भारत का विदेशी मुद्रा भंडार पिछले 15 महीने में सबसे निचले स्तर पर पहुँचा

इमेज स्रोत, Getty Images
भारत की अर्थव्यवस्था के लिए आजकल बुरी ख़बरों का सिलसिला थम नहीं रहा है. डॉलर की तुलना में भारतीय रुपया ऐतिहासिक रूप से 80 के पार पहुँच गया है.
यानी एक डॉलर की क़ीमत 80 रुपए से ज़्यादा हो गई है. इसके साथ ही भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में भी लगातार गिरावट आ रही है. भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में 8.062 अरब डॉलर की गिरावट आई है और यह 580.252 अरब डॉलर हो गया है. यह पिछले 15 महीनों में सबसे निचले स्तर पर आ गया है. रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के साप्ताहिक आँकड़े शुक्रवार को जारी किए गए थे.
आरबीआई का कहना है कि फॉरन करेंसी एसेट यानी एफ़सीए में गिरावट के कारण सबसे ज़्यादा असर पड़ा है. इसके साथ ही गोल्ड रिज़र्व में भी गिरावट आई है. आठ जुलाई को एफ़सीए में 6.656 अरब डॉलर की गिरावट आई थी और यह 518.089 अरब डॉलर पर पहुँच गया था.
एफ़सीए डॉलर के अलावा पाउंड, यूरो और येन जैसी मुद्राओं में उतार-चढ़ाव से भी प्रभावित होता है. गोल्ड रिज़र्व में 1.236 अरब डॉलर की गिरावट आई है और यह 39.186 अरब डॉलर पर पहुँच गया है. इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के एसडीआर में भी 12.2 करोड़ डॉलर की गिरावट आई है और यह 18.012 अरब डॉलर पर पहुँच गया है.

इमेज स्रोत, Getty Images
जून 1991 में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग ख़ाली हो चुका था. एक अरब डॉलर से भी कम बचा था. ये डॉलर महज़ 20 दिनों के तेल और फ़ूड बिल के भुगतान में ख़त्म हो जाते.
भारत के पास इतनी विदेशी मुद्रा भी नहीं थी कि बाक़ी दुनिया से कारोबार कर सके. भारत का विदेशी क़र्ज़ 72 अरब डॉलर पहुँच चुका था. ब्राज़ील और मेक्सिको के बाद भारत तब दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा क़र्ज़दार देश था. देश की अर्थव्यवस्था और सरकार से लोगों का भरोसा ख़त्म होने लगा था. महंगाई, राजस्व घाटा और चालू खाता घाटा दोहरे अंक में पहुँच गए थे.
विदेशी मुद्रा ज़रूरी क्यों?
किसी भी अर्थव्यवस्था में विदेशी मुद्रा का पर्याप्त होना कई मामलों में बेहद अहम है. विदेशी मुद्रा से मतलब अमेरिकी डॉलर से है. अमेरिकी मुद्रा डॉलर की पहचान एक वैश्विक मुद्रा की बन गई है. अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर और यूरो काफ़ी लोकप्रिय और स्वीकार्य हैं. दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों में जो विदेशी मुद्रा भंडार होता है, उनमें 64 फ़ीसदी अमेरिकी डॉलर होते हैं. ऐसे में डॉलर ख़ुद ही एक वैश्विक मुद्रा बन जाता है. डॉलर वैश्विक मुद्रा है, यह उसकी मज़बूती और अमेरिकी अर्थव्यवस्था की ताक़त का प्रतीक है.
इंटरनेशनल स्टैंडर्ड ऑर्गेनाइज़ेशन लिस्ट के अनुसार, दुनिया भर में कुल 185 करेंसी हैं. हालांकि, इनमें से ज़्यादातर मुद्राओं का इस्तेमाल अपने देश के भीतर ही होता है. कोई भी मुद्रा दुनिया भर में किस हद तक प्रचलित है, यह उस देश की अर्थव्यवस्था और ताक़त पर निर्भर करता है. दुनिया भर का 85 फ़ीसदी व्यापार डॉलर से होता है. अंतरराष्ट्रीय क़र्ज़ भी डॉलर में ही दिए जाते हैं. इसलिए विदेशी बैंकों को अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर की ज़रूरत होती है.

इमेज स्रोत, Getty Images







