कभी चरमपंथी रहा वो शख़्स अब लोगों की ज़िंदगी बदल रहा है

    • Author, रेबेका हेंशकी और एन्डांग नुरदिन
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़
  • प्रकाशित

"मैं एक एक्सपर्ट बॉम्ब-मेकर हूं. मैं महज़ पाँच मिनट में बम बना सकता हूं."

अली फौज़ी जेमा इस्लामिया के एक अहम सदस्य थे. यह एक चरमपंथी संगठन है जिसके अल-क़ायदा के साथ लिंक हैं. यह संगठन इंडोनेशिया में हुए सबसे घातक चरमपंथी हमले के लिए ज़िम्मेदार था.

2002 में इंडोनेशिया के बाली में बम विस्फोट हुआ था जिसमें 200 से ज़्यादा लोग मारे गए थे.

फौज़ी बताते हैं, "मेरे भाइयों ने बाली में विस्फोट किए थे. इंडोनेशिया के टूरिस्ट इलाक़े बाली में रखा गया यह एक बड़ा बम था."

इस समूह ने इंडोनेशिया में कई बम विस्फोट किए. इनमें प्रमुख होटलों और पश्चिमी देशों के दूतावासों पर किए गए भयंकर हमले शामिल थे.

पूर्वी जावा के लामोंगान में मौजूद तेंगुलुम गांव में इस समूह का बेसकैंप था.

ज़िंदगी का मक़सद बदला

लेकिन अब अली फौज़ी का मिशन बिलकुल अलग है. वो जिहादी रह चुके लोगों की मदद करते हैं और उन्हें हिंसा का रास्ता छोड़ने के लिए मनाते हैं.

साथ ही वो दक्षिणपूर्व एशिया में चरमपंथी समूहों से जुड़ने वाले लोगों को भी ऐसा करने से रोकते हैं.

वो कहते हैं, "हकीक़त यह है कि चरमपंथी समूहों के लिए लोगों की नियुक्ति करना कहीं ज़्यादा आसान है."

वो कहते हैं, "उन्हें बस ट्रिगर दबाना होता है और कई लोग उनके साथ जुड़ने के लिए राज़ी हो जाते हैं, लेकिन लोगों को कट्टरता से बाहर निकालने में वक्त लगता है. चरणबद्ध तरीक़े से ऐसा करना पड़ता है."

अपने नए मिशन के लिए उन्हें एक बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ी है.

कट्टरता से निकालने के काम में जान का ख़तरा

अली फौज़ी कहते हैं, "मुझे गंभीर ख़तरा है. मुझे केवल धमकियों का ही सामना नहीं करना पड़ रहा, बल्कि मेरी जान भी ली जा सकती है. लेकिन, ईमानदारी से कहूं तो मुझे डर नहीं लगता क्योंकि मैं जानता हूं कि मैं जो कर रहा हूं वो सही है. मैं ऐसा करते हुए मरने के लिए तैयार हूं."

अपने शांत से गांव में अफ़ग़ानिस्तान, बोस्निया और फ़लस्तीन से जुड़े संघर्ष के वीडियो मोबाइल फ़ोन पर देखने से अली फौज़ी और उनके भाई चरमपंथी समूहों के साथ जुड़ने के लिए प्रोत्साहित हुए थे.

वो कहते हैं, "हमने आम नागरिकों पर हो रहे क्रूर हमलों के वीडियो देखे थे. मैं मुसलमान लोगों को इनसे बचाने के लिए जिहाद करना चाहता था. मैं युवा था और उन्हें कड़ी टक्कर देना चाहता था."

हालांकि, उनके भाई मुजाहिदीन के साथ लड़ने के लिए अफ़ग़ानिस्तान चले गए, लेकिन अली फौज़ी घर के नज़दीक ही रहे और वो दक्षिणी फ़िलीपींस में मुस्लिम होमलैंड के लिए लड़ाई लड़ने के लिए इस्लामिक चरमपंथियों के साथ जुड़ गए.

उन्होंने कहा, "मैं वास्तव में वहां मरना चाहता था. मैं हर वक्त अपनी मौत के बारे में सोचा करता था."

वो कहते हैं, "मैं मानता था कि अगर मैं जंग में मारा गया तो मैं सीधा जन्नत में जाऊंगा और वहां मुझे हूरें मिलेंगी. हमारे संरक्षक हमें हर रोज़ यही बताते थे."

दो भाइयों को धमाकों के सिलसिले में मिली मौत की सज़ा

जब उनके भाई अफ़ग़ानिस्तान से वापस लौटे तो उन्होंने वहां सीखी हुई बातों का चलन यहां शुरू कर दिया.

अक्टूबर 2002 में वो उस समूह का हिस्सा थे जिसने बाली के कुता इलाक़े में नाइटक्लबों को निशाना बनाकर दो बम विस्फोट किए थे. यह द्वीप अंतरराष्ट्रीय टूरिस्ट्स के लिए मशहूर है.

वो कहते हैं, "मैंने इसे टीवी पर देखा और मैं सदमे में था. इन धमाकों में कई लोग मारे गए थे. इन्हीं धमाकों के चलते अफ़सर हम तक पहुंच गए."

उनके दो भाई अली गुफ़रोन और अमरोज़ी को मौत की सज़ा दी गई, जबकि तीसरे भाई अली इमरोन को आजीवन कारावास की सज़ा मिली.

अली फौज़ी ने ज़ोर दिया कि वो बाली बॉम्बिंग में शामिल नहीं थे. लेकिन, उन्हें चरमपंथ से संबंधित आरोपों में तीन साल जेल में गुजारने पड़े. इसके बाद से उनकी जिंदगी एक नई राह पर चल पड़ी.

पुलिस के अच्छे बर्ताव ने बदली ज़िंदगी

अली फौज़ी बताते हैं, "पुलिस ने मेरे साथ बेहद मानवीय व्यवहार किया. अगर वो मुझे टॉर्चर करते तो मेरे बाद की शायद अगली सात पीढ़ियों तक इंडोनेशियाई सरकार के साथ हमारी जंग जारी रहती."

"मैं पुलिस से नफ़रत करता था. हम उन्हें शैतान मानते थे. हमें यही सिखाया गया था. लेकिन, हकीक़त इससे बिलकुल अलग थी. इसके बाद से मेरा नज़रिया पूरी तरह से बदल गया."

वो बॉम्बिंग के शिकार हुए लोगों से भी मिले. वो कहते हैं, "उनसे मिल कर मैं रो पड़ा. बम धमाके के भयानक परिणाम को देखकर मेरा दिल पिघल गया था. तब मैंने फैसला किया कि मैं युद्ध करने वाले एजेंट की जगह शांति के योद्धा के तौर पर काम करूंगा."

गांव में खोला सर्किल ऑफ़ पीस फाउंडेशन

तेंगुलुम गांव में शाम की अज़ान के वक्त गांव की मुख्य मस्जिद के बगल में चौराहे पर नमाज़ की मैट्स बिछाई गईं. इसके ठीक आगे सर्किल ऑफ़ पीस का दफ़्तर है.

सर्किल ऑफ़ पीस अली फौज़ी का फाउंडेशन है जिसकी नींव उन्होंने 2016 में रखी ताकि लोगों को चरमपंथ की राह में जाने से रोका जा सके.

आज रात की इबादत की अगुवाई बम धमाके के दो पीड़ित कर रहे हैं. वे इस गांव में मुख्य अतिथि के तौर पर आए हैं. कभी यह गांव ऐसे चरमपंथी समूहों का बेस कैंप हुआ करता था जिन्होंने बम धमाके किए थे और इन लोगों की जिंदगियां तबाह कर दी थीं.

अली फौज़ी कहते हैं, "मैं अक्सर पीड़ितों को कम्युनिटी में लाता हूं. क्योंकि उनसे मुलाक़ात ने ही मेरा अहंकार ख़त्म किया था."

मंच के बग़ल में लगी स्क्रीन पर चल रहे एक ग्राफ़िक वीडियो में इंडोनेशिया में हुए सभी बम धमाकों के बाद के दृश्य दिखाए जा रहे थे.

यह एक असाधारण मीटिंग है. दर्शकों में पुलिसवाले भी हैं जिन्होंने इस कम्युनिटी के सदस्यों को अरेस्ट किया था, इसके साथ ही दर्शकों में ऐसे लोग भी शामिल हैं जिन्होंने चरमपंथ के आरोपों में जेल में वक्त गुज़ारा था.

ये लोग बॉम्बिंग के पीड़ितों की बातें सुन रहे हैं और उनकी आंखों से आंसू बह रहे हैं.

पिता को मिली मौत की सज़ा, लेकिन बेटा शांति की राह पर निकल पड़ा

इन दर्शकों में 33 साल के ज़ूलिया महेंद्र भी हैं. वो टीनेजर थे जब उनके पिता अमरोज़ी को बाली बॉम्बिंग के मामले में अरेस्ट किया गया था. उन्हें मौत की सज़ा सुनाई गई और बाद में उन्हें फांसी दे दी गई.

अमरोज़ी को मीडिया में "मुस्कुराता हुआ हत्यारा" बताया गया क्योंकि ट्रायल के दौरान उन्होंने किसी तरह का पछतावा नहीं दिखाया.

मीटिंग के बाद महेंद्र ने दोनों बम पीड़ितों को धन्यवाद दिया. उन्होंने उन्हें गले लगाया और हाथ उनके पकड़े, वो उनसे लगातार माफ़ी मांगते रहे.

महेंद्र ने कहा, "मैं माफ़ी मांगना चाहता हूं. इसलिए नहीं कि मैं गलत हूं, बल्कि इसलिए क्योंकि वो मेरे पिता थे और ये लोग मेरे परिवारजनों के किए काम के कारण पीड़ित हैं. मेरे पिता की ओर से सॉरी बोलना मेरी ज़िम्मेदारी है."

महेंद्र खुद को भी बदल चुके हैं. वो मानते हैं, "जब मेरे पिता को फांसी दी गई, तब मैं बदला लेना चाहता था. मैं भी बम बनाना सीखना चाहता था."

वो कहते हैं, "लेकिन, वक्त के साथ और मेरे चाचा- अली फौज़ी और अली इमरोन के गाइडेंस ने मुझे यह अहसास कराया कि ऐसा योचना या करना ग़लत है. फिर मैं उनके प्रोजेक्ट से जुड़ गया और दूसरे चरमपंथियों को बदलने के लिए मदद करने लगा."

महेंद्र कहते हैं, "जो कुछ मैं आज हूं वैसा बनने में मुझे लंबा सफ़र तय करना पड़ा है."

वो कहते हैं, "अब मैं ऐसी जगह पहुंच गया हूं जहां मुझे समझ आ गया है कि जिहाद का मक़सद लोगों को मारना या लड़ना नहीं है, इसका मतलब अपने परिवार के लिए कड़ा संघर्ष करना है."

जिहाद का मक़सद परिवार की देखरेख

महेंद्र कहते हैं कि एक रात उन्होंने अपने सोते हुए बच्चे को देखा और बतौर पिता अपने बारे में सोचा.

वो कहते हैं, "मैं नहीं चाहता था कि मेरा बेटा भी उन्हीं हालातों का सामना करे जिनसे मैं गुज़रा था. अगर मैं अपने पिता के रास्ते पर चलता तो मेरा बेटा अनाथ हो जाता. मुझे पता था कि असली जिहाद अपने परिवार की देखभाल करना और उन्हें सुरक्षा देना है."

लेकिन, वो कहते हैं कि उनके कुछ दोस्त इंडोनेशिया में चरमपंथी समूहों में गए हैं, इन संगठनों के तार इस्लामिक स्टेट (आईएस) ग्रुप से भी जुड़े हैं.

वो कहते हैं, "कई वजहों से कोई शख्स उस दिशा में जाता है. इसमें उनके आर्थिक हालात, करने के लिए कुछ भी न होना…उन्हें क्या सिखाया गया है और वे किनसे प्रभावित हैं, जैसे कई कारण होते हैं."

जेल में आए चरमपंथियों को समझाने की कोशिश

अली फौज़ी लामोंगान जेल पहुंचते हैं. यह जगह उनकी जानी-पहचानी हुई है. सज़ा काट रहे अपने परिवार के सदस्यों से मिलने के लिए वो कई बार यहां आए हैं. इसके अलावा वो जेल के नए कैदियों के साथ भी काम करते हैं और उनकी जिंदगी बदलने की कोशिश करते हैं.

वो कहते हैं, "मेरा डीरैडिकलाइजेशन का काम किसी थ्योरी पर आधारित नहीं है. यह मेरे जीवन के अनुभव से जुड़ा हुआ है. मैं एक लड़का और चरमपंथी था, ऐसे में मैं सेल में उनके दोस्त के तौर पर आता हूं."

लेकिन, उन्हें प्रतिरोध भी झेलना पड़ता है. कुछ लोग उन्हें गद्दार मानते हैं जो कि पुलिस के साथ मिल गया है.

वो कहते हैं, "मुझे वो लोग पुलिस या जेल गार्ड्स से कहीं बड़ा काफ़िर कहते हैं. मैं नियमित तौर पर ऑनलाइन भी गालियां मिलती रहती हैं और फ़ोन कॉल्स पर मुझे धमकियां भी दी जाती हैं. लेकिन, यह सब चलता है, मैं इसे हैंडल कर सकता हूं."

"2016 से हमने जिन 98 लोगों के साथ काम किया उनमें से दो जेल से बाहर आ चुके हैं और वे सीधे अपने चरमपंथी रास्ते पर बढ़ गए."

"कट्टरता ख़त्म करना आसान नहीं है क्योंकि आपको लोगों की भावनाओं और सोचने के तरीके से निबटना पड़ता है. आपको उन्हें सही दवा देनी होती है और कई बार हम ग़लत साबित होते हैं."

सुमर्णो की कहानी

कई बार ज़िंदगी के रास्त सही दिशा में जाते हैं.

अली फौज़ी बताते हैं कि सुमर्णो का मामला ऐसी ही एक सक्सेस स्टोरी है. एक दिन वो मुझे एक सूखे खेत में ले गया. गांव के बाहर सड़क के किनारे उसका खेत था. सुमर्णो ने बताया कि बाली बॉम्बिंग के बाद वहां उसने हथियार छिपा दिए थे. ये हथियार जेमा इस्लामिया के थे.

जेल में तीन साल काटने के बाद अली फौज़ी ने एक छोटा धंधा खड़ा करने में सुमर्णो की मदद की. यह एक ट्रैवल कंपनी का काम था जिसमें मक्का तीर्थयात्रा के लिए विशेष पैकेज दिए जाते हैं.

सुमर्णो कहते हैं, "अब मैं समाज के लिए कुछ करना चाहता हूं. अपनी ट्रैवल कंपनी के साथ मुझे उम्मीद है कि मैं हिंसा की जिंदगी अपने पीछे छोड़ सकता हूं."

पैसीरान में मौजूद अपने स्मार्ट एयर-कंडीशनर लगे दफ़्तर में बैठे वो कहते हैं कि पहले वो अपने क्लाइंट्स को अपने हिंसक अतीत के बारे में बताने में डरते थे, यहां तक कि वो यह तक नहीं बताते थे कि उनके गांव का नाम क्या है.

लेकिन, अब वो इससे उबर चुके हैं और वो इसे अपनी मुक्ति की कहानी बताते हैं.

सुमर्णो बताते हैं, "मैं लोगों से कहता हूं कि मैं अली गुफ़रोन और अमरोज़ी का कज़न हूं जिन्हें बाली बॉम्बिंग्स के लिए मौत की सज़ा दे दी गई थी. मैं उन्हें बताता हूं कि मैं उनके समूह का हिस्सा था. लेकिन, अल्लाह का शुक्रिया. मैं अब उस बुरी सोच से बाहर निकल आया हूं. और अब मैं मक्का के लिए आपका टूर गाइड हूं."

बच्चों को पढ़ाने का काम

गांव की मस्जिद के बगल में बना एक कमरे का इस्तेमाल स्कूल ख़त्म होने के बाद, क्लब के तौर पर किया जाता है.

यहां बच्चे रंगीन कपड़े पहनकर आते हैं और क़ुरान पढ़ते हैं.

इनमें से कुछ के पेरेंट्स चरमपंथ के आरोप में जेलों में बंद हैं. इन्हें पढ़ाने वाले शिक्षकों में अली फौज़ी की पत्नी, लूलू और जुमरोत्तिन निसा शामिल हैं जिनकी शादी अली इमरोन से हुई थी.

लूलू कहती हैं, "हम उन्हें बताते हैं कि हर कोई उसी तरह से नहीं सोचता है. हम बताते हैं कि हमारी कम्युनिटी में ग़ैर-मुस्लिम लोग भी हैं और जब तक वे हमारी आस्था में दखल नहीं देते हैं, हमें उनके साथ सम्मान से पेश आना चाहिए."

लेकिन, वो कहती हैं कि वो हर किसी को नहीं समझा सकते.

हर किसी को समझाना आसान नहीं

लूलू कहती हैं, "कुछ लोग हमारे मिशन के साथ हैं और कुछ इसके ख़िलाफ़ भी हैं. जो लोग अभी भी चरमपंथियों के साथ हैं वे हमें पसंद नहीं करते. वे हमसे दूर रहते हैं."

वो कहती हैं, "कभी हम एक ही ग्रुप हुआ करते थे, लेकिन बाली बॉम्बिंग में कई निर्दोष लोगों के मरने के बाद हमने अपना रास्ता बदल लिया. मरने वालों में कई मुस्लिम भी थे. हालांकि, कई लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने अपना रास्ता नहीं बदला."

महिलाओं का चरमपंथ में शामिल होना परेशानी का सबब

पिछले साल मई में आत्मघाती बॉम्बर्स के एक परिवार ने पूर्वी जावा के तीन चर्चों पर हमला किया था.

पिता ने एक चर्च पर हमला किया था. उनके टीनेज बेटों ने दूसरे पर और उनकी पत्नी और 12 साल और 9 साल की दो बेटियों ने ख़ुद को तीसरे चर्च में उड़ा लिया.

हमलावर जामा अंशारुत दौला (जेएडी) नेटवर्क का हिस्सा थे. यह संगठन मोटे तौर पर आईएस से जुड़ा हुआ है.

जेएडी ने इंडोनेशियाई सुरक्षा बलों और धार्मिक अल्पसंख्यकों पर कई लोन वुल्फ़ अटैक किए हैं. इनमें सबसे हालिया हमला एक चाक़ूबाज़ी का मामला था. एक युवा कपल ने देश के टॉप सिक्योरिटी अफ़सर विरांतो के ख़िलाफ़ इस हमले को अंजाम दिया था.

सर्किल ऑफ़ पीस के दफ़्तर में लूलू फौज़ी कहती हैं कि महिलाओं को इस तरह के काम करते हुए देखकर वो शॉक्ड हो जाती हैं.

वो कहती हैं, "मेरे पति कड़ी मेहनत करते हैं और यह सुनश्चित करते हैं कि पहले चरमपंथी रहे लोग वापस इससे न जुड़ें. वो उन्हें एक साथ लाते हैं और वो कई लोगों की जिंदगियां बदल चुके हैं."

"लेकिन, कई लोग अभी भी चरमपंथ की राह चुनते हैं. हम इसे कभी भी पूरी तरह से ख़त्म नहीं कर सकते हैं."

लोगों की मदद का काम

गांव पहुंचने के दौरान अली फौज़ी का फ़ौन लगातार बजता रहा. वो एक ऐसे शख्स की कॉल उठाते हैं जिसे हाल में ही चरमपंथ के आरोपों में जेल की सज़ा पूरी करने के बाद रिहा किया गया था. इस शख्स को घर के लिए मदद चाहिए थी.

एक अन्य कॉल एक मां की थी जिसके बेटे से पुलिस ने पूछताछ की थी.

वो कहते हैं, "हमारी कम्युनिटी के दर्जनों लोग सीरिया और इराक में इस्लामिक स्टेट के साथ लड़ने गए थे. कुछ वक्त पहले ही एक आईएस मेंबर को पुलिस ने यहां पकड़ लिया था. ऐसे में चरमपंथी समूह अभी भी बने हुए हैं और वो लगातार इंडोनेशिया को धमका रहे हैं."

अब वो उस तरफ़ हैं जिसे वो चरमपंथ और असहिष्णुता के ख़िलाफ़ जंग बताते हैं.

"अगर हम कड़ी मेहनत करते हैं और पूरी कम्युनिटी को शामिल करते हैं तो मुझे अभी भी उम्मीद है कि हम इस लड़ाई को जीत सकते हैं."

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