You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
प्लास्टिक से बनेंगी सड़कें, भारत में क्या होगा इनका भविष्य?
- Author, चेरामेन ली
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
- प्रकाशित
नई दिल्ली की एक सड़क पर रोज़ाना अनगिनत कारें, कई टन प्लास्टिक की थैलियों, बोतलों के ढक्कनों और इधर-उधर यूं ही फेंक दिए गए पॉलिस्टरिन कपों से होकर गुज़रती हैं.
इस सड़क पर गाड़ी चलाता हुआ ड्राइवर एक ही किलोमीटर में कई टन प्लास्टिक के कचरे से होकर गुज़रता है. लेकिन उसे इस यात्रा के दौरान कोई गंदगी नहीं दिखती. न तो सड़क पर प्लास्टिक फैला मिलता है न कहीं से कोई बदबू आती है.
दरअसल वह एक ऐसी सड़क से गुज़र रहा होता है, जो प्लास्टिक से बनी हुई है.
यह सड़क नई दिल्ली से मेरठ तक जाती है. सड़क जिस तकनीक पर बनी है,उसे त्यागराजार कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग के केमिस्ट्री के प्रोफे़सर राजगोपालन वासुदेवन ने विकसित किया है.
इस तकनीक से सड़क बनाते वक्त नब्बे फ़ीसदी कोलतार में दस फीसदी दोबारा इस्तेमाल होने वाला प्लास्टिक कचरा मिलाया जाता है.
प्लास्टिक कचरे से सड़क बनाने में भारत आगे
साल 2000 की शुरुआत से ही भारत सड़क बनाने की तकनीक में प्लास्टिक-तार (प्लास्टिक और कोलतार) का प्रयोग कर रहा है. इस मामले में वह दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल है.
लेकिन अब और भी कई देश इस दौड़ में शामिल हो गए हैं. अब तो घाना से लेकर नीदरलैंड तक, सड़कें और दूसरे तमाम रास्ते बनाने के लिए प्लास्टिक का इस्तेमाल कर रहे हैं.
इससे वो कार्बन उत्सर्जन तो घटा ही रहे हैं, साथ ही समुद्र और लैंडफिल में फेंके गए प्लास्टिक को लाकर सड़क बनाने में इस्तेमाल कर के अपनी सड़कों की उम्र भी बढ़ा रहे हैं.
साल 2040 तक पूरी दुनिया के पर्यावरण में 1.3 अरब टन प्लास्टिक जमा हो जाएगा. खुद भारत ही हर साल 33 लाख टन से अधिक प्लास्टिक पैदा करता है.
इतना ज़्यादा प्लास्टिक का पैदा होना ही वासुदेवन के इस प्रयोग की प्रेरणा बन गया. इसी ने उन्हें सड़क बनाने में प्लास्टिक के इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया.
बग़ैर तकनीकी ताम-झाम वाली सरल प्रक्रिया
दरअसल सड़क बनाने में प्लास्टिक का इस्तेमाल की प्रक्रिया बेहद सरल है. इसके लिए ज़्यादा तकनीकी तामझाम की ज़रूरत नहीं पड़ती. इसमें प्लास्टिक कचरे के टुकड़े सड़क बनाने के लिए डाली गई गिट्टियों (पत्थर के टुकड़े) और रेत पर बिछा दी जाती हैं.
इसके बाद इसे 170 डिग्री सेंटिग्रेड का ताप दिया जाता है, इससे यह प्लास्टिक कचरा पूरी तरह पिघल जाता है. इस पिघले प्लास्टिक की कोटिंग सड़क पर हो जाती है. इसके ऊपर गर्म कोलतार बिछा दिया जाता है.
फिर रेत, गिट्टियों और यह पिघला हुआ प्लास्टिक कचरा ठोस शक्ल अख़्तियार कर लेता है. इस तरह यह मिक्सचर मुकम्मल हो जाता है. सड़क बनाने के मिक्सचर में प्लास्टिक का इस्तेमाल इसके टूटने की गति धीमी कर देता है. साथ ही इसमें गड्ढे भी कम पड़ते हैं.
प्लास्टिक कंटेंट सतह के लचीलेपन को बढ़ा देता है. दस साल पहले वासुदेवन ने इस तकनीक का इस्तेमाल कर जो सड़कें बनवाई थीं, उनमें गड्ढे का कोई निशान नहीं दिखता. हालांकि प्लास्टिक की ज्यादातर सड़कें नई हैं, और अभी यह देखना है आगे ये कितने सालों तक टिकाऊ रहती हैं.
वासुदेवन के हिसाब से प्लास्टिक कचरे को जलाने के बजाय इसका इस्तेमाल किया जाए तो प्रति किलोमीटर पैदा होने वाले कार्बनडाइक्साइड में तीन टन की कमी हो सकती है. इसके आर्थिक फायदे भी हैं. सड़क बनाने में प्लास्टिक का प्रति किलोमीटर 670 डॉलर बचाता है.
प्लास्टिक से बनी सड़कें ज़्यादा टिकाऊ और वजन सहने वाली
साल 2015 में भारत सरकार ने पांच लाख से ज़्यादा की आबादी वाले बड़े शहरों के नज़दीक बनाई जाने वाली सड़कों में प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल अनिवार्य बना दिया.
वासुदेवन ने सड़क बनाने के इस तकनीक का अपना पेटेंट सरकार को मुफ़्त में दे दिया था. एक सिंगल लेन की एक किलोमीटर साधारण सड़क बनाने में दस टन कोलतार की ज़रूरत होती है.
भारत हर साल हजारों किलोमीटर सड़क बनाता है इसलिए प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल तेज़ी से बढ़ रहा है. अब तक प्लास्टिक-तार की 2,500 किलोमीटर सड़क बनाई जा चुकी है.
वासुदेवन कहते हैं, "प्लास्टिक-तार से बनी सड़कों में भारी वजन और हैवी ट्रैफिक सहने की क्षमता होती है. इस पर बारिश के पानी या जल-जमाव का कोई असर नहीं होता."
दुनिया भर में अब प्लास्टिक कचरे से सड़कें बनाने की कई परियोजनाएं चल रही हैं. केमिकल फ़र्म डाउ पॉलिएथिलिन वाली री-साइकिल्ड प्लास्टिक का इस्तेमाल अमेरिका और एशिया प्रशांत क्षेत्र की अपनी परियोजनाओं में कर रही है.
ब्रिटेन में ऐसी पहली सड़क स्कॉटलैंड में 2019 में बनाई गई. इसे प्लास्टिक रोड बनाने वाली कंपनी मेकरेबर ने बनाया था. इसी ने स्लोवाकिया से दक्षिण अफ्रीका तक प्लास्टिक का इस्तेमाल करते हुए सड़क बनाई थी.
मेकरेबर ने यह भी देखा कि सड़क बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली सामग्री में प्लास्टिक मिलाने से इसका लचीलापन बढ़ता है. इस वजह से ये तापमान बढ़ने और घटने को सही तरीके से सह लेती हैं. लिहाजा सड़कों में गड्ढे कम बनते हैं.
जहां गड्ढे बनते हैं वहां इसका इस्तेमाल कर इसे आसानी से भर भी दिया जा सकता है. ब्रिटेन सरकार ने हाल में प्लास्टिक की सड़कों पर रिसर्च करने के लिए 10.6 लाख पाउंड जारी करने का ऐलान किया है. यह रकम सड़कों में गड्ढे पड़ने की समस्या सुलझाने में मदद करेगी.
नीदरलैंड में 2018 में दुनिया में पहली बार रीसाइकिल की हुई प्लास्टिक की सड़क बनी. इसे बनाने वाली कंपनी प्लास्टिकरोड ने स्थानीय स्तर पर जमा किए गए प्लास्टिक की पहले छंटाई की. फिर इसके टुकड़े काट कर और इसे साफ कर प्रोपिलिन निकाला गया.
यह प्लास्टिक अमूमन फेस्टिवल मग, कॉस्मेटिक पैकेजिंग, बोतलों के ढक्कनों और प्लास्टिक स्ट्रॉ में मिलता है.
भारत और ब्रिटेन में सड़क बनाने के लिए प्लास्टिक-तार (प्लास्टिक और कोलतार) का इस्तेमाल होता है लेकिन प्लास्टिकरोड की को-फाउंडर अन्ना कॉडस्टाल कहती हैं कि उनकी कंपनी कोलतार का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं करती.
कंपनी की बनाई हुई सड़क पूरी तरह रीसाइकिल की हुई प्लास्टिक की होती है. सड़क के ऊपर मिनरल की एक पतली परत भर होती है.
कॉडस्टाल कहती हैं कि प्लास्टिक का एक वर्ग मीटर साइकिल पथ बनाने में 25 किलो री-साइकिल किया हुआ प्लास्टिक कचरा लगता है. परंपरागत टाइल वाले साइकिल पथ की तुलना में इसे बनाने में 52 फ़ीसदी कम कार्बन का उत्सर्जन होता है.
प्लास्टिक सड़कों से कम पैदा होता है माइक्रोप्लास्टिक
लेकिन एक बार सड़क या रास्ता बनाते वक्त प्लास्टिक के इस्तेमाल के बाद यह कैसे पक्का किया जाए कि इसके घिसने से माइक्रोप्लास्टिक न पैदा हो? इसकी क्या गारंटी है इससे मिट्टी, पानी और हवा प्रदूषित नहीं होगी ?
इस सवाल के जवाब में कॉडस्टाल कहती हैं, "साधारण टायर और कार के ब्रेक पहले से ही माइक्रोप्लास्टिक के बड़े स्रोत के तौर पर मौजूद हैं. लेकिन प्लास्टिक से बने रास्ते पारंपरिक सड़कों की तुलना में कम माइक्रोप्लास्टिक पैदा करते हैं क्योंकि इसका इस्तेमाल करने वाले सीधे प्लास्टिक के संपर्क में नहीं आते."
बर्मिंघम यूनिवर्सिटी में डिपार्टमेंट ऑफ सिविल इंजीनियरिंग के सीनियर प्रोफ़ेसर गुरमेल घटौरा भी मानते हैं कि सड़क की निचली सतह पर प्लास्टिक के इस्तेमाल से अतिरिक्त माइक्रोप्लास्टिक पैदा होने का जोख़िम कम हो जाता है.
हालांकि इसकी आशंका पूरी तरह खत्म नहीं होती. सड़कों पर ट्रैफ़िक आने-जाने से ऐसे कण (माइक्रोप्लास्टिक) तो पैदा होते ही हैं.
भारत में दुनिया के सबसे बड़े सड़क नेटवर्कों में से एक मौजूद है. इसमें हर साल 10 हजार किलोमीटर सड़क और जुड़ रही है. लिहाजा यहां सड़क बनाने में प्लास्टिक के इस्तेमाल की संभावनाएं भी काफी अच्छी है.
हालांकि यह तकनीक भारत और पूरी दुनिया के लिए अभी थोड़ी नई ही है. लेकिन वासुदेवन को पूरा भरोसा है कि प्लास्टिक की सड़कों को लोकप्रियता मिलती रहेगी.
इन सड़कों को लोग न सिर्फ पर्यावरण सुरक्षा के लिहाज से पसंद करेंगे बल्कि ये लंबे समय तक टिकने और ज़्यादा दबाव झेलने वाली सड़कों के तौर पर जानी जाएंगीं.
(बीबीसी फ़्यूचर पर मूल लेख अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)