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अवनी लेखरा ने पैरा शूटिंग वर्ल्ड कप में जीता गोल्ड
टोक्यो पैरालंपिक्स चैंपियन अवनी लेखरा ने पैरा शूटिंग वर्ल्ड कप में गोल्ड मेडल जीता है. अवनी लेखरा ने फ़्रांस में महिला 10 मीटर एयर राइफल में यह गोल्ड रिकॉर्ड स्कोर 250.6 के साथ जीता है.
20 साल की अवनी ने अपना ही 249.6 के स्कोर का विश्व रिकॉर्ड तोड़ दिया है. इस जीत के साथ ही उन्होंने 2024 के पेरिस पैरालंपिक्स में जगह बना ली है.
फ़्रांस के जिस पैरा शूटिंग वर्ल्ड कप में अवनी ने गोल्ड जीता, उसमें सिल्वर मेडल पोलैंड की एमिला बाबस्का को मिला है. एमिला का स्कोर 247.6 रहा था. ब्रॉन्ज़ मेडल स्वीडन की अना नोर्मान को मिला है. इनका स्कोर 225.6 रहा. तीनों को मेडल SH1 कैटिगरी में मिला है.
टोक्यो पैरालंपिक्स अवनी लेखरा ने असाका शूटिंग रेंज में महिलाओं की 10 मीटर एयर राइफ़ल स्टैंडिंग एस1 स्पर्धा में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रच दिया था.
तब 19 साल की अवनी पैरालंपिक खेलों में गोल्ड जीतने वाली पहली भारतीय महिला थीं.
कौन हैं अवनी
मूलतः जयपुर शहर की रहने वाली अवनी ने क़ानून की पढ़ाई की है. साल 2012 में एक कार दुर्घटना के बाद से वे स्पाइनल कॉर्ड (रीढ़ की हड्डी) से जुड़ी तकलीफ़ का सामना कर रही हैं.
इसके बाद वो व्हीलचेयर के सहारे ही चल पाती थीं लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और शूटिंग में अपनी किस्मत आज़माई, जहाँ उन्होंने लगातार सफलताएं हासिल कीं.
साल 2015 में जयपुर शहर में ही शूटिंग से उनकी नज़दीकी शुरू हुई और जगतपुरा स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में उन्होंने प्रैक्टिस शुरू कर दी.
अवनी के पिता ये चाहते थे कि वो खेलों में दिलचस्पी लें. शुरू में अवनी ने शूटिंग और तीरंदाज़ी दोनों में ही हाथ आज़माया. उन्हें शूटिंग में ज़्यादा दिलचस्पी महसूस हुई. अभिनव बिंद्रा की किताब से उन्हें काफ़ी प्रेरणा मिली और वो आगे बढ़ती गईं.
टोक्यो पैरालंपिक गेम्स में गोल्ड जीतना उनकी तमन्ना थी .
साल 2020 में कोरोना महामारी को लेकर उन्होंने कहा था कि इस वजह से न केवल उनकी शूटिंग की ट्रेनिंग प्रभावित हुई थी बल्कि फिज़ियोथेरेपी के रूटीन सेशन पर कोरोना का असर पड़ा था.
उन्होंने कहा था, "स्पाइनल कॉर्ड की तकलीफ़ के कारण मैं कमर से नीचे के हिस्से में कुछ महसूस नहीं कर सकती हूं. लेकिन फिर भी मुझे हर दिन अपने पैर की कसरत करनी पड़ती है."
"मेरी एक फ़िजियोथेरेपिस्ट हुआ करती थीं जो हर रोज़ घर आकर मेरे पैर की एक्सरसाइज़ कराती थीं. मेरी फ़िजियोथेरेपिस्ट को जयपुर शहर पार करके मेरे पास आना होता था."
"उनके बाद मेरे अभिभावकों ने मेरी मदद की और वे जो कर सकते थे, उन्होंने किया. शूटिंग की ट्रेनिंग मैं घर पर नहीं कर सकती थी. मैंने बिना गोलियों की प्रैक्टिस शुरू की."
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