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हैंस क्रिश्चियन ग्राम: गूगल पर क्यों छाया चश्मे और मूंछों वाला ये शख़्स
आज अगर आप गूगल डॉट कॉम पर जाएंगे तो आपको गोल चश्मा पहने सफेद मूंछों वाले एक व्यक्ति का स्केच, एक माइक्रोस्कोप और कुछ गुलाबी-बैंगनी बैक्टीरिया नुमा चीज़ें दिखेंगी.
तो ये मूंछों वाले व्यक्ति कौन हैं जिन्हें गूगल डूडल में याद किया गया है?
आपने स्कूली दिनों में माइक्रोस्कोप की आंख से बैक्टीरिया देखने के प्रैक्टिकल ज़रूर किए होंगे. क्या आपने सोचा था कि बैक्टीरिया को देखकर उसका वर्गीकरण करने का तरीक़ा किसने खोजा था?
ये खोज की थी माइक्रोबायोलॉजिस्ट हैंस क्रिश्च्यिन ग्राम ने जिन्हें आप गूगल डूडल में देख रहे हैं. शुक्रवार को उनकी 166वीं जयंती है.
13 सितंबर 1853 को डेनमार्क के कोपेनहेगन शहर में जन्मे ग्राम ने अपना करियर एक सरकारी अस्पताल में बतौर फिज़िशियन शुरू किया था.
ग्राम ने जो तरीक़ा खोजा, उससे बैक्टीरिया को अलग-अलग श्रेणी में बांटने में मदद मिली.
क्या है ग्राम की विधि
- बैक्टीरिया के जिस हिस्से का परीक्षण करना है, उसका बैंगनी रंग की डाई से संपर्क कराया जाता है.
- फिर उसका संपर्क आयोडीन सॉल्यूशन और ऑर्गैनिक सॉल्वेंट से किया जाता है.
- जिस बैक्टीरिया की कोशिकाओं की दीवार मोटी होती है, वो बैंगनी रंग का ही बना रहा है. उन्हें कहते हैं ग्राम-पॉज़िटिव.
- जिस बैक्टीरिया की कोशिकाओं की दीवार पतली होती है वो इस रंग को अपने भीतर नहीं रख पाती और उन्हें ग्राम-नेगेटिव कहा जाता है.
ग्राम ने ये खोज में उन लोगों के फेफड़ों के टिशूज़ के अध्ययन के वक़्त की थी जो बर्लिन में निमोनिया से मारे गए थे.
इस तरीक़े को ग्राम के नाम पर 'ग्राम स्टेन्स मेथड' कहा जाता है. ग्राम की मौत के आठ दशक बाद भी इसका ख़ूब इस्तेमाल किया जाता है.
कई वैज्ञानिक परीक्षणों के साथ यह बीमारियों का पता लगाने में भी उपयोगी है.
जिन बैक्टीरिया की जांच के परिणाम 'ग्राम नेगेटिव' होते हैं उनसे फेफड़ों, मूत्राशय, रक्त आदि से जुड़े संक्रमण का पता चलता है.
जिन बैक्टीरिया की जांच के परिणाम 'ग्राम पॉज़िटिव' होते हैं उनसे त्वचा के रोग और डिप्थीरिया आदि जैसे रोगों का पता चलता है.
हैंस क्रिश्च्यिन ग्राम ने अपना अध्ययन कोपेनहेगन विश्वविद्यालय में पूरी किया और इसके बाद उन्होंने जेपेटस स्टीनस्ट्रुप नामक जीव विज्ञानी के पास वनस्पति विज्ञान के सहायक के रूप में कार्य किया.
हैंस ने पौधों पर कई प्रकार के अध्ययन किए और फिर औषध विज्ञान पर महारत हासिल की.
ग्राम ने 1878 में कोपेनहेगन विश्विद्यालय से डॉक्टरेट किया था. 1879 में वे डॉक्टर बने. 1883 में उन्होंने अपनी जीवाणु विज्ञान और औषध विज्ञान विशेषज्ञता का विस्तार करते हुए यूरोप की यात्रा की थी और बैक्टीरियोलॉजी और फार्मेसी का अध्ययन किया था.
1884 में उन्होंने अपनी बैक्टीरिया को देखने की इस खोज को प्रकाशित किया था. 1900 में वो कोपेनहेगन विश्वविद्यालय में पैथोलॉजी के प्रोफेसर हो गए थे.
साल 1923 में उन्होंने काम से रिटायरमेंट लिया और 1938 में 85 साल की उम्र में उनकी मौत हो गई.
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