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टोक्यो डायरी: 'ओलंपिक में मौजूद होना इस दुनिया से अलग अहसास है'
- Author, जान्हवी मुले
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, टोक्यो से
- प्रकाशित
जब भी मैं काम पर होती हूँ, मुझे एक कप गर्म ब्लैक कॉफ़ी से अपने दिन की शुरुआत करना अच्छा लगता है.
इसलिए जब भी मैं टोक्यो में मेन प्रेस सेंटर पहुँचती हूँ, जल्दी से एक रियूज़ेबल (दोबारा इस्तेमाल हो सकने वाला) कप लेकर कॉफ़ी कॉर्नर में जाती हूँ.
यहाँ टेबल पर एक बड़े भूरे कंटेनर में कॉफ़ी रखी होती है. साथ में होता है-गर्म और ठंडा पानी, टी बैग्स, चॉकलेट या स्नैक्स.
कल मैंने ध्यान दिया कि चॉकलेट्स को कागज के पैकेट में रखकर ख़ूबसूरती से रखा गया है. दिल के आकार में बने इन पैकेट्स पर छोटे-छोटे संदेश लिखे हुए थे.
मेरा ध्यान गुलाबी रंग के एक पैकेट पर गया, जिस पर लिखा था- हैव अ ब्रेक.
अजनबी पत्रकारों के लिए एक बच्ची का प्यारा तोहफ़ा
हम जैसे पत्रकारों के लिए ये कितना अहम मैसेज था, जो दिन भर अलग-अलग खेलों के वेन्यू तक पहुँचने के लिए दौड़ते-भागते रहते हैं.
मैंने वो पैकेट उठाया और उस पर लिखा संदेश पढ़कर मुस्कुरा रही थी, तभी यहाँ काम करने वाली एक वॉलिंटियर आईं. उनका नाम योशिको योशिदा है. योशिको ने अपनी टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में मुझे बताया कि उनकी छोटी सी बेटी ने ये पैकेट पत्रकारों के लिए बनाए हैं.
ये कितना प्यारा है न कि कोई अजनबियों के लिए ऐसा कुछ करे?
फिर योशिको ने मुझे बताया कि कैसे उनकी बेटी नन्ना ये ओलंपिक खेल देखना चाहती थी लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण दर्शकों का आना प्रतिबंधित है. टोक्यो शहर में आपातकाल लागू है और लोगों की आवाजाही पर रोक है.
फिर भी नन्ना ओलंपिक देखने वालों के लिए कुछ करना चाहती थी, इसलिए उसने ये पैकेट बनाए.
नन्ना ने जो किया, वो जापान की मेजबानी की परंपरा का ही हिस्सा है. यहाँ के लोग ओमोतेनाशी यानी ख़ातिरदारी के लिए जाने जाते हैं. ये बात मेरे दिल को छू गई कि कैसे एक छोटी सी बच्ची ने ओलंपिक के लिए कुछ करने के बारे में सोचा. ये पल मैं लंबे समय तक याद रखूँगी.
'मैं अपना सच होते देख रही हूँ'
सच कहूँ तो एक खेल पत्रकार के तौर पर टोक्यो में मैं अपना सच होते हुए देख रही हूँ. मैं अक्सर मज़ाक करती हूँ कि मुझे अपने फ़ेवरेट खेल देखने के लिए पैसे मिलते हैं लेकिन वाक़ई में ये सब कुछ सिर्फ़ मस्ती ही नहीं है.
हमसे उम्मीद की जाती है कि जैसे ही खेल खत्म हो हम इसकी ख़बरें और कहानी बताएं, विश्लेषण करें, स्टेडियम में जो देखा वो बताएं, खिलाड़ियों से बात करने और उनका इंटरव्यू करने की कोशिश करें और ओलंपिक में जो भी अच्छा या बुरा हो रहा है, उस पर रोशनी डालें.
इसका मतलब ये हुआ कि हम दिन भर एक स्टेडियम से दूसरे स्टेडियम में घूमते रहते हैं, बिना ये अहसास किए कब 10, 12 या 14 घंटे गुज़र गए. यह थकान भरा तो होता है लेकिन फिर खेलों के बारे में लिखना उतना ही संतोषजनक भी होता है.
हाँ, कई बार खीझ भी होती है. कोरोना महामारी ने खेल पत्रकारों की मुश्किलें बढ़ाई हैं, उनके लिए सफ़र करना और लोगों से मिलना मुश्किल हो गया है.
एक वरिष्ठ पत्रकार ने तो टोक्यो ओलंपिक को 'सबसे बुरा ओलंपिक' तक कहा क्योंकि यहाँ बबल के बाहर किसी से बात करना बहुत मुश्किल होता है. शायद इसीलिए जब आप यहाँ योशिदा जैसे लोगों से मिलते हैं तो वो कभी न भुला पाने वाली याद बन जाती है.
ये अनुभव आपको कई मायनों में मज़बूत और समृद्ध बनाते हैं. मुझे ये ऊर्जा खेल के मैदान पर और बाहर, हर जगह देखने को मिल रही है. ये वो यादें है, जो मैं हमेशा संजोकर रखूंगी.
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