काबुल के बेहद नज़दीक तालिबान, दो और प्रांतीय राजधानियों पर क़ब्ज़ा

अगर काबुल पर तालिबान का क़ब्ज़ा होता है तो यह अफ़गान सरकार और सेना के लिए बहुत बड़ा झटका होगा.

लाइव कवरेज

  1. पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस के दिन पीएम मोदी की ये घोषणा

    नरेंद्र मोदी

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    आज पाकिस्तान अपना 75वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है. पाकिस्तान भारत से एक दिन पहले अपना स्वतंत्रता दिवस मनाता है. पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस के दिन भारतीय प्रधानमंत्री ने ट्वीट कर कहा है किदेश के विभाजन की विभीषिका के शिकार होने वाले लोगों की याद में 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस मनाया जाएगा.

    ब्रिटिश शासन से मुक्ति और भारत विभाजन एक साथ हुआ. भारत का धर्म के आधार पर विभाजन हुआ था और पाकिस्तान नाम का एक मुल्क बना. इस विभाजन को लेकर भयावह हिंसा हुई थी.

    प्रधानमंत्री मोदी ने अपने ट्वीट में कहा है, ''देश के बँटवारे के दर्द को कभी भुलाया नहीं जा सकता. नफ़रत और हिंसा की वजह से हमारे लाखों बहनों और भाइयों को विस्थापित होना पड़ा और अपनी जान तक गंवानी पड़ी. उन लोगों के संघर्ष और बलिदान की याद में 14 अगस्त को 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' के तौर पर मनाने का निर्णय लिया गया है.’’

    ‘’यह दिन हमें भेदभाव, वैमनस्य और दुर्भावना के जहर को ख़त्म करने के लिए न केवल प्रेरित करेगा, बल्कि इससे एकता, सामाजिक सद्भाव और मानवीय संवेदनाएं भी मज़बूत होंगी.''

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  2. अफ़ग़ानिस्तान के 20,000 लोगों को हम शरण देंगे: कनाडा के पीएम

    जस्टिन ट्रूडो

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    कनाडा ने तालिबान की बढ़ती हिंसा के कारण देश छोड़ने को मजबूर अफ़गान लोगों की मदद करने की घोषणा की .

    कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने इसकी जानकारी देते हुए एक ट्वीट में लिखा, "अफ़ग़ानिस्तान में हालात ख़राब हो रहे हैं और वहाँ के लोगों की ज़िदगी ख़तरे में है. उनकी मदद के लिए हम अपने रिसेटलमेंट प्रोग्राम का विस्तार कर रहे हैं - हम 20,000 प्रभावित अफ़ग़ानिस्तान के लोगों को शरण देंगे और इस प्रक्रिया में तेज़ी लाएंगे."

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    इमीग्रेशन मंत्री मार्को मेंडिसिनो ने जानकारी दी कि इस नई योजना में महिला नेता, मानवाधिकार कार्यकर्ता, पत्रकार, अल्पसंख्यक समुदाय के लोग, एलजीबीटीक्यूआई सदस्य और वहां पहले से बसे इंटरप्रेटर शामिल होंगे, जिन्हें अपने देश में तालिबान से ख़तरा है.

    मेंडिसिनो कहा, "अफ़ग़ानिस्तान में स्थिति दयनीय है और कनाडा वहां के लोगों से साथ खड़ा है."

    इसके अलावा सरकार ने जानकारी दी है कि पहले से लागू स्पेशल इमिग्रेशन प्रोग्राम भी जारी रहेगा जिसके तहत उन लोगों की मदद की जा रही है जिन्होंने अफ़गानिस्तान में कनाडा के लिए काम किया है.

  3. तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़ा किया तो नहीं मिलेगी मान्यता: नेटो

    जेन्स स्टोलटेनबर्ग

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    अफ़ग़ानिस्तान में बिगड़ते हालात के बीच नेटो (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइज़ेशन) के सेक्रटरी जनरल जेन्स स्टोलटेनबर्ग ने शुक्रवार को कहा कि नेटो के सहयोगी देश अफ़ग़ानिस्तान में संघर्ष का राजनीतिक समाधान चाहते हैं और तालिबान अगर बलपूर्वक सत्ता में आता है, तो उसे मान्यता नहीं दी जाएगी.

    स्टोलटेनबर्ग ने एक बयान जारी कर कहा,"हम ज़मीनी स्तर पर घटनाओं का आकलन कर रहे हैं और हम अफ़ग़ान अधिकारियों और बाकी अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ लगातार संपर्क में हैं. नेटो के सहयोगी तालिबान के हमले के कारण बड़े स्तर पर हो रही हिंसा को लेकर चिंतित हैं, जिसमें नागरिकों पर हमले, हत्याएं और अन्य गंभीर मानवाधिकारों के हनन की रिपोर्ट शामिल हैं."

    "तालिबान को यह समझने की जरूरत है कि अगर वो देश पर ज़बरदस्ती कब्ज़ा करते हैं, तो उन्हें अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा मान्यता नहीं दी जाएगी. हम संघर्ष के राजनीतिक समाधान का समर्थन करने के लिए प्रतिबद्ध हैं."

    नेटो अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, कनाडा, तुर्की, स्पेन समेत तीस देशों का एक समूह है. तालिबान के ख़िलाफ़ 2001 से अफ़ग़ानिस्तान में शुरू हुए अभियान में नेटो देश ही शामिल थे.

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  4. तालिबान की बढ़त के लिए राष्ट्रपति बाइडन की दुनिया भर में आलोचना

    बाइडन

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    अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के तेज़ी से बढ़ते कब्ज़े के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति पर सवाल उठने लगे हैं, लेकिन बाइडन सैनिकों को वापस बुलाने के फ़ैसले पर अडिग हैं और उनका मानना है कि जनता उनके साथ है.

    20 साल में दो ट्रिलियन डॉलर ख़र्च करने के बाद और 2,500 अमेरिकियों की जान गंवाने के बाद अमेरिका अपने सैनिकों को वापस बुला रहा है. इस बीच तालिबान बिना प्रतिरोध के अफ़ग़ानिस्तान के कई बड़े शहरों पर कब्ज़ा कर चुका है और राजधानी काबुल के क़रीब पहुँच गया है.

    समाचार एजेंसी एएफ़पी के मुताबिक, विपक्षी रिपब्लिकन पार्टी ने बाइडन पर कई सवाल उठाए हैं, अमेरिकी टीवी पर अफ़ग़ानिस्तान की तस्वीरों के साथ बाइडन का क़रीब एक महीने पुराना वो बयान भी चलाया जा रहा है, जिसमें उन्होंने कहा था, "तालिबान सब कुछ चलाएगा और देश में सभी जगहों पर उसका कब्ज़ा होगा,इसकी उम्मीद बहुत कम है."

    अमेरिकी अख़बार द वॉशिंगटन पोस्ट ने एक संपादकीय में लिखा है कि बाइडन ने 2001 से अफगानिस्तान में हुई प्रगति को ख़तरे में डाल दिया था, जिसमें लड़कियों की शिक्षा भी शामिल थी.

    तालिबान

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    अखबार ने लिखा, "अफ़ग़ानों की बर्बाद और ख़त्म होती ज़िंदगी बाइडन की विरासत का हिस्सा होगी, वैसे ही जैसे कि इस फ़ैसले के कारण बचने वाले अमेरिकी डॉलर."

    अमेरिका 3,000 सैनिकों को वापस बुला रहा है और क़रीब इतने इस महीने वापस आ चुके हैं. इसके अलावा वो दूतावास के कर्मचारियों और उन अफग़ानों को वहाँ से बाहर निकाल रहा है, जिन्होंने अमेरिकी सुरक्षा बलों की मदद की थी और उनकी जान को ख़तरा है.

    सालों से बाइडन और अमेरिकी ओपिनियन पोल ऐसे क़दम की वकालत करते रहे हैं.

    वोटवेट्स नाम की समर्थन करने वाली संस्था ने "अंतहीन युद्ध चाहने वालों के सामने खड़े होने की ताकत रखने वाले" बाइडन की सराहना की है.

    बाइडन का तर्क है कि अमेरिका ने 11 सितंबर, 2001 के हमलों के बाद अल-क़ायदा को हराने के अपने मुख्य लक्ष्य को बहुत पहले हासिल कर लिया था और 3,00,000 अफ़ग़ान सैनिकों को प्रशिक्षण देना पर्याप्त था.

    तालिबान

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    बाइडन ने मंगलवार को कहा, "उन्हें अपने लिए लड़ना है, अपने देश के लिए लड़ना है"

    लेकिन जून में दौरा करने वाले अफ़ग़ानिस्तान विशेषज्ञ एंड्रयू वाइल्डर ने एएफ़पी से कहा था कि प्रशासन अपेक्षित प्रभावों की तैयारी के लिए और अधिक समय दे सकता था और यह "एक व्यवस्थित और ज़िम्मेदार वापसी" नहीं है.

    यूएस इंस्टिट्यूट ऑफ पीस में एशिया स्टडीज के उपाध्यक्ष वाइल्डर ने कहा, "मुझे लगता है कि यह निष्कर्ष निकालना मुश्किल नहीं है कि अमेरिका की वापसी नहीं, बल्कि वापसी के तरीक़े का बड़ा असर हुआ है."

    रिपब्लिकन सीनेट मिच मैककोनेल ने कहा कि बाइडन ने "बड़े पैमाने पर, एक रोके जाने योग्य आपदा" को होने दिया. पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस "दुखद घटना" की निंदा करते हुए एक बयान जारी किया और लिखा, "क्या आपको मेरी कमी महसूस होती है?"

    हालांकि ट्रंप ने ख़ुद तालिबान के साथ फरवरी 2020 में समझौते किया था, जिसके सेना की वापसी में तेज़ी आई.

    बाइडन अफ़ग़ानिस्तान में हो रहे ख़र्चे की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, इस वक़्त अमेरिका को चीन से बड़ी चुनौती पर ध्यान देने की ज़रूरत है.

    बाइडन

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    वामपंथी झुकाव वाले सीनियर फ़ेलो सी ब्रायन कैटुलिस चिंता व्यक्त करते हैं कि तालिबान को बढ़त से बाइडन का लोकतंत्र को बचाने वाला घोषित मिशन कैसे प्रभावित होगा.

    कैटुलिस ने कहा कि यह स्पष्ट नहीं है कि बाइडन को इसकी कितनी बड़ी राजनीतिक क़ीमत चुकानी होगी. 2011 में इराक़ से अमेरिका की वापसी का फ़ैसला, जिसमें बाइडन का अहम योगदान था, वो लोकप्रिय हुआ लेकिन तभी तक जब तक इस्लामिक स्टेट चरमपंथी आंदोलन का उदय नहीं हो गया.

    कैटुलिस ने कहते हैं, "यह वास्तव में इस बात पर निर्भर करता है कि यह कितनी ख़राब शक्ल लेता है."

    उन्होंने कहा, "अगर यह अत्याचारों की एक श्रृंखला है, जिसका सिर्फ़ अफ़गान लोगों पर असर होगा, तो सीरिया का उदाहरण देख सकते हैं, जहाँ यह कहा जाता है कि हम कुछ नहीं कर सकते,"

    "लेकिन अगर इसमें अमेरिकी शामिल हैं, तो हालात कैसे बदलेंगे ये बता पाना मुश्किल है."

    तालिबान

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