्य को लेकर आए आदेश/टिप्पणियों पर दिल्ली हाईकोर्ट ने रोक लगा दी है.
लेकिन जहां तक पश्चिम बंगाल का मामला है, वरिष्ठ पत्रकार निलांजन मुखोपाध्याय टीएमसी की टूट को अभी भी मुश्किल मानते हैं.
मुखोपाध्याय ने कहा, "अगर लोकसभा में दो-तिहाई सांसद इकट्ठे हो गए होते तो ये टूट हो चुकी होती. राज्यसभा में भी दो-तिहाई सांसद इकट्ठे नहीं हो सके इसीलिए एक-एक करके तीन सांसदों ने इस्तीफ़ा दे दिया."
उनका कहना है कि क्षेत्रीय दलों में अपनी कमज़ोरियां और मजबूती है, और अगले दस दिनों में टीएमसी को लेकर स्थिति साफ़ हो जाएगी.
एनडीए से जुड़े क्षेत्रीय दल की स्वतंत्र पहचान
एनडीए से जुड़े क्षेत्रीय दल क्या उसके बढ़ते असर के बीच अपनी राजनीतिक पहचान बनाए रख सकेंगे? क्या एक ही तरह की राजनीति करने से शिवसेना शिंदे गुट की जगह को बीजेपी नहीं कब्जा लेगी?
इस सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार नीलांजन मुखोपाध्याय का कहना है, "बीजेपी और उसके सहयोगी का जहां भी एक समान राजनीतिक बेस हो, वहां वह गठबंधन सहयोगी को ख़त्म कर देती है. उनके बेस को ही अपने बेस में शामिल कर लेती है."
वह महाराष्ट्र का उदाहरण देते हुए कहते हैं, "वहां धीरे-धीरे बीजेपी ने शिवसेना को ख़त्म कर दिया. अभी नाम के वास्ते एकनाथ शिंदे की शिवसेना है."
हालांकि एनडीए सहयोगी शिवसेना (शिंदे गुट), बीजेपी को ख़तरा नहीं मानता.
इसके राष्ट्रीय समन्वयक डॉ. अभिषेक वर्मा का कहना है कि बीजेपी और शिवसेना की विचारधारा (हिंदुत्व और राष्ट्रवाद) समान है, इसलिए वे उन्हें प्रतिस्पर्धी नहीं बल्कि 'बड़े भाई' और पूरक साथी के रूप में देखते हैं.
जबकि अटल बिहारी बाजपेई के समय की बीजेपी के दौर में महाराष्ट्र में शिवसेना 'बड़े भाई' की भूमिका में मानी जाती थी.
इस बदले हुए रिश्ते को डॉ. अभिषेक शर्मा 'चुनावी समीकरण' बताते हैं.
उन्होंने कहा, "कभी हमारी संख्या ज़्यादा होती है, कभी बीजेपी की. ये चुनावी मैकेनिक्स है, जिसमें बैठकर सीटें और भूमिका तय होती है."
जहां तक क्षेत्रीय दलों के व्यापक अस्तित्व की बात है तो हम इस बारे में सोचते हैं और इसी के तहत हमने यूपी में निषाद पार्टी के साथ गठबंधन किया है.
चुनाव के आसपास होने वाली क्षेत्रीय दलों की टूट और इससे जुड़े सैद्धांतिक सवाल को लेकर वर्मा का कहना है, "अगर ये नेता या ग्रुप, नियम के अंदर रहकर एनडीए से जुड़ना चाहते हैं तो क्यों आपत्ति होनी चाहिए? हम दूसरों के बारे में नहीं कह सकते पर हमने अपनी विचारधारा नहीं बदली."
ध्यान रहे कि 2022 में शिवसेना में टूट के बाद शिंदे गुट, बीजेपी के साथ मिलकर सत्ता में आया था.
क्षेत्रीय दलों की गिरती ताक़त और लोकतंत्र
साल 2014 में बीजेपी का 'कांग्रेस मुक्त भारत' का अभियान अब 2026 में 'क्षेत्रीय दल मुक्त' की ओर प्रभावकारी तरीके से बढ़ता लग रहा है. आप इस पूरे समय को कैसे देख रहे हैं?
नीलांजन मुखोपाध्याय 1980 के दशक से हिंदुत्ववादी दलों के उभार पर नज़र रखते आए हैं.
इस सवाल पर उन्होंने कहा, "बीजेपी अपने संगठन सहयोगियों को मजबूत करने की राजनीति नहीं अपनाती."
बिहार में एनडीए के सहयोगी जदयू की स्थिति को वे उदाहरण के तौर पर समझाते हैं.
वो कहते हैं, "यहां नीतीश कुमार के चेहरे पर चुनाव जीतने के कुछ समय बाद ही जदयू को दरकिनार करके बीजेपी का पहली बार मुख्यमंत्री बना है. आने वाले समय में या तो जदयू के नेता बीजेपी में शामिल हो जाएंगे, या फिर वह बेहद छोटे राजनीतिक दल के रूप में सिमट जाएगी."
साथ ही, वे टीएमसी और डीएमके से जुड़े हालिया घटनाक्रमों को केंद्र में बीजेपी की मजबूती के तौर पर देखते हैं.
उन्होंने कहा, "तमिलनाडु में डीएमके, यूपीए से अलग हुई है. ऐसे में देखना होगा कि क्या वो बीजेपी से जुड़ती है. अगर ऐसा हुआ तो लोकसभा और राज्यसभा में उसकी स्थिति और मजबूत होगी और उसके कामकाज में और बदलाव दिखेगा."
मुखोपाध्याय का कहना है, "जिस तरह क्षेत्रीय दल एक चेहरे की राजनीति करते हैं, बीजेपी उससे अलग नहीं है. वहां भी मुख्य क़िरदार मोदी ही हैं लेकिन वो यह झूठी पब्लिसिटी है कि बाकी पार्टियों में परिवारवाद है और वह चेहरे की राजनीति नहीं करती, विचारधारा की राजनीति करती है."
वो कहते हैं कि अटल बिहारी के समय की बीजेपी संगठन आधारित थी, उसमें बाकियों के विचारों का महत्व था. मोदी के दौर में ऐसा नहीं है.
बीजेपी की राजनीति में क्षेत्रीय दलों की अहमियत
साल 2013 में नीलांजन मुखोपाध्याय ने नरेंद्र मोदी की बायोग्राफ़ी लिखी थी. बीजेपी के एनडीए घटक दलों से रिश्तों को लेकर पीएम मोदी की रणनीति को वह एक उदाहरण से समझाते हैं.
उनके अनुसार, "मैंने किताब के लिए इंटरव्यू के दौरान उनसे (मोदी) से पूछा था कि एनडीए में घटक दल कम क्यों हो रहे हैं. तब उन्होंने बहुत स्पष्ट कहा था कि सहयोगी दल तब साथ में आते हैं, जब उनको लगता है कि हमारे साथ रहने का उनको कुछ फ़ायदा होगा."
मुखोपाध्याय का कहना है कि इस तरह "नरेंद्र मोदी ने गठबंधन की जो व्याख्या की वो विशुद्ध रूप से ट्रांज़ैक्शनल रिलेशन है."
वो कहते हैं कि 2014 में बीजेपी को खुद उम्मीद से ज़्यादा बहुमत मिल गया. 2014 और 2019 के कार्यकाल में उन्होंने गठबंधन सहयोगियों को कोई ख़ास तवज्जो नहीं दी. फिर 2019-24 के बीच भी यही देखने को मिला.
उनके मुताब़िक, "2024 में जब बीजेपी को बहुमत नहीं मिला तो लोगों को लगा कि अब वे गठबंधन के सहयोगियों से ज़्यादा सलाह-मशविरा किया करेंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इसकी एक वजह ऑपरेशन सिंदूर था, जहां से वे दोबारा शक्तिशाली होकर लौटे. भले उनके पास नंबर कम हैं मगर तब भी वे 2014 के जैसे ही काम कर रहे हैं."
मोदी के बाद बीजेपी: नेतृत्व का सवाल
कल को अगर पीएम मोदी रिटायरमेंट लेते हैं या उनके बाद के काल में क्या लीडरशिप से जुड़ा वैसा ही संकट बीजेपी के ऊपर आ सकता है जो अभी क्षेत्रीय दलों में है?
इस पर पत्रकार मुखोपाध्याय का कहना है कि अभी ऐसा नहीं लगता कि पीएम मोदी यह कह पाएंगे कि उनके बाद किसको उनका उत्तराधिकारी बनाया जाना चाहिए.
वो कहते हैं, "बीजेपी, मोदी कार्यकाल के बाद के समय में पूरी तरह ट्रांजीशन में चली जाएगी, अगर यह प्री-प्लान तरीके से न हो, तब आरएसएस दोबारा अपने प्रभुत्व को उसके ऊपर जमाना चाहेगी. ऐसे में बीजेपी में लीडरशिप को लेकर क्या उठापटक होगी, ये तो वक़्त ही बताएगा."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.