वो मौलवी जो दुनिया बचाने की ख़ातिर जारी करवाते हैं फतवे

    • Author, डायना रोकम्यांगसिह
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
  • प्रकाशित

जर्मन दार्शनिक और वामपंथी विचारक कार्ल मार्क्स ने धर्म को अफ़ीम कहा था.

यानी धर्म में ऐसा नशा है कि इसकी लत लगाकर इंसान से कुछ भी कराया जा सकता है.

अक्सर लोग मार्क्स के इस सिद्धांत को नकारात्मक रुप में लेते हैं. लेकिन इंडोनेशिया में लोग धर्म के ज़रिए एक सकारात्मक बदलाव ला रहे हैं.

इंडोनेशिया मुस्लिम बहुल देश है. यहां के लोगों की ज़िंदगी में धर्म सबसे ज़्यादा अहमियत रखता है. लोग बड़ी संख्या में धार्मिक सभाओं में इकट्ठा होते हैं जहां लोग धर्म गुरुओं से मज़हबी बातें जानते हैं. लेकिन दिसंबर 2019 के बाद से इन धर्म सभाओं ने एक नया रूप ले लिया है. अब इन सभाओं में पर्यावरण की बर्बादी और उसे बचाने के उपायों पर भी चर्चा होती है.

पर्यावरण को बचाने वाला धर्मगुरू

सुमात्रा के दक्षिण में तानजुंग माकमूर नाम के गांव में बड़े पैमाने पर दलदली ज़मीन है. यहां खेती के लिए बेपनाह पेड़ काटे गए. जो घास बची थी उसे लोगों ने जलाकर ख़त्म कर दिया. इंडोनेशिया यूं भी जंगलों की आग के लिए बदनाम है. इस आग की वजह से ही यहां की हवा में कार्बन डाई ऑक्साइड ज़्यादा मात्रा में पाई जाती है.

इस वक्त इंडोनेशिया की प्राथमिकता यही है कि वो अपने यहां होने वाले कार्बन उत्सर्जन को किसी भी तरह कम करे. और और वहां की दलदली ज़मीन को बचाया जाए जो पर्यावरण संतुलन के लिए बहुत ज़रुरी है. अगर ज़मीन को जलाकर साफ़ किया जाता है, तो उससे जलवायु को काफ़ी नुक़सान होता है.

इस कारण से जंगलों में भी आग लग जाती है. दुनिया भर में दलदली ज़मीन साफ़ करने की वजह से हर साल लगभग पांच फ़ीसद ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन होता है.

इंडोनेशिया में बड़ी संख्या में धार्मिक सभाएं होती हैं. ऐसे में इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप के मौलवी मुस्तानजिन ने सोचा क्यों ना इन सभाओं के ज़रिए लोगों को मज़हबी विचारों के ज़रिए पर्यावरण बचाने का संदेश दिया जाए.

मुस्तानजिन ने ये काम इंडोनेशिया उलेमा काउंसिल की मदद से ये काम शुरु किया.

वो वर्ष 2018 से इंडोनेशिया की पीटलैंड रेस्टोरेशन एजेंसी यानी (BRG) और सेंटर ऑफ़ इस्लामिक स्टडीज़ इन नेशनल यूनिवर्सिटी (UNAS) से जुड़े हैं. और, अब तक सैकड़ों स्थानीय मौलवियों को देश में दलदली ज़मीन बचाने की ट्रेनिंग दे चुके हैं.

ट्रेनिंग लेने के बाद ये मौलवी सुमात्रा और कालीमंतन के इलाक़ों में जाकर लोगों को इसके प्रति जागरुक करते हैं. यही नहीं पर्यावरण को बचाने के लिए इंडोनेशिया उलेमा काउंसिल की ओर से फ़तवे भी जारी किए जाते हैं. इन फ़तवों पर अमल कराना स्थानीय मौलवियों और मस्जिद के ज़िम्मेदार लोगों का दायित्व होता है.

कार्बन उत्सर्जन का ख़तरा

इंडोनेशिया के बहुत से द्वीपों में दलदली ज़मीन की तादाद काफ़ी ज़्यादा है. पिछले कई दशकों से इन्हें साफ़ कर के खेती लायक़ बनाने का सिलसिला चल रहा है. जिसके यहां दलदली ज़मीन और जंगल घटते जा रहे हैं. जंगलों और दलदली ज़मीन अच्छी ख़ासी तादाद में कार्बन को सोख लेते हैं.

इनमें कितनी मात्रा में कार्बन जमा है, ये अलग-अलग इलाक़ों पर निर्भर करता है. मोटे तौर पर माना जाता है कि यहां 28.1 गीगाटन कार्बन मौजूद है. यानी दुनिया के दलदलों में क़ैद कुल कार्बन का 37 फ़ीसद हिस्सा इंडोनेशिया के दलदलों में बंद है. लेकिन अफ़सोस की बात है कि इंडोनेशिया क़रीब डेढ़ करोड़ हेक्टेयर दलदली ज़मीन खेती के लिए साफ़ कर चुका है.

इसीलिए अब यहां दलदली ज़मीन के संरक्षण के मक़सद से 2016 में पीटलैंड रेस्टोरेशन एजेंसी (BRG) की स्थापना की गई थी. हालांकि संसाधनों की कमी चलते ये संस्था 9 लाख हेक्टेयर ज़मीन को ही दोबारा पुराने रूप में लौटा सकी. बाक़ी की ज़िम्मेदारी कुछ तेल कंपनियों और सामाजिक संस्थाओं के हाथ में है.

BRG के वरिष्ठ अधिकारी नाज़िर फ़ॉएद का कहना है कि इस मिशन से स्थानीय लोगों को जोड़ने में इस्लाम धर्म ने एक महत्वपूर्ण रोल निभाया है. मज़हब की रौशनी में लोगों को समझाया गया कि ख़ुदा की नेमत को आग लगाकर ख़त्म करना इस्लाम के ख़िलाफ़ है.

जो जगह आग लगाकर सुखा दी गई थी, उसे फिर से गीला करने और वहां पौधे लगाने को कहा गया. लोगों ने इस काम को इस्लाम की सेवा के रूप में किया और बड़े पैमाने पर दलदली ज़मीन को फिर से उसी रूप में लाया जा सका.

लोगों को समझाया गया कि जब हम जंगलों में आग लगाते हैं, तो वहां रहने वाले अनगिनत कीड़े मकोड़े और दूसरे जानवर मर जाते हैं. इस्लाम में नाहक़ किसी की जान लेना हराम है. ये अल्लाह के फ़रमान की अनदेखी करना है.

इंडोनेशिया उलेमा काउंसिल (MUI)के नेचुरल रिसोर्सेज डिविजन यूनिट के मुखिया हेयू प्राबोवो का कहना है कि लोगों को पर्यावरण संरक्षण का उपदेश देने का काम 2010 से किया जा रहा है. और इस संबंध में अब तक 6 फ़तवे जारी किए जा चुके हैं. जिसमें पानी के संरक्षण से लेकर ख़तरनाक जानवरों का संरक्षण भी शामिल है. और अब दलदली ज़मीन के बचाव के लिए फ़तवा जारी किया गया है.

MUI ने हाल ही में इको-फ्रेंडली मस्जिद की धारणा भी लोगों तक पहुंचाई है. इन मस्जिदों में हरियाली और स्थाई जल प्रबंधन प्रणाली अपनाने को कहा गया है. पूरे इंडोनेशिया में अब तक क़रीब 100 इको-फ्रेंडली मस्जिदों का निर्माण हो चुका है. रात की नमाज़ के बाद धार्मिक ज्ञान की जमाअत में भी लोगों को क़ुरान की आयतों के हवाले से पर्यावरण संरक्षण का उपदेश दिया जाता है.

पर्यावरण के प्रति लोगों को जगाना कितना मुश्किल

लोगों का कहना है कि पर्यवरण संरक्षण संबंधी फ़तवों से पहले उन्हें ये तक पता नहीं था कि वो दलदली ज़मीन पर रहते हैं और वो पर्यावरण के लिए क्यों और कितनी ज़रुरी है. इन फ़तवों के बाद ही सुमात्रा में टाइगर और जावा में गैंडों का बड़े पैमाने पर संरक्षण हो पाया है.

धार्मिक गुरु मंगोजिया का कहना है कि पर्यावरण के प्रति लोगों में जागरूकता लाना और उनका बर्ताव बदलना आसान नहीं था. धर्म गुरुओं को इसके लिए काफ़ी मेहनत करनी पड़ी. सुमात्रा के धर्म गुरु नूर आज़मी कहते हैं कि लोगों के बीच धारणा थी कि सूखी घास को जलाकर ही ज़मीन को उपजाऊ बनाया जा सकता है.

एक वजह ये भी थी कि लोगों के पास ज़मीन साफ़ करने के लिए नई तकनीक और औज़ार नहीं थे. धर्म गुरुओं ने लोगों को समझाया कि वो ज़मीन को आग के हवाले किए बिना भी साफ़ और उपजाऊ बना सकते हैं.

लोगों ने मौलवियों की बात मान कर ज़मीन को प्रति हेक्टेयर के हिसाब से खोदने वाली मशीनों का इस्तेमाल करने वालों को देना शुरु कर दिया. इसके लिए किसान को प्रति हेक्टेयर के लिए एक हज़ार 80 पाउंड देने पड़ते हैं.

दूसरा तरीक़ा, हाथ से झाड़ियां साफ़ करने का था या फिर झाड़ियों को नष्ट करने वाले केमिकल का इस्तेमाल करने का था. इसके लिए किसान को 98 पाउंड प्रति हेक्टेयर का ख़र्च उठाना पड़ता है.

आज़मी कहते हैं कि लोगों को जैविक उर्वरक इस्तेमाल करने के लिए भी प्रोत्साहित किया गया. यही नहीं लोगों को जैविक उर्वरक बनाने के तरीक़े भी बताए गए. इसमें लागत भी बहुत कम आती है.

आज़मी ख़ुद भी खेती करते हैं और मस्जिद में लोगों को पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हैं. यही नहीं वो स्कूलों में जाकर महिला अध्यापकों और बच्चों को भी खेत को जलाए बिना उसे साफ़ करने के तरीके बताते हैं. उनके साथ अभी तक 30 लोग और जुड़ गए हैं.

धर्म के सहारे होते अनूठे प्रयोग

इंडोनेशिया के सेंटर फ़ॉर इंटरनेशनल फ़ॉरेस्ट्री रिसर्च के रिसर्चर हैरी पुरनोमो का कहना है कि इस्लामिक नज़रिए से लोगों को जागरूक करना अपने आप में एक अनूठा प्रयोग है. लेकिन इस नज़रिए के साथ बहुत लंबे समय तक काम करना थोड़ा मुश्किल हो सकता है.

ख़ास कर तब, जब किसी क़ुदरती कारण से लोगों की मेहनत पर पानी फिर जाए. मिसाल के लिए एक खेत में हाथ से झाड़ियां हटाकर लोगों ने खेत साफ़ किया और वहां फसल बोई. लेकिन जैसे ही फ़सल तैयार हुई वहां जंगली सुअरों ने आकर तबाही मचा दी. ऐसे में लोगों के अक़ीदे या श्रद्धा का इम्तिहान होता है.

एक पेंच ये भी है कि स्थानीय चुनाव में ज़मीन का लेन-देन होता है. ऐसे में ज़मीन की क़ीमत बढ़ाने का आसान तरीक़ा यही है कि वहां आग लगाकर ज़मीन को साफ़ कर दिया जाए.

आग लगाने में सिर्फ़ छोटे किसान ही शामिल नहीं हैं. बल्कि, बड़े रसूख़ वाले भी इसमें शामिल हैं. लिहाज़ा स्थानीय लोगों के साथ- साथ वहां के सियासी रहनुमाओं को भी जागरूक करने की ज़रूरत हैं.

मनगूंजया भी इस बात से सहमत हैं कि सिर्फ़ मौलवियों के जारी किए फ़तवों से बहुत लंबे समय तक काम नहीं चलाया जा सकता.

इसमें स्थानीय नेताओं की भागीदारी भी ज़रूरी है. बहरहाल अभी तक मौलवियों के फ़तवों का परिणाम सकारात्मक और पर्यावरण के लिए मुफ़ीद साबित हुआ है.

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