बनारस के ज़िला जज एके विश्वेश की अदालत ने हिन्दू पक्ष की ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में पाए गए कथित शिवलिंग की वैज्ञानिक जांच और कार्बन डेटिंग की मांग को ख़ारिज कर दिया है.
चार महिला हिन्दू पक्षकारों ने यह मांग कोर्ट के सामने रखी थी और मुख्य पक्षकार राखी सिंह ने इसका विरोध किया था.
आपको बता दें कि इसी साल मई के महीने में हुए सर्वे में हिन्दू पक्ष का दावा था कि ज्ञानवापी मस्जिद के वज़ुखाने के बीचबीच एक शिवलिंग बरामद हुआ है.
ज्ञानवापी मस्जिद समिति ने इस फव्वारा बताया था. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिद समिति की मांग पर इसे सील कर सुरक्षित करने के आदेश दिए थे.
यह साबित करने के लिए कि सील किया गया ढांचा शिवलिंग है, हिन्दू पक्ष ने वैज्ञानिक जाँच और कार्बन डेटिंग की प्रक्रिया की अदालत से मांग की थी.
किन कारणों से हुई कार्बन डेटिंग की मांग ख़ारिज
अपने आदेश में ज़िला जज एके विश्वेश ने कार्बन डेटिंग की हिन्दू पक्ष की मांग को खारिज करते हुए कहा कि, "उल्लेखनीय है कि उच्च न्यायालय के 17 मई 2022 को निर्देशित किया है कि अधिवक्ता कमिश्नर की कार्रवाई के दौरान जो कथित शिवलिंग पाया गया है उसे सुरक्षित रखा जाए."
जज विश्वेश ने कहा, "ऐसी स्थिति में यदि कार्बन डेटिंग की तकनीक का प्रयोग करने पर या ग्राउंड पेनेट्रेटिंग राडार का प्रयोग करने पर उक्त कथित शिवलिंगम को क्षति पहुँचती है तो यह उच्चतम न्यायालय के 17 मई 2022 के आदेश का उल्लंघन होगा. ऐसा होने पर आम जनता की धार्मिक भावनाओं को भी चोट पहुँच सकती है."
जज विश्वेश ने ये भी कहा, "मेरा यह भी विचार है कि इस स्तर पर अधिवक्ता कमिश्नर की कार्रवाई में पाए गए कथित शिवलिंगम की आयु, प्रकृति और संरचना का निर्धारण करने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वे को निर्देश दिया जाना भी उचित नहीं होगा और ऐसा करने से इस वाद में अंतर्निहित प्रश्नों के न्यायपूर्ण समाधान की कोई संभावना प्रतीत नहीं होती है."
इसके बाद अदालत ने इस मांग को ख़ारिज करने का फ़ैसला सुनाया.
क्या कहना है हिन्दू पक्ष के वकीलों का?
हिंदू पक्ष के मुख्य वकील विष्णु शंकर जैन ने कोर्ट से कार्बन डेटिंग की जांच की मांग ख़ारिज होने के बाद कहा कि "न्यायालय ने ये तर्क दिया कि क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 17 मई के आर्डर से उस एरिया को सील कर रखा था. तो उसमें अगर हम कोई भी आर्डर पास करेंगे तो वो उस आर्डर का उल्लंघन होगा."
विष्णु शंकर जैन कहते हैं कि वो इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे.
उन्होंने मीडिया से कहा कि, "ये ऑर्डर अगेंस्ट दी रिकॉर्ड है. क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 20 मई के आर्डर से ट्रायल कोर्ट को पावर दी थी, की वो सारी एप्लीकेशन डिसाइड करे. सारी महिलाएं याचिकाकर्ता इस मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट गए थे कि ट्रायल कोर्ट को अप्रोच करिए. तो ट्रायल कोर्ट आज कह रहा है हम नहीं कर सकते क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने सील कर रखा है तो इस मांग को लेकर हम दोबारा सुप्रीम कोर्ट जाएंगे."
महिला वादी राखी सिंह ने कार्बन डेटिंग का विरोध किया था.
इसके बारे में चार अन्य महिला याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने कहा कि, "वो तो इस पूरी मांग के ख़िलाफ़ थीं. और उन्होंने एफिडेविट दी थी की साइंटिफिक जांच होनी नहीं चाहिए, तो ये चार महिला याचिकाकर्ता रेखा पाठक, सीता साहू, मंजू व्यास, लक्ष्मी देवी इन चारों की मांग है कि इसमें सांइटिफिक जांच होनी चाहिए तो हमारी जो एप्लीकेशन रिजेक्ट हुई है और उसके विरुद्ध हम सुप्रीम कोर्ट जाएंगे."
क्या है मस्जिद समिति के वकील का कहना?
ज्ञानवापी मस्जिद का प्रबंधन देखने वाली अंजुमन इंतजामिया मस्जिद के वकील मोहम्मद तौहीद खान कहते हैं कि "माननीय न्यायालय ने अपने फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सम्मान किया और जनता की धार्मिक आस्था का भी ख़्याल रखते हुए कार्बन डेटिंग की एप्लीकेशन निरस्त कर दिया है."
वे कहते हैं कि "उनकी शिवलिंग के संबंध में कार्बन डेटिंग की डिमांड की गई थी जबकि जो तथाकथित शिवलिंग है वो सब्जेक्ट मैटर इन सूट (वाद का मुद्दा) नहीं हैं सब्जेक्ट मैटर इन इश्यू नहीं है. वाद में पूजा अर्चना का दावा है और उसको डायवर्ट करने के लिए बिना वजह कार्बन डेटिंग की मांग की गई थी."
आपको बता दें कि अदालत के सामने कार्बन डेटिंग की मांग का विरोध करते हुए मुस्लिम पक्ष ने ही यह दलील दी थी कि कथित शिवलिंग को सुप्रीम कोर्ट के आदेश से सील किया गया है और किसी निर्जीव वस्तु की कार्बन डेटिंग की जाँच नहीं हो सकती है.
क्या होती है कार्बन डेटिंग की जांच?
कार्बन डेटिंग एक व्यापक रूप से उपयोग की जाने वाली विधि है, जिसका उपयोग कार्बनिक पदार्थों की आयु को जानने के लिए किया जाता है, जो चीज़ें कभी जीवित थीं. जीवित चीजों में विभिन्न रूपों में कार्बन होता है.
डेटिंग पद्धति इस तथ्य का उपयोग करती है कि कार्बन का एक विशेष समस्थानिक (आइसोटोप) होता है, जिसे सी-14 कहा जाता है, जिसका परमाणु द्रव्यमान (मास) 14 है, यह रेडियोधर्मी है और समय के साथ यह जैविक शरीर में कम होने लगता है.
तो किसी पौधे या जानवर के मरने के बाद, शरीर में कार्बन -12 से कार्बन -14 का अनुपात या उसके अवशेष बदलना शुरू हो जाते हैं.
इस परिवर्तन को मापा जा सकता है और इसका उपयोग जीव की मृत्यु के अनुमानित समय को निकालने के लिए किया जाता है.
हालांकि अत्यंत प्रभावी, कार्बन डेटिंग को सभी परिस्थितियों में लागू नहीं किया जा सकता है.
विशेष रूप से, इसका उपयोग निर्जीव चीजों की उम्र निर्धारित करने के लिए नहीं किया जा सकता है, जैसे कि उदाहरण के लिए चट्टानें.
साथ ही, कार्बन डेटिंग के माध्यम से 40,000-50,000 वर्ष से अधिक की आयु की गणना नहीं की जा सकती है.
ऐसा इसलिए है क्योंकि आधे जीवन के आठ से दस चक्र पार करने के बाद, कार्बन -14 की मात्रा लगभग नगण्य हो जाती है.
क्या किसी ऐतिहासिक ढांचे की कार्बन डेटिंग हो सकती है?
यह समझने और जानने के लिए बीबीसी ने लखनऊ के बीरबल साहनी पुरावनस्पति विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक डॉक्टर राजेश अग्निहोत्री से बात की.
उन्होंने बीबीसी को बताया कि रेडियो कार्बन डेटिंग एकमात्र तरीका है जिसके माध्यम से सभी जीवित वस्तुओं की उनके मौत के बाद उनकी आयु के बारे में जानकारी मिल सकती है. इस जानकारी को बाद में पुरातात्विक जानकारी से जोड़ कर देखा और समझा जा सकता है.
तो क्या निर्जीव चीज़ों की कार्बन डेटिंग की जा सकती है?
डॉक्टर राजेश अग्निहोत्री बताते हैं, "पत्थरों और धातुओं की डेटिंग नहीं हो सकती है क्योंकि उनमें कार्बन नहीं होता है. लेकिन जब निर्जीव वस्तुओं की स्थापना होती है तो उनके साथ दूसरे जैविक सामान जैसे अनाज, कपड़े, लकड़ी, रस्सी जैसी कोई दूसरी चीज़ें भी मिल जाती हैं जिनकी कार्बन डेटिंग हो सकती है."
तो क्या इन जैविक सामान से किसी ढांचे की उम्र का अंदाजा लगाया जा सकता है?
इस सवाल के जवाब में डॉक्टर राजेश अग्निहोत्री कहते हैं, "निश्चित रूप से इस तकनीक के इस्तेमाल से किसी ढांचे की विश्वसनीय उम्र का पता लगाया जा सकता है, जिसे उस समय की दूसरी पुरातात्विक जानकारी के साथ जोड़ कर देखा जाना चाहिए."
राजेश अग्निहोत्री कहतें है कि कार्बन डेटिंग तकनीक का इस्तेमाल राम जन्म भूमि और इमामबाड़े के ऐतिहासिक संदर्भ को स्थापित करने के लिए भी किया गया था. ये जांच भारतीय पुरातत्व विभाग से मिले सैम्पल पर की गयी थी. इन सैम्पल्स को एएसआई और बीरबल साहनी पुरावनस्पति विज्ञान संस्थान ने मिल कर एकत्रित किया था.