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BBC Hindi: बीते हफ़्ते की वो ख़बरें, जो शायद आप मिस कर गए
हेलो. उम्मीद है कि आप अच्छे होंगे, खुश होंगे और सकारात्मक ऊर्जा के साथ जीवन में आगे बढ़ रहे होंगे.
हम जानते हैं कि व्यस्तता के बीच आपके लिए सारी ख़बरों पर नज़र रखना मुश्किल रहता होगा.
ऐसे में हम लाए हैं बीते सप्ताह की कुछ दिलचस्प और अहम ख़बरें, जिन पर शायद आपकी नज़र ना गई हो.
ये पांच ख़बरें आपने पढ़ लीं तो ये समझिए कि आप पूरी तरह से अपडेटेड हैं.
ऋषि सुनक: ब्रिटेन का पीएम बन इतिहास रचने की कितनी उम्मीद? ग्राउंड रिपोर्ट
एक ज़माना था जब भारतीय मूल के लोगों को ब्रिटेन में कई तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ता था. ये उनकी कल्पना से भी परे था कि एक दिन उनमें से कोई इस देश का प्रधानमंत्री बनने का ख़्वाव देखेगा.
ब्रिटेन में विपक्षी दल लेबर पार्टी के सांसद वीरेंद्र शर्मा अब 75 के हो चले हैं. वो 55 साल पहले पंजाब से लंदन आए थे.
अपने शुरुआती दिनों में भेदभाव का ज़िक्र करते हुए वीरेंद्र शर्मा ने बीबीसी हिंदी को बताया, "60 के दशक में यहाँ घरों के बाहर 'किराए के लिए उपलब्ध पर एशियन और कालों के लिए नहीं' लिखा होता था. क्लबों के बाहर लिखा होता था, 'कुत्ते, आयरिश, खानाबदोश और कालों को अंदर आने की इजाज़त नहीं'. अंग्रेज़ लोग इंडिया वालों को जब देखते थे तो कहते थे ये तो हमारे गुलाम थे अभी हमारे साथ बैठे हैं. वे इसका विरोध करते थे."
लेकिन अब ब्रिटेन में वीरेंद्र शर्मा की तरह कई भारतीय मूल के सांसद है. बोरिस जॉनसन की सरकार में कई कैबिनेट मंत्री भी भारतीय मूल के थे.
बोरिस जॉनसन के मंत्री रहे एक सांसद - ऋषि सुनक आज प्रधानमंत्री बनने की रेस में है. सुनक ब्रिटेन के वित्त मंत्री भी रह चुके हैं और कंज़र्वेटिव पार्टी के एक अहम नेता हैं. प्रधानमंत्री पद की रेस में 42 वर्षीय ऋषि सुनक का सामना लिज़ ट्रस है. ट्रस भी पार्टी की एक अनुभवी नेता हैं.
कंजर्वेटिव पार्टी के 160,000 सदस्य इन दोनों में से एक को वोट देकर, ब्रिटेन का अगला प्रधानमंत्री चुनेंगे. इसे रेस में कौन जीतेगा इसका पता पाँच सितंबर को लगेगा. तो क्या ये संभव है कि ब्रिटेन का अगला प्रधानमंत्री भारतीय मूल का हो सकता है? पूरी स्टोरी यहां पढ़ें...
चीन उसे एक "रिसर्च शिप" कहता है. यानी एक ऐसा नौसैनिक जहाज़ जिसका काम समुद्र में वैज्ञानिक अनुसंधान करना है.
भारत और अमेरिका जैसे देश उसे एक "स्पाई शिप" मानते हैं. यानि एक ऐसा जहाज़ दो दूसरे देशों की जासूसी करने के लिए तैनात किया जाता है.
युआन वांग 5 नाम के चीनी नौसैनिक जहाज़ का 16 अगस्त को श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह पहुँचाना भारत के लिए एक नया सिरदर्द बन गया है.
चीन का कहना है कि ये जहाज़ आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति करने के लिए हंबनटोटा में रुका है. साथ ही चीन ने कहा है कि जिस तरह की समुद्री वैज्ञानिक अनुसंधान से जुड़े काम ये जहाज़ करता है, वो अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक हैं.
चीन ने ये भी कहा है कि इस पोत की गतिविधियां किसी भी देश की सुरक्षा और आर्थिक हितों को प्रभावित नहीं करती हैं.
लेकिन भारत में चिंता जताई जा रही है कि हंबनटोटा बंदरगाह पर युआन वांग 5 के सात दिन रुकने से क्या इस जहाज़ को भारत की करीब से जासूसी करने का मौक़ा मिलेगा, जिससे भारत के सुरक्षा हित ख़तरे में पड़ सकते हैं. श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह से भारत के चेन्नई बंदरगाह का फासला करीब 535 समुद्री मील (नॉटिकल माइल) या 990 किलोमीटर है.
इसी तरह हंबनटोटा और कोच्चि बंदरगाह के बीच का फासला करीब 609 समुद्री मील या 1128 किलोमीटर है. पूरी स्टोरी यहां पढ़ें...
फ़ीफ़ा के बैन से निराश भारत की महिला फ़ुटबॉलरों को अब भी है उम्मीद
''मैं वर्ल्ड कप को लेकर काफ़ी उत्साहित थी. मैंने टीम में जगह नहीं बनाई लेकिन खेल देखने जाती. यह हमारे देश के लिए प्रतिष्ठा की बात थी कि वर्ल्ड कप की मेज़बानी करता. लेकिन अब स्थिति उलट हो गई है और यह मेरे लिए निराश करने वाला है.''
मुंबई की 17 साल की महिला फुटबॉलर सई अपना दुख इन शब्दों में बयान करती हैं.
भारत को अंडर-17 महिला फुटबॉल वर्ल्ड कप की मेज़बानी का मौक़ा मिला था. सई की तरह सभी युवा फुटबॉलरों, ख़ास कर लड़कियों में इसे लेकर ख़ुशी का माहौल था. लेकिन अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल की शासकीय संस्था फीफा ने ऑल इंडिया फ़ुटबॉल फेडरेशन (AIFF) को निलंबित कर दिया है.
AIFF भारत में खेलों का संचालन निकाय है. अब अक्टूबर 2022 में भारत में अंडर-17 महिला फुटबॉल विश्व कप के भविष्य पर सवालिया निशान लग गया है. फ़ीफ़ा ने कहा है कि AIFF में तीसरे पक्ष का अनुचित दख़ल है, इसलिए निलंबित करने का फ़ैसला लिया गया है.
सई ने कहा, ''इस विश्व कप के कारण खेलों को काफ़ी प्रोत्साहन मिलता. सभी की नज़रें भारत और भारत के खिलाड़ियों पर रहेंगी. इस विश्व कप के कारण भारत की जो लड़कियाँ फुटबॉल खेलना चाहती थीं, वे प्रोत्साहित होतीं. इसके अलावा कई लोग इसे देखने के बाद फुटबॉल खेलने का फ़ैसला करतीं.''
सई कहती हैं कि यह विश्व कप काफ़ी प्रेरणादायी होता. लेकिन अब ऊहापोह की स्थिति है. सई की तरह कई खिलाड़ी अब फुटबॉल पर ध्यान केंद्रित करना चाहती हैं लेकिन उन्हें लगता है कि इस तरह की चीज़ों का असर खेल पर बुरा पड़ता है.
लेकिन यह सब कैसे हुआ? क्या अभी कोई रास्ता बचा है कि भारत अक्टूबर में अंडर-17 महिला विश्व कप की मेज़बानी करे? पूरी स्टोरी यहां पढ़ें...
कोविड से अब तक अगर आप बचे हुए हैं तो क्यों, जानिए पांच वजहें
इस बात की संभावना है कि आपके परिवार में या दोस्तों के बीच कोई न कोई ऐसा व्यक्ति हो जो अब तक कोरोना वायरस से संक्रमित नहीं हुआ है.
आपको लग सकता है कि उनमें या तो सुपरपावर है या फिर उन्हें ये पता ही न हो कि अच्छी तरह से कोविड टेस्ट कैसे करवाएं.
लेकिन संभावना ये है कि या तो वे सौभाग्यशाली हैं या केवल विज्ञान की वजह से ऐसा अब तक नहीं हुआ है.
तो हम आपको वो पांच वजहें बता रहे हैं जिसके कारण ऐसे लोगों को अब तक कोविड नहीं हुआ है. पहली वजह तो यह हो सकती है कि अब तक कोविड से बचे लोग लॉकडाउन से पहले उन सुपर स्प्रेडर पार्टियों में शामिल नहीं हुए थे. ये लोग हमेशा ट्रेन के उस डिब्बे में सवार हुए हों जिसमें कोई कोविड यात्री न हो.
संभव है ऐसे लोग उस मीटिंग में शामिल थे, लेकिन कोविड से संक्रमित व्यक्ति के आने से पहले ही वहां से बाहर निकल आए हों.
ऐसा लगता तो नहीं है, लेकिन ये सच है कि कुछ लोग कोरोना संक्रमण के दौरान महीने दर महीने इसी तरह सौभाग्यशाली रहे हैं. पढ़िए पूरी स्टोरी...
राजेश खन्ना नहीं, इस हीरो को 'आनंद' बनाना चाहते थे ऋषिकेश मुखर्जी
1 जनवरी, 1971 के शुक्रवार के दिन मुंबई (तब बंबई) के एक कॉलेज में बहुत कम छात्र पहुँचे थे. स्टाफ़ रूम में मौजूद अध्यापकों की समझ में नहीं आया कि माजरा क्या है. इस दिन न तो कोई राष्ट्रीय छुट्टी थी और न ही कोई त्योहार. सारे छात्र आख़िर थे कहाँ?
कमरे में चाय लेकर दाख़िल हुए एक कैन्टीन ब्वॉय ने सारा राज़ उगला था. उस दिन राजेश खन्ना की फ़िल्म 'आनंद' रिलीज़ हुई थी और सभी छात्र वो फ़िल्म देखने गए थे.
ये सिर्फ़ एक कॉलेज की कहानी नहीं थी. उस दिन बंबई के कई कालेजों के छात्रों ख़ासकर लड़कियों ने अपने क्लास बंक कर अपने पसंदीदा स्टार की फ़िल्म 'आनंद' देखी थी.
उनके साथ कुर्ता और आँखों में धूप का चश्मा लगाए लड़के भी इस उम्मीद में फ़िल्म देखने पहुंचे थे कि शायद राजेश खन्ना की दीवानी लड़कियों में किसी एक की नज़र उन पर भी पड़ जाए.
फ़िल्म के निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी ने कहानी में हँसी और आँसुओं के इमोशंस को इस अंदाज़ में बुना था कि फ़िल्म देख कर हॉल से बाहर निकलने वाले हर शख़्स की आँखें भीगी हुई थीं.
यासिर उस्मान राजेश खन्ना की जीवनी 'राजेश खन्ना - द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ़ इंडियाज़ फ़र्स्ट सुपरस्टार' में लिखते हैं, 'राजेश खन्ना ने आनंद सहगल के चरित्र में जान फूँक दी थी. दर्शक उस चरित्र से पूरी तरह प्रभावित होकर फ़िल्म का डायलॉग बोलते हुए हॉल से बाहर निकले थे, 'ज़िंदगी बड़ी होनी चाहिए बाबू मोशाय, लंबी नहीं.'' पढ़िए पूरी स्टोरी...
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