संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण के बाद धन्यवाद प्रस्ताव पर शुक्रवार को आरजेडी के राज्यसभा सांसद मनोज झा के दिए भाषण की चर्चा सोशल मीडिया पर ख़ूब हो रही है.
मनोज झा ने अपनी बात रखते हुए सदन में कहा कि पाकिस्तान में चुनाव हमारे नाम पर नहीं लड़े जाते लेकिन हमारे यहाँ चुनाव पाकिस्तान के नाम पर लड़े जा रहे हैं. मनोज झा ने कहा कि आज जिन्ना जहाँ भी होंगे, सोचते होंगे जो जीते जी ना मिला वो भाजपा ने मरने के बाद दे दिया.
राज्यसभा में मनोज झा ने कहा, ''राष्ट्रपति का अभिभाषण देश को दिशा और दशा देने की कोशिश होती है, देश का एक ब्लूप्रिंट होता है. अगर हम देश की दशा से चिंचिंत हैं, तो ये चिंता की लक़ीरें अभिभाषण में क्यों नज़र नहीं आतीं. क्या राष्ट्रपति महोदय को सलाहकारों से बात करने, न्यूज़ देखते ये हालात नहीं दिख रहे होंगे.''
राष्ट्रपति का भाषण दलीय धारा से ऊपर हो
छात्रों के प्रदर्शन पर उन्होंने कहा, ‘’ छात्र नौकरी मांग रहे थे, कोई चांद नहीं मांग रहे थे, वो दो करोड़ वाली नौकरी भी नहीं मांग रहे थे, कह रहे थे बाक़ी बची हुई नौकरियां दे दो, लेकिन आपने (सरकार) ने लाठियां बरसाई.''
''मैं सोचता हूं महामहिम के भाषण में अगर इन सबका ज़िक्र ना हो तो वो अभिभाषण नहीं कागज़ का पुलिंदा लगता है. सन 1950 से लेकर अब तक मुझे पता है की राष्ट्रपति का अभिभाषण लिखा कहां जाता है लेकिन मैं आग्रह करूंगा कि सत्ता पक्ष और विपक्ष अगर सोच सकें तो राष्ट्रपति के भाषण को दलीय धाराओं से ऊपर रखना चाहिए.‘’
बौनी समझ वाले लोग लंबा इतिहास नहीं लिख सकते
मनोज झा ने केंद्र की मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, ‘’इतिहास की अपनी स्मृति होती है और स्मृतियों का एक इतिहास होता है और विश्व इतिहास गवाह है कि जिस किसी ने भी अतीत की स्मृतियों के साथ छेड़छाड़ की कोशिश है, वह इतिहास के फुटनोट में चला गया इतिहास नहीं बन सका.''
''नेता जी सुभाष चंद्र बोस देश के नेता जी हैं. आपने उन्हें इंपीरियल कैनोपी में रखने का फ़ैसला लिया. वो जिंदा होते तो कहते कैनोपी में नहीं दिलों में रखो. मैंने नेता जी की चिट्ठियां पढ़ी हैं नेहरू जी के नाम, मैंने नेता जी की चिट्ठियां पढ़ी हैं बापू के नाम और उस दौर के तमाम नेताओं के नाम.''
''कहाँ क़द था नेता जी का नेहरू का, बापू का और पटेल का और समीक्षा कौन लोग कर रहे हैं. बौनी समझ के लोग लंबा इतिहास नहीं लिख सकते, लंबी लकीर नहीं खींच सकते.‘’
‘’हमने 1952 में पहला चुनाव लड़ा, हम विभाजन से निकल कर आए थे, बँटवारे पीड़ा और दर्द था, लाखों लोग दोनों ओर मारे गए, लेकिन 1952 का चुनाव हमने समावेशी विकास और रोज़गार पर लड़ा.''
''70 साल बाद हम किस चीज़ पर चुनाव लड़ रहे हैं देख लीजिए. मुझे ताज्जुब होता है कि पाकिस्तान में चुनाव हमारे नाम पर नहीं होता लेकिन हमारे यहां चुनाव पाकिस्तान के नाम पर होता है. जिन्ना कहीं भी होंगे सोचते होंगे कि जो जीते जी मुझे नहीं मिल सका वो मरने के बाद भाजपा वालों ने मुझे दे दिया.‘’
मनोज झा के इस भाषण की सोशल मीडिया पर खूब तारीफ़ की जा रही है.
इतिहासकार एस. इरफ़ान हबीब ने इस भाषण का लिंक साझा करते हुए लिखा,‘’ मनोज झा ने अपने भाषण दिल में बिलकुल दिल से बात कही है.‘’
पत्रकारउमाशंकर सिंह ने भाषण का वीडियो शेयर करते हुए एक हिस्से का ज़िक्र किया, ‘’राष्ट्रपति का अभिभाषण देश का ब्लू प्रिंट होता है…छात्र चाँद नहीं रोज़गार मांग रहे थे और आपने लाठियां बरसायी... और जब इस तरह की चिंता राष्ट्रपति के अभिभाषण में नज़र नहीं आती है तो ये काग़ज़ का पुलिंदा लगता है और अच्छा नहीं लगता है अभिभाषण को कागज़ का पुलिंदा कहते”.
लेखक और पत्रकार रोहिन कुमार ने भाषण के साथ ही मनोज सिन्हा के कश्मीरी वेशभूषा पर लिखा,‘’कितना सुखद हैये मनोजसर,हां,कश्मीर को हमारा ध्यान चाहिए. कश्मीरियों को धैर्य से सुनने की जरूरत है. इसे हीलिंग टच की जरूरत है. ये कोई एहसान नहीं होगा,वे इसके लायक हैं.’’