अफ़ग़ानिस्तान: पेंटागन के अनुसार, काबुल से रोज 9,000 लोग निकाले जाएंगे
अमेरिकी रक्षा विभाग के एक अधिकारी ने मंगलवार को बताया कि अमेरिकी सेना ने अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी नागरिकों और तालिबान के निशाने पर रहे अफ़ग़ानियों को निकालने की योजना बनाई है.
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विभुराज, मानसी दाश, अनंत प्रकाश and अपूर्व कृष्ण
रूस बोला- 'हम तालिबान के संपर्क में', अमेरिका की ख़ूब कर रहा खिंचाई
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इमेज कैप्शन, इस वर्ष 18 मार्च को मॉस्को में अफ़ग़ान शांति वार्ता में तालिबान के उप नेता मुल्ला अब्दुल ग़नी बरादर शामिल हुए थे
रूस ने कहा है कि तालिबान के संपर्क में हैैं मगर उसने जिस तरह से अफ़ग़ानिस्तान में स्थिति बदली उसे लेकर हैरानी जताई है. वहाँ अमेरिका की भी जमकर आलोचना हो रही है.
सुरक्षा परिषद में रूस के स्थायी प्रतिनिधि वैसिली नेबेन्ज़िया ने कहा है कि हम तालिबान के संपर्क में हैं.
मगर उन्होंने साथ ही ये भी स्पष्ट किया कि 'इसका मतलब ये नहीं कि हमने तालिबान को मान्यता दे दी है'.
रूसी राजदूत ने साथ ही अफ़ग़ान सुरक्षाबलों की क्षमता पर सवाल उठाया और कहा- "वो सैनिक जो 20 सालों से ट्रेनिंग ले रहे थे उन्होंने इतनी आसानी से कैसे हथियार डाल दिए."
रूसी दूत ने इस बात पर भी चिंता जताई कि इस्लामिक स्टेट और अन्य गुट अभी भी अफ़ग़ानिस्तान में सक्रिय हैं और इससे पड़ोसी देशों को ख़तरा हो सकता है.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार अफ़ग़ानिस्तान में रूस के राजदूत दमित्री ज़िरनोव ने तालिबान की सराहना करते हुए उनके बर्ताव को अच्छा बताया है.
रूसी राजदूत ने मॉस्को के एक रेडियो स्टेशन से बात करते हुए कहा, "स्थिति शांतिपूर्ण है और शहर में सब शांत हो चुका है. तालिबान के नियंत्रण में काबुल की स्थिति उससे बेहतर है जब ये राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी के पास थी."
तालिबान के साथ रूस के संपर्क पहले से भी रहे हैं. इस वर्ष मार्च में मॉस्को में वहाँ अफ़ग़ान शांति वार्ता हुई थी तो उसमें तालिबान के उप नेता मुल्ला अब्दुल ग़नी बरादर शामिल हुए थे.
उधर रूस के समाचारपत्रों में तालिबान के जीत का दावा करने के दो दिन बाद अमेरिका की जमकर खिंचाई हो रही है.
वहाँ के सरकारी अख़बार रोसिस्काया गैज़ेटा में विदेश नीति विश्लेषक फ़्योदोर लुक्यानोव ने इसे एक "भयानक नाकामी" बताया है.
वो लिखते हैं, " अमेरिका-समर्थक सरकार ताश के पत्तों की तरह गिर पड़ी. अमेरिका घर लौट नहीं रहा, वो भाग रहा है."
कश्मीर में बीजेपी के एक और नेता की हत्या
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जम्मू और कश्मीर में चरमपंथियों ने बीजेपी के एक और नेता की हत्या कर दी है.
समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक़ आज दोपहर कुलगाम ज़िले के ब्राज़लू-जागीर इलाक़े में बीजेपी नेता जावीद अहमद डार की गोली मारकर हत्या कर दी गई.
भारतीय जनता पार्टी की जम्मू और कश्मीर इकाई ने इस हमले की निंदा करते हुए कहा है कि इसके ज़िम्मेदार लोगों को नहीं छोड़ा जाएगा.
कश्मीर में अगस्त महीने में ये किसी बीजेपी नेता की हत्या की दूसरी घटना है.
इससे पहले 9 अगस्त को अनंतनाग में बीजेपी नेता ग़ुलाम रसूल डार और उनकी पत्नी की हत्या कर दी गई थी.
चरमपंथियों ने उनके घर पर धावा बोल दोनों को नज़दीक से गोली मार दी थी.
65 वर्षीय डार कुलगाम में बीजेपी किसान मोर्चा के अध्यक्ष और अपने गाँव के सरपंच थे. उनकी पत्नी भी पंच थीं.
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फ़ेसबुक ने तालिबान से जुड़ी सामग्रियों को किया बैन, वॉट्सऐप पर भी रोक
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सोशल नेटवर्किंग साइट फ़ेसबुक ने बताया है कि उसने तालिबान और इससे
जुड़ी सामग्रियों को अपने सभी प्लेटफ़ॉर्म्स पर बैन कर दिया है क्योंकि वह तालिबान को एक आतंकवादी संगठन मानता है.
तालिबान के तेज़ी से बढ़ते प्रभाव के बीच तकनीकी कंपनियों के सामने तालिबान से जुड़ी सामग्रियों के प्रबंधन को लेकर एक नई चुनौती पैदा हो गई है.
फेसबुक ने बताया है कि उसके पास अफ़ग़ान विशेषज्ञों
की एक समर्पित टीम है जो कि इस संगठन से जुड़ी सामग्री पर नज़र रखती है और उसे
हटाती है.
फ़ेसबुक के एक प्रवक्ता ने बीबीसी से कहा, अमेरिकी क़ानून के तहत तालिबान एक आतंकवादी संगठन है और हमने अपनी ख़तरनाक संगठन की नीतियों के तहत उन्हें बैन कर दिया है.
प्रवक्ता ने बताया कि इसका मतलब ये है कि कंपनी तालिबान या उनके लिए बनाए गए एकांउटों को हटा देगी और अपने यहाँ उनकी प्रशंसा, सहयोग या उनका प्रतिनिधित्व करने को रोकेगी.
फेसबुक ने बताया है कि उसकी ये नीति अन्य मंचों
इंस्टाग्राम और वॉट्सऐप पर भी लागू होती है.
हालांकि, कुछ रिपोर्ट्स में आया है कि तालिबान
वॉट्सऐप की मदद से बातचीत करते थे.
फेसबुक ने बीबीसी को बताया है कि अगर उसे वॉट्सऐप
पर इस संगठन से जुड़े अकाउंट मिले तो वह उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करेगी.
हाल ही में प्रतिद्वंदी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म
ट्विटर और यूट्यूब भी तालिबान से जुड़ी सामग्री को लेकर आलोचना के घेरे में आए
हैं.
अफ़ग़ानिस्तान पर हमले का फ़ैसला लेने वाले जॉर्ज बुश तालिबान की वापसी पर क्या बोले
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इमेज कैप्शन, जॉर्ज बुश के साथ तत्कालीन अफ़ग़ान नेता हामिद करज़ई
20 सैाल पहले अफ़ग़ानिस्तान पर हमले का फ़ैसला करने वाले पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के वापस मज़बूत होने पर बयान जारी किया है.
वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर 11 सितंबर, 2001 को हुए
हमले के बाद तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने ही अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध
करने का फैसला किया था.
उन्होंने अब एक बयान में कहा है कि उन्होंने और उनकी पत्नी ने “अफ़ग़ानिस्तान में हो रही त्रासदीपूर्ण घटनाओं को बेहद गहरे दुख के साथ देखा है."
जॉर्ज डब्ल्यू बुश प्रेसिडेंशियल सेंटर की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है-, “हमारे
दिल में बहुत कष्ट और परेशानियां उठाने वाले अफ़ग़ान लोगों और बहुत त्याग करने वाले अमेरिकी और
नैटो सहयोगियों के लिए असीम दुख है.”
उन्होंने कहा कि
अमेरिका के पास मानवीय संकट के समय लाल फीताशाही से बचने का अधिकार और ज़िम्मेदारी
थी.
बयान में बताया गया
है, “इस समय एक बड़े ख़तरे का सामना कर रहे अफ़ग़ान लोग वही हैं
जो कि अपने देश में प्रगति के लिए सबसे पहले खड़े थे.”
बुश ने अपने संदेश में अफ़ग़ानिस्तान में काम करने वाले अमेरिकी सैनिकों और कर्मचारियों से कहा है कि हम तहेदिल से आपको धन्यवाद कहते हैं और आपके योगदान का हमेशा सम्मान करेंगे.
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ने पिछले महीने जर्मन प्रसारक डॉएचे वेले के साथ बातचीत में माना था कि अफ़ग़ानिस्तान
से अमेरिका की वापसी वहां की महिलाओं और लड़कियों के लिए बहुत बुरी साबित होगी.
पूर्व राष्ट्रपति बुश ने हाल के दिनों में अफ़ग़ानिस्तान को लेकर जो कुछ कहा है, वह साल 2004 में दिए गए उनके बयानों से विपरीत है.
साल 2004 में अफ़ग़ानिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति हामिद करज़ई
के साथ बैठक के बाद बुश ने ‘आतंक के
ख़िलाफ़ पहली जीत’ की प्रशंसा करते हुए अफ़ग़ानिस्तान की सफलता और समृद्धि
के प्रति पुरजोर समर्पण का वादा किया था.
उन्होंने कहा था कि "अफ़ग़ानिस्तान
के लिए आगे की राह अभी भी लंबी और कठिन है," लेकिन
"फिर भी, अफ़ग़ान लोग जान सकते हैं कि उनका देश कभी भी आतंकवादियों
और हत्यारों का सामना करने के लिए अकेला नहीं छोड़ा जाएगा."
पेगासस मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से माँगा जवाब, कहा- सुरक्षा से समझौते वाली जानकारी ना दें
सुचित्र मोहंती
बीबीसी हिन्दी के लिए
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सुप्रीम कोर्ट ने पेगासस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस भेज उन याचिकाओं पर जवाब माँगा है जिनमें इस मामले की अदालत की निगरानी में जाँच करवाने की माँग की गई है.
पिछले महीने मीडिया में रिपोर्ट आई थी जिनमें कहा गया था कि केंद्र सरकार ने कथित तौर पर इसराइली स्पाईवेयर पेगासस के ज़रिए राजनेताओं, कार्यकर्ताओं और पत्रकारों की जासूसी करवाई.
मुख्य न्यायाधीश एनवी रमन्ना की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि वो इस बारे में आगे फ़ैसला लेगी जिनमें सरकार का ये आग्रह भी शामिल है कि इस मामले की जाँच स्वतंत्र विशेषज्ञों की एक समिति से करवाई जाए.
पीठ ने कहा कि वो इस मामले की अगली सुनवाई 10 दिन बाद करेगी.
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने दलील दी कि राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में निगरानी के लिए इस्तेमाल हुए किसी सॉफ़्टवेयर पर सार्वजनिक रूप से चर्चा नहीं हो सकती.
उसने साथ ही कहा कि वो इस निगरानी का ब्यौरा विशेषज्ञों की प्रस्तावित समिति को देने के लिए तैयार है और वो अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को दे सकती है.
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार की ओर से कहा कि सरकार और सेना राष्ट्रविरोधी और चरमपंथी गतिविधियों को नियंत्रण में रखने के लिए कई तरह के सॉफ़्टवेयर इस्तेमाल करती हैं.
उन्होंने कहा, "कोई भी सरकार ये जानकारी सार्वजनिक नहीं कर सकती कि वो क्या सॉफ़्टवेयर इस्तेमाल कर रही है जिससे कि आतंकी नेटवर्क अपना सिस्टम बदल लें और पकड़ से छूट जाएँ."
याचिकार्ताओं के वकील कपिल सिबल ने इस पर कहा, "हमारा इरादा सुरक्षा के ब्यौरे को हासिल करना नहीं है, मगर सरकार को ये बताना चाहिए कि उसने पेगासस का इस्तेमाल किया या नहीं."
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वो सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी किसी सूचना को उजागर करने के लिए मजबूर नहीं करना चाहती मगर वो जानना चाहती है कि क्या आम लोगों की कथित निगरानी के लिए आदेश दिए गए थे.
सुप्रीम कोर्ट में पेगासस मामले पर 11 याचिकाएँ दायर की गई हैं.
अफ़ग़ानिस्तान में खुला है हमारा दूतावासः ईरान
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ईरान के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान में उसका दूतावास "पूरी तरह से ख़ुला और सक्रिय है".
ईरान की अर्धसरकारी समाचार एजेंसी कही जानेवाली इसना से एक इंटरव्यू में मंत्रालय के प्रवक्ता सईद ख़ातिबज़ादेह ने मीडिया में आई इन रिपोर्टों को ख़ारिज कर दिया कि अफ़ग़ानिस्तान में केवल पाकिस्तान, चीन और रूस के ही दूतावास खुले हैं.
प्रवक्ता ने साथ ही कहा कि काबुल के अलावा हेरात में भी उनके कॉन्सुलेट में पूरी तरह काम हो रहा है.
ईरान ने इस सप्ताहांत कहा था कि उसने गुपचुप रूप से अफ़ग़ानिस्तान में अपने पाँच में से तीन कॉन्सुलेट या वाणिज्यिक दूतावासों को बंद कर दिया है.
बताया गया कि उसने अपने राजनयिकों को काबुल दूतावास बुला लिया है और कुछ को तेहरान भी वापस बुला लिया गया है.
काबुल पर तालिबान का कब्ज़ा होने के बाद अधिकतर देशों ने वहाँ से अपने दूतावास कर्मचारियों को बाहर निकालना शुरू कर दिया है.
भारत ने भी मंगलवार को अपने दूतावास को ख़ाली करने का फ़ैसला किया.
इसके बाद ऐसी ख़बर आई कि अब अफ़ग़ानिस्तान में केवल तीन ही देश रह जाएँगे जिनके दूतावास ख़ुले हैं. ये देश हैं - रूस, चीन और पाकिस्तान.
इंडोनेशिया ने कहा है कि वो अफ़ग़ानिस्तान का अपना दूतावास बंद करेगा, लेकिन वहां पर एक 'छोटा कूटनीतिक मिशन' रखना जारी रखेगा.
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इमेज कैप्शन, इब्राहीम रईसी
ईरान का रुख़
ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी ने सोमवार को कहा था कि अफ़ग़ानिस्तान में फौज की शिकस्त और अमेरिका की वापसी को शांति और सुरक्षा की बहाली के एक मौक़े के तौर पर देखा जाना चाहिए.
ईरानी समाचार एजेंसी इरना के मुताबिक़ उन्होंने ईरान के विदेश मंत्री जवाद ज़ारिफ़ से अफ़ग़ानिस्तान के बारे में चर्चा की और इस बात पर ज़ोर दिया कि ईरान अफ़ग़ानिस्तान में स्थिरता बहाल करने के लिए मदद करेगा.
उन्होंने कहा कि ईरान पड़ोसी और बिरादर देश की हैसियत से अफ़ग़ानिस्तान के सभी गुटों को राष्ट्रीय सहमति बनाने के लिए निमंत्रण देता है.
उन्होंने कहा कि ईरान ये मानता है कि अफ़ग़ान लोगों की भी यही मर्जी है कि वहां स्थिरता और सुरक्षा का माहौल बने.
राष्ट्रपति रईसी ने कहा कि ईरान पड़ोसी देश के घटनाक्रम पर नज़र रखे हुए है.
Live: अफ़ग़ानिस्तान में आए तालिबान. क्या सोचते हैं भारत में रह रहे अफ़ग़ान?
तालिबान ने सरकारी कर्मचारियों को किया 'माफ़', कहा- काम पर लौटिए
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तालिबान ने सभी सरकारी कर्मचारियों को 'आम माफ़ी' देने की घोषणा करते हुए उनसे “पूरे भरोसे” के साथ काम पर वापस आने
का आग्रह किया है.
समाचार एजेंसी एएफ़पी के मुताबिक़, तालिबान ने एक बयान जारी कर कहा है, “सभी के लिए एक आम माफ़ी घोषित कर दी गयी है. इसलिए आप लोग पूरे भरोसे के साथ
नियमित दिनचर्या शुरू कर सकते हैं.”
ये एलान एक ऐसे समय पर किया गया है जब अमेरिकी सेना के लिए काम कर चुके अनुवादक, पश्चिमी देशों
द्वारा समर्थित संस्थाओं के कर्मचारी और सरकारी कर्मचारी इस बात से डर रहे हैं कि
अब तालिबान उनसे बदला लेगा.
तालिबान को बर्बर
सज़ा देने के लिए जाना जाता है और उन पर युद्ध अपराध करने के भी आरोप हैं जिसका वे
लगातार खंडन करते हैं.
पाकिस्तान ने अफ़ग़ानिस्तान पर किया अमेरिका का समर्थन, कहा- सबसे अच्छा मौक़ा निकल गया
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पाकिस्तान ने अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन के अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों को वापस बुलाने के फ़ैसले का समर्थन किया है.
सोमवार को प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की अध्यक्षता में राष्ट्रीय सुरक्षा समिति की बैठक में कहा गया कि संघर्ष को ख़त्म करने का सबसे सही समय तब था जब वहाँ अमेरिका और नैटो की सेनाएँ अपनी पूरी क्षमता के साथ मौजूद थीं.
साथ ही कहा गया कि इससे ज़्यादा लंबी अवधि के लिए विदेशी सैनिकों की उपस्थिति अफ़ग़ानिस्तान में कोई अलग नतीजे नहीं लेकर आती.
समिति ने एक बयान में कहा, "इसलिए बाइडन सरकार का पिछली सरकार की सैनिकों की वापसी के फ़ैसले पर मुहर लगाना इस संघर्ष की एक तार्किक परिणति है."
इसके साथ ही बैठक में पाकिस्तान के इस रुख को दोहराया गया कि अफ़ग़ानिस्तान में संघर्ष का कभी भी सैन्य समाधान नहीं था.
पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की कि वो साथ मिलकर अफ़ग़ानिस्तान और पूरे क्षेत्र की दीर्घकालीन सुरक्षा, स्थिरता और विकास के लिए एक समग्र राजनीतिक समाधान को सुनिश्चित करे.
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अमेरिका और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों के बीच बातचीत
अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन ने काबुल के हालिया घटनाक्रम पर पाकिस्तान
के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी से बात की है.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन इस
सिलसिले में दुनिया भर में अपने समकक्षों से बात कर रहे हैं.
अमेरिकी विदेश मंत्रालय प्रवक्ता नेड प्राइस ने सोमवार को इस बातचीत की जानकारी
दी.
प्राइस ने बताया है कि दोनों नेताओं ने काबुल में तेज़ी से बदलती स्थिति पर
चर्चा की है और इस दौरान क़ुरैशी ने अफ़ग़ानिस्तान में एक समावेशी राजनीतिक समझौता होने पर जोर दिया है.
वहीं, पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा है कि पाकिस्तान अमेरिका
समेत अन्य अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ एक शांतिमय और स्थिर अफ़ग़ानिस्तान के
लिए कोशिशें करता रहेगा.
इस बयान में क़ुरैशी और ब्लिंकेन के बीच बातचीत का भी ज़िक्र है.
बयान में बताया गया है कि क़ुरैशी ने ज़ोर दिया कि अफ़ग़ानिस्तान के अमेरिका का
आर्थिक संबंध भी काफ़ी अहम था.
इसके साथ ही उन्होंने कहा कि पाकिस्तान अमेरिका के साथ व्यापक, दूरगामी और स्थायी
संबंध बनाने के लिए समर्पित है जो कि शांति, गहन आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय संपर्क पर आधारित हों.
अफ़ग़ानिस्तान के टीवी चैनल पर महिलाएँ लौटीं, तालिबान का लिया इंटरव्यू
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अफ़ग़ानिस्तान के एक बड़े टीवी चैनल टोलो न्यूज़ पर एक बार फिर से महिला एंकर नज़र आने लगी हैं.
रविवार को तालिबान के काबुल पर क़ब्ज़े के बाद से वहाँ के सभी टीवी चैनलों पर महिलाएँ दिखनी बंद हो गई थीं.
अफ़ग़ानिस्तान के सरकारी टीवी चैनल की तस्वीरें भी शेयर होने लगी थीं जिनमें एक पुरुष प्रेज़ेंटर तालिबान के झंडे के आगे बैठा था.
मगर मंगलवार को टोलो न्यूज़ के प्रमुख मिराक़ा पोपल ने एक ट्वीट शेयर किया है जिसमें एक महिला प्रेज़ेंटर स्टू़डियो में तालिबान की मीडिया टीम के एक सदस्य का लाइव इंटरव्यू ले रही है.
उन्होंने इसके बाद एक और तस्वीर शेयर की है जिसमें एक महिला हिजाब पहने हुए न्यूज़रूम में सुबह की मीटिंग कर रही है.
टोलो न्यूज़ की मालिक कंपनी मोबीग्रुप के निदेशक साद मोहसेनी ने भी तस्वीरों को ट्वीट किया है. उन्होंने साथ ही एक महिला रिपोर्टर की अफ़ग़ानिस्तान की सड़कों से रिपोर्टिंग करती तस्वीर भी ट्वीट की है.
उन्होंने साथ ही लिखा है- "टोलो न्यूज़ और तालिबान एक बार फिर से इतिहास बनाते हुए. तालिबान के वरिष्ठ प्रतिनिधि अब्दुल हक़ हम्माद, आज सुबह हमारी प्रेज़ेंटर बाहिश्ता से बात करते हुए. दो दशक पहले जब वो सत्ता में पहली दफ़ा आए थे, तो ये सोचना भी नामुमकिन था."
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अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के प्रभावशाली होने के बाद सबसे ज़्यादा चिंता महिलाओं की स्थिति को लेकर लगाई जा रही है क्योंकि तालिबान कट्टर इस्लाम में यकीन रखते हैं और महिलाओं पर पाबंदियों की हिमायत करते रहे हैं.
20 साल पहले अफ़ग़ानिस्तान में सत्ता में आने के बाद उन्होंने महिलाओं पर कई तरह की पाबंदियाँ लगा दी थीं.
इस बार भी काबुल से आती उन तस्वीरों ने इस चिंता को बढ़ा दिया जिनमें दुकानों के बाहर से महिलाओं की पोस्टरों और तस्वीरों को हटाया जा रहा था.
अफ़ग़ानिस्तान पर बैठक को लेकर भिड़े भारत और पाकिस्तान, चीन भी बोला
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सोमवार को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने अफ़ग़ानिस्तान की स्थिति पर चर्चा के लिए एक विशेष बैठक बुलाई जिसे लेकर भारत और पाकिस्तान आमने सामने आ गए हैं.
दरअसल, पाकिस्तान भी इस बैठक में शामिल होना चाहता था मगर उसे एक बार फिर इससे रोक दिया गया.
पिछले सप्ताह भी सुरक्षा परिषद ने अफ़ग़ानिस्तान पर आपात बैठक बुलाई थी और उसमें भी पाकिस्तान को आने से रोक दिया गया था.
पाकिस्तान इसके लिए भारत को ज़िम्मेदार ठहरा रहा है क्योंकि भारत अगस्त महीने के लिए सुरक्षा परिषद का अध्यक्ष है.
भारत के अध्यक्षता ग्रहण करने के बाद 10 दिनों के भीतर सुरक्षा परिषद को दूसरी बार अफ़ग़ानिस्तान पर आपात बैठक करनी पड़ी है.
भारत ने पाकिस्तान के आरोप पर चुप्पी साधी हुई है लेकिन पाकिस्तान लगातार भारत पर हमले कर रहा है.
सोमवार को भी परिषद की बैठक के बाद संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के स्थायी दूत मुनीर अकरम ने आरोप लगाया कि भारत उन्हें अफ़ग़ानिस्तान पर होने वाली चर्चाओं में शामिल नहीं होने दे रहा.
अकरम ने कहा, "अफ़ग़ानिस्तान की शांति प्रक्रिया में पाकिस्तान की एक अहम भूमिका है, मगर भारत जान-बूझकर हमें अफ़ग़ानिस्तान के बारे में नहीं बोलने दे रहा."
पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने भी एक बार फिर भारत की आलोचना की है.
क़ुरैशी ने ट्वीट कर लिखा है- “अफ़ग़ानिस्तान की नियति के इस अहम मौक़े पर भारत की पक्षपातपूर्ण और बाधा डालने वाली हरकतें और इस बहुसदस्यीय मंच का बार-बार राजनीतिकरण करना, जिसका मक़सद ही शांति लाना है, ये दिखाता है कि अफ़ग़ानिस्तान और इस क्षेत्र को लेकर उनका इरादा क्या है.”
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इमेज कैप्शन, संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के स्थायी दूत मुनीर अकरम
सुरक्षा परिषद की बैठक में तालिबान से अपील की गई कि वो इस संघर्ष का अंत राजनीतिक हल निकाल कर करे और अफ़ग़ानिस्तान को एक बार फिर चरमपंथियों की पनाहगाह ना बनने दे.
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि टीएस तिरुमूर्ति ने कहा कि वहाँ किसी की भी स्वीकार्यता और वैधता के लिए ये ज़रूरी है कि ‘वहाँ एक राजनीतिक समाधान निकले और जो कि महिलाओं, बच्चों और अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों का पूरी तरह से समाधान करता हो’.
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इमेज कैप्शन, भारत इस महीने सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता कर रहा है
बैठक में चीन के प्रतिनिधि ने अफ़ग़ानिस्तान की मौजूदा हालत पर चिंता जताई और सदस्य देशों से वहाँ मानवीय आपदा की स्थिति को रोकने की अपील की.
चीन के स्थायी प्रतिनिधि ज़ांग जुन ने साथ ही बैठक में पाकिस्तान को शामिल नहीं किए जाने पर अफ़सोस भी प्रकट किया.
उन्होंने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध की समाप्ति केवल अफ़ग़ान लोग ही नहीं चाहते बल्कि ये पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय की इच्छा है.
अफ़ग़ानिस्तान में अब खुले रह गए हैं बस इन तीन देशों के दूतावास
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काबुल पर तालिबान का कब्ज़ा होने के बाद अधिकतर देशों ने वहाँ से अपने दूतावास कर्मचारियों को बाहर निकालना शुरू कर दिया है. भारत ने भी मंगलवार को अपने दूतावास को ख़ाली करने का फ़ैसला किया.
इसके बाद अब अफ़ग़ानिस्तान में केवल तीन ही देश रह जाएँगे जिनके दूतावास ख़ुले हैं.
ये देश हैं - रूस, चीन और पाकिस्तान.
इंडोनेशिया ने कहा है कि वो अफ़ग़ानिस्तान का अपना दूतावास बंद करेगा, लेकिन वहां पर एक 'छोटा कूटनीतिक मिशन' रखना जारी रखेगा.
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पाकिस्तान लगातार कह रहा है कि काबुल में उसका दूतावास पूरी तरह से काम कर रहा है.
सोमवार को पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने ट्वीट कर कहा- "काबुल में हमारा दूतावास पूरी तरह से काम कर रहा है और हर तरह की कॉन्सुलर सुविधा मुहैय्या कर रहा है, साथ ही गृह मंत्रालय के तहत एक विशेष सुविधा केंद्र भी बनाया गया है."
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने भी रविवार को एक बयान जारी कर कहा था कि वो "स्थिति पर नज़र रखे हुए हैं" और उनका काबुल दूतावास पाकिस्तानी, अफ़ग़ान और कूटनीतिक और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को दूतावास संबंधी कामों और पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस के विमानों के बारे में "ज़रूरी मदद देता रहेगा".
चीन
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इमेज कैप्शन, जुलाई में तालिबान नेता मुल्ला अब्दुल गनी बरादर के साथ चीनी विदेश मंत्री वांग यी
चीनी दूतावास ने अभी अफ़ग़ानिस्तान को लेकर अपना योजनाओं के बारे में कुछ भी नहीं कहा है.
मगर उसने अपने नागरिकों को चेतावनी दी है कि वो घरों के अंदर रहें और स्थिति के प्रति सचेत रहें.
लेकिन इसके साथ ही चीन ने “अफ़ग़ानिस्तान में भिन्न गुटों” से अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कहा है. हालांकि स्थानीय चीनी नागरिकों का कहना है कि चीन को 'सुरक्षा स्थिति पर अधिक गंभीरता से सोचने की ज़रूरत है.'
तालिबान के प्रतिनिधि पिछले महीने चीन गए थे जहां उनकी मुलाक़ात चीन के विदेश मंत्री वांग यी से हुई थी.
उस समय इस बैठक को राजनीतिक ताकत के रूप में तालिबान की अंतरराष्ट्रीय मान्यता के रूप में देखा गया था.
चीन ने सोमवार को भी कहा कि वो तालिबान के साथ 'दोस्ताना रिश्ते' बनाना चाहता है.
रूस
रूसी विदेश मंत्रालय ने भी रविवार को सरकारी मीडिया से कहा था कि सरकार की दूतावास कर्मचारियों को बाहर निकालने से जुड़ी कोई योजना नहीं है.
हालाँकि उसने ये भी कहा था कि वो अपने दूतावास के कुछ कर्मचारियों को वापिस बुलाएगा.
मंगलवार को रूसी राजदूत दिमित्री ज़िरनॉफ़ तालिबान के नेताओं से मुलाक़ात करने वाले हैं.
काबुल से भारतीयों को लेकर आ रहा विमान जामनगर में उतरा
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अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल से भारतीय अधिकारियों को लेकर आ रहा विमान
जामनगर में उतर गया है.
समाचार एजेंसी एएनआई ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि भारतीय वायु सेना का
विमान सी 17 जामनगर में उतर गया है. ये विमान काबुल से भारतीय अधिकारियों को लेकर
आ रहा है.
ब्रेकिंग न्यूज़, खुल गया काबुल हवाई अड्डा, एक दिन पहले करना पड़ा था बंद
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काबुल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर रविवार और सोमवार को भारी भीड़ और अफ़रातफ़री के माहौल के बाद एक बार फिर राजनयिकों और आम नागरिकों को निकालने के लिएसैन्य उड़ानें बहाल कर दी गई हैं.
सोमवार को हवाई अड्डे से सभी तरह की उड़ानों को रोक दिया गया था.
रविवार देर शाम काबुल पर तालिबान के कब्ज़े के बाद सोमवार को अफ़ग़ानिस्तान छोड़ कर जाने की कोशिश में हज़ारों लोग काबुल हवाई अड्डे पहुंचे.
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कई लोगों को रनवे पर भागते हुए और विमान में प्रवेश करने की होड़ लगाते देखा गया था.
इस कारण वहां भगदड़ मच गई थी और पांच लोगों की मौत हो गई.
अब तक ये स्पष्ट नहीं हो पाया है कि उन्हें गोलियां लगी थीं या फिर उनकी मौत भगदड़ के कारण हुई. हालांकि अधिकारियों ने कहा है कि सोमवार के मुक़ाबले मंगलवार को एयरपोर्ट पर शांति है.
एक सुरक्षा अधिकारी ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया, "कई लोग जो कल यहां आ गए थे अब वो घर वापस चले गए हैं."
हालांकि प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से रॉयटर्स ने कहा है कि अभी भी बीच-बीच में हवाई अड्डे की तरफ से गोलियां चलने की आवाज़ें सुनाई दे रही हैं.
पश्चिमी देशों की सेनाओं के लिए फ़िलहाल यही एक हवाई अड्डा अफ़ग़ानिस्तान से बाहर निकलने का रास्ता है.
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अगर आप अभी-अभी बीबीसी हिंदी का लाइव पन्ना देख रहे हैं तो आपको बता दें कि अफ़ग़ानिस्तान में अब तक क्या क्या हुआ -
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काबुल में तालिबान के कब्ज़े के बाद वहां से निकलने की कोशिश में हज़ारों लोग काबुल हवाई अड्डे पहुंचे. इस कारण वहां भगदड़ की स्थिति पैदा हो गई. मिल रही रिपोर्टों के अनुसर हवाई अड्डे पर पांच लोगों की मौत भगदड़ मचने के कारण हुई है.
भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान में मौजूदा हालातों को देखते हुए काबुल में मौजूद भारतीय राजदूत और दूतावास कर्मचारियों को तुरंत भारत वापस लाने का फ़ैसला किया गया है.
अमेरिका और ब्रिटेन ने अपने नागरिकों को अफ़ग़ानिस्तान से निकालने के लिए अपने विशेष सैन्य दस्ते भेजे हैं. ब्रिटेन में 200 सैनिक और अमेरिका ने 1,000 अतिरिक्त सैनिक अफ़ग़ानिस्तान के लिए रवाना किए हैं.
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने अमेरिका से अपने सैनिकों को वापस बुलाने के फ़ैसले का समर्थन किया और माना कि अफ़ग़ानिस्तान में स्थिति जितनी उम्मीद थी उससे कहीं अधिक तेज़ी से पलटी है.
काबुल हवाई अड्डे से जाने वाली सभी उड़ानों को रद्द कर दिया गया था जिसके बाद सोमवार को अमेरिकी सेना ने हवाई अड्डे का नियंत्रण अपने हाथ में लिया और इसे दोबारा चालू किया.
बाइडन ने चेतावनी दी कि यदि तालिबान ने अमेरिकी सैनिकों पर हमला किया तो अमेरिका 'पूरी विध्वंसक शक्ति के साथ अपने लोगों की रक्षा करेगा.'
बाइडन ने कहा है कि अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान की मदद करना जारी रखेगा और हिंसा और अस्थिरता न हो इसके लिए प्रांतीय स्तर पर कूटनीतिक प्रयास जारी रखेगा.
अफ़ग़ानिस्तान के आम नागरिकों ने तालिबान के शासन में रहने के अपने ख़ौफ़ के बारे में बीबीसी से बात की है. कई लोगों का कहना है कि वो यहां से जल्द से जल्द बाहर निकलने की कोशिश में हैं. बीते 48 घंटों में सैंकड़ों की संख्या में अफ़ग़ान सुरक्षाबल देश की सीमा पार कर उज़्बेकिस्तान पहुंचे हैं.
ब्रेकिंग न्यूज़, भारतीय राजदूत और दूतावास के कर्मचारियों को वापस लाएंगे- विदेश मंत्रालय
भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान में मौजूदा हालातों को देखते हुए काबुल में मौजूद भारतीय राजदूत और दूतावास कर्मचारियों को तुरंत भारत वापस लाने का फ़ैसला किया गया है.
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इधर समाचार एजेंसी एएनआई ने गृह मंत्रालय के प्रवक्ता के हवाले से कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान में बदले हालातों के मद्देनज़र भारतीय गृह मंत्रालय ने वीज़ा प्रावधानों में तुरंत कुछ बदलाव करने का फ़ैसला लिया है.
भारत आने वालों को तुरंत वीज़ा मिल सके इसके लिए 'ई-इमर्जेंसी एक्स वीज़ा' की एक अलग कैटगरी बनाई गई है.
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इससे पहले भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा था कि भारत लगातार काबुल में मौजूद हिंदू और सिख समुदाय के नेताओं के साथ संपर्क में हैं और उनकी सुरक्षा भारत की प्राथमिकताओं में से एक है.
एक अन्य ट्वीट में उन्होंने बताया कि उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान के मुद्दे पर अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन के साथ चर्चा की है और काबुल एयरपोर्ट पर विमानों की आवाजाही बहाल करने को लेकर भी बात की है.
उन्होंने ये भी कहा कि अफ़ग़ानिस्तान को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक होने वाली है जिसमें भारत अपनी चिंताएं साझा करेगा.
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काबुल: अमेरिकी विमान पर लटके लोग, बाद में गिरे
सोमवार को अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल के एयरपोर्ट पर अफ़रातफ़री का आलम रहा.
लोग जान बचाने के लिए उड़ान भरने के लिए तैयार विमान पर लटकते देखे गए. कुछ लोग अमेरिकी वायुसेना के एक C-17A विमान पर लटक गए. बाद में कुछ लोग इस विमान से नीचे गिरते भी दिखे.
लोग विमानों में सवार होने के लिए सीढ़ियों पर लटकते दिखे. बाद में एयरपोर्ट को कमर्शियल उड़ानों के लिए बंद कर दिया.
हवाई अड्डे पर गोलीबारी भी हुई, जिसमें कुछ लोगों के मारे जाने की ख़बर है.
वीडियो कैप्शन, काबुल: अमेरिकी विमान पर लटके लोग, बाद में गिरे
अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान के कब्ज़े को चीन कैसे देखता है?
ज़ाओयिन फ़ेंग
बीबीसी संवाददाता, वॉशिंगटन
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तालिबान के अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़े की ख़बर के बाद चीन ने कूटनीति में व्यवहारिकता और हस्तक्षेप न करने की नीति अपना रहा है.
अमेरिका और रूस की तरह चीन ने कभी अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध में हिस्सा नहीं लिया, लेकिन उसकी सीमा अफ़ग़ानिस्तान के साथ सटी हुई है.
ईरान और पाकिस्तान के मुक़ाबले चीन अफ़ग़ानिस्तान के साथ सीमा का छोटा-सा हिस्सा ही साझा करता है, लेकिन रणनीतिक तौर पर ये हिस्सा उसके लिए बेहद अहम है.
चीन का शिन्ज़ियांग प्रांत अफ़ग़ानिस्तान की सीमा से जुड़ा है जिसे चीन ऐसे इलाक़े के रूप में देखता है जो आतंकवाद, कट्टरपंथ और अलगाववाद का केंद्र है.
लेकिन अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिका के जाने के बाद वहां की राजनीति में जो खालीपन आया है उसे लेकर चीन को बेहद सतर्क होना चाहिए.
चीन की सरकारी मीडिया में हाल में आए संपादकीयों में कहा गया है कि अफ़ग़ानिस्तान 'साम्राज्यों के क़ब्रिस्तान की तरह है' और चीन को चेताया है कि वो अमेरिका और सोवियत संघ के पदचिन्हों पर न चले.
ग्लोबल टाइम्स में छपे संपादकीय में कहा गया है, "हम मानते हैं कि चीन अफ़ग़ानिस्तान में अपने प्रभुत्व का इस्तेमाल सतर्कता के साथ करेगा."
कम समय में चीन अर्थव्यवस्था और व्यापार के मुद्दों को लेकर तालिबान के साथ संबंध बनाना जारी रखेगा और यह आश्वासन चाहेगा कि तालिबान सरकार वीगर मुसलमान समुदाय से जुड़े विद्रोही ताकतों का समर्थन नहीं करेगी.
बदले में चीन अफ़ग़ानिस्तान के मसलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा क्योंकि वो मानता है कि "आप अपने देश पर कैसे शासन करते हैं, इससे तब तक हमारा कोई लेना-देना नहीं है, जब तक 'आतंकवादी' हमारे दरवाज़े तक न पहुंच जाएं."
अफ़ग़ान कार्यकर्ताओं की दी जाए सुरक्षा- मलाला
सीमा कोटेचा
बीबीसी संवाददाता
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नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित मलाला यूसुफ़ज़ई ने बीबीसी से कहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन को "अफ़ग़ानिस्तान में काफ़ी कुछ करना है" और अफ़ग़ान लोगों को बचाने के लिए उन्हें "कड़े क़दम उठाने होंगे."
मलाला ने कहा कि वक्त आ गया है जब विश्व के नेता, ख़ास कर अमेरिका और ब्रिटेन के नेता आम नागरिकों और शरणार्थियों को बचाने के लिए कदम उठाएं.
बीबीसी को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा, "मुल्कों को अफ़ग़ान शरणार्थियों के लिए अपनी सीमाएं खोलने की ज़रूरत है."
मलाला ने अफ़ग़ान नागरिकों के हालातों पर चिंता जताई और अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान के कब्ज़े को लेकर अमेरिका पर 'ग़ैर-ज़िम्मेदाराना बयान' देने का आरोप लगाया.
उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि जिस तरह अमेरिका ने इस युद्ध को परिभाषित किया है और जिस तरह उसने अपनी जीत का ऐलान किया है, ये ग़लत संकेत देता है."
मलाला पाकिस्तानी महिला कार्यकर्ता हैं जिन्हें साल 2012 में तालिबान ने सिर पर गोली मारी थी. उस वक्त को 15 साल की थीं. इसके बाद से वो एक शरणार्थी के रूप में ब्रिटेन में रह रही हैं.
अमेरिकियों को नुक़सान पहुंचाया तो नतीजे भयंकर होंगे- बाइडन
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अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान के क़ब्ज़े के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान की हालत के लिए उसके नेता ज़िम्मेदार हैं जो देश छोड़कर भाग गए.
उन्होंने कहा कि तालिबान तेज़ी से अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़ा कर सका क्योंकि वहां के नेता देश छोड़ कर भाग गए और अमेरिकी सैनिकों द्वारा प्रशिक्षित अफ़ग़ान सैनिक उनसे लड़ना नहीं चाहते.
उन्होंने कहा, "सच ये है कि वहां तेज़ी से स्थिति बदली क्योंकि अफ़ग़ान नेताओं ने हथियार डाल दिए और कई जगहों पर अफ़ग़ान सेना ने बिना संघर्ष के हार स्वीकार कर ली."
अपने फ़ैसले पर अडिग हूं'
टेलीविज़न पर लाइव प्रसारित अपने भाषण में बाइडन ने कहा कि वो पूरी तरह अपने फ़ैसले के पक्ष में हैं.
अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के तेज़ी से उभार पर उन्होंने माना, ''जैसी उम्मीद की जा रही थी उससे कहीं अधिक तेज़ी से अफ़ग़ानिस्तान में स्थितियां बदली हैं."
उन्होंने कहा, "जब अफ़ग़ान ख़ुद अपने लिए लड़ना नहीं चाहते तो अमेरिकियों को ऐसी लड़ाई में नहीं पड़ना चाहिए और इसमें अपनी जान नहीं गंवानी चाहिए."
अपने फ़ैसले के बारे में बाइडन ने कहा कि तालिबान ने साथ बातचीत उनके पूर्ववर्ती डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में शुरू की गई थी जिसके बाद अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी कम की गई. एक वक्त जहां अफ़ग़ानिस्तान में 15,500 अमेरिकी सैनिक तैनात थे वहीं समझौते के बाद सैनिकों की संख्या घटा कर 2,500 कर दी गई.
उन्होंने कहा, "तालिबान ने कहा था कि एक मई तक अमेरिकी सैनिक अफ़ग़ानिस्तान से बाहर निकलें. 2001 के बाद से तालिबान अगर कभी बेहद शक्तिशाली रहा है तो वो आज का दौर है."
"राष्ट्रपति के तौर पर मेरे सामने दो विकल्प थे- या तो पहले से हुए समझौते का पालन किया जाता या फिर तालिबान के साथ लड़ाई शुरू की जाती. दूसरा विकल्प चुनने पर एक बार फिर युद्ध का आगाज़ हो जाता."
इमेज कैप्शन, बीते कुछ सप्ताह में कैसा बदला अफ़ग़ानिस्तान
'अफ़ग़ानिस्तान से निकलने का कोई उचित वक्त नहीं था'
बाइडन ने कहा कि एक मई के बाद अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान से अमेरिकी सैनिकों को बचाने का कोई समझौता नहीं था.
उन्होंने कहा, "अफ़ग़ानिस्तान से अपनी फ़ौजें वापस बुलाने का कोई सही वक्त नहीं था. जैसा उम्मीद की गई थी उससे अधिक तेज़ी से अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में अपने सैनिकों की मौजूदगी ख़त्म कर दी है."
'अशरफ़ ग़नी से कहा था बातचीत करें'
बाइडन ने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान की स्थिति देखना उन लोगों के लिए परेशान करने वाला है जिन्होंने अपनी ज़िंदगी के 20 साल वहां हो रही लड़ाई में गंवा दिए.
उन्होंने कहा, "मैंने इस मुद्दे पर लंबे वक्त तक काम किया है और मेरे लिए ये एक तरह से निजी क्षति है."
बाइडन ने कहा कि उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी को सलाह दी थी कि वो संकट का राजनीतिक हल तलाशने के लिए तालिबान से साथ बातचीत करें, लेकिन उनकी सलाह नहीं मानी गई.
उन्होंने कहा, "अशरफ़ ग़नी ने कहा कि ज़रूरत पड़ने पर अफ़ग़ान सैनिक तालिबान से लड़ेंगे, लेकिन मुझे लगता है कि ये उनका ग़लत फ़ैसला था."
बाइडन ने कहा तालिबान के आने पर जिन अफ़ग़ान नागरिकों की जान को ख़तरा हो सकता है उन्हें वक्त से पहले अफ़ग़ानिस्तान से न निकालने के फ़ैसले के पीछे दो कारण हैं.
पहला ये कि "अफ़ग़ान ख़ुद वहीं से निकलना नहीं चाहते थे और दूसरा, बड़ी संख्या में लोगों को निकालने से 'लोगों का भरोसा डगमगाने का ख़तरा था' और अफ़ग़ान अधिकारी ऐसा नहीं चाहते थे."
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'अमेरिका कूटनीतिक हल की कोशिश जारी रखेगा'
बाइडन ने कहा कि अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान के जारी संकट का "कूटनीतिक हल तलाशने की कोशिश" जारी रखेगा.
उन्होंने कहा, "अमेरिका अफ़ग़ान नागरिकों की मदद करना बंद नहीं करेगा. हम कूटनीतिक रास्तों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय प्रभाव का इस्तेमाल करेंगे और मानवीय मदद पहुंचाना चालू रखेंगे. हिंसा और अस्थिरता न हो इसके लिए प्रांतीय स्तर पर हम कूटनीतिक प्रयास करते रहेंगे."
बाइडन ने कहा "इस बात को लेकर मैं स्पष्ट हूं कि हमारे देश की विदेश नीति के केंद्र में मानवाधिकारों का सम्मान है. लेकिन ऐसा करने के लिए हम अनंत काल तक अपने सैनिकों को किसी दूसरी धरती पर नहीं भेज सकते."
उन्होंने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान में 20 साल लंबे अमेरिकी मिशन का उद्देश्य "राष्ट्र निर्माण" या "एक केंद्रीय लोकतंत्र बनाना" नहीं था, बल्कि इसका उद्देश्य अमेरिकी ज़मीन पर आतंकी हमलों को रोकना था.
वीडियो कैप्शन, काबुल एयरपोर्ट पर गोलीबारी से अफ़रातफ़री, कई लोगों की मौत
'अमेरिकियों पर हमला हुआ तो नतीजे भयंकर होंगे'
बाइडन ने चेतावनी दी कि "तालिबान को हमने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि अगर अमेरिकी सैनिकों पर हमला किया गया या फिर अमेरिकी अभियान पर असर पड़ा तो अमेरिका तुरंत इसका जवाब देगा और "ज़रूरत पड़ने पर अपनी पूरी विध्वंसक शक्ति के साथ अमेरिका अपने लोगों की रक्षा करेगा."
उन्होंने कहा, "मैं चौथा राष्ट्रपति हूं तो अफ़ग़ानिस्तान संकट की आग झेल रहा है. मैं इस युद्ध की आग को अपने बाद के राष्ट्रपतियों तक नहीं पहुंचने दूंगा."
उन्होंने कहा, "मौजूदा हालात को देख कर दुख हो रहा है, लेकिन अफ़ग़ानिस्तान के युद्ध में अमेरिकी सैनिकों की भूमिका ख़त्म करने के फ़ैसले पर मुझे कोई पछतावा नहीं. ये युद्ध यहीं ख़त्म हो जाना चाहिए."
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अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका का नया मिशन
अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी नागरिकों और आम अफ़ग़ान नागरिकों को वहां से सुरक्षित बाहर निकालने के लिए 6,000 अतिरिक्त सैनिक भेजे गए हैं.
अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान के सहयोगियों और ज़रूरतमंद अफ़ग़ान नागरिकों को देश से बाहर निकालेगा.
अमेरिकी सैनिक काबुल हवाई क्षेत्र को सुरक्षित करेंगे, एयर ट्रैफिक का नियंत्रण अपने हाथों में लेंगे और ये सुनिश्चित करेंगे कि नागरिक और सैन्य उड़ानें चालू रहें.
सैन्य सहायता के माध्यम से अमेरिका 'ऑपरेशन अलाइज़ रिफ्यूजी' चलाएगा जिसके तहत जिन अफ़ग़ान नागरिकों को तालिबान से ख़तरा है उन्हें देश से बाहर निकालने की व्यवस्था की जाएगी.