उत्तर प्रदेश पुलिस के विशेष कार्य बल (एसटीएफ) ने केरल के पत्रकार सिद्दीक़ कप्पन के ख़िलाफ़ 5000 पन्नों का आरोपपत्र दायर किया है.
सिद्दीक़ कप्पन वही पत्रकार हैं जिन्हें बीते साल अक्तूबर में तब गिरफ़्तार किया गया था जब वे दलित युवती के साथ कथित सामूहिक बलात्कार और हत्या मामले में रिपोर्टिंग के लिए दिल्ली से हाथरस जा रहे थे.
तब कप्पन के साथ गिरफ्तार किए गए तीन अन्य लोगों को मिलाकर कुल सात लोगों पर ग़ैर-क़ानूनी गतिविधियां (निवारण) क़ानून (यूएपीए) के तहत मामला दर्ज किया गया था.
पत्रकार कप्पन और तीन अन्य लोगों को मथुरा पुलिस ने 'प्रिवेंटिव पावर' के तहत हिरासत में लिया था. सीआरपीसी की धारा 151 के तहत पुलिस किसी अपराध की आशंका के कारण किसी को भी हिरासत में ले सकती है.
इन चारों को बीते साल छह अक्तूबर के दिन एक्ज़ेक्यूटिव मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया और कोर्ट ने उन्हें 14 दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया. जबकि एक्ज़ेक्यूटिव मजिस्ट्रेट के अधिकार क्षेत्र में सिक्योरिटी या बॉन्ड भरवाना है ना कि हिरासत में भेजना.
दूसरी तरफ़, छह अक्तूबर को ही केरल यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स ने संविधान के आर्टिकल 32 के तहत कप्पन के लिए हेबियस कॉर्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाख़िल की थी.
याचिका में कहा गया था कि उनके सहकर्मी, परिवार या किसी को भी कप्पन को हिरासत में लिए जाने की ख़बर नहीं दी गई थी. किसी को नहीं बताया गया कि उन्हें कहां रखा गया है और किस मामले में हिरासत में लिया गया है.
सात अक्तूबर को पुलिस ने इस मामले में पहली एफ़आईआर दर्ज की थी.
इस एफ़आईआर में यूएपीए के सेक्शन 17 और 18, भारतीय दंड संहिता के सेक्शन 124A (राजद्रोह), 153A (दो समूहों के बीच वैमनस्य बढ़ाने), 295A (धार्मिक भावनाएं आहत करने) और आईटी एक्ट के सेक्शन 62, 72, 76 लगाए गए थे.
सिद्दीक़ कप्पन के साथ-साथ अतिकुर्रहमान, आलम और मसूद पर एफ़आईआर दर्ज की गई.
रहमान और आलम छात्र और एक्टिविस्ट हैं और मसूद एक टैक्सी ड्राइवर हैं जिनकी टैक्सी में बाक़ी लोग हाथरस के पीड़ित परिवार से मिलने जा रहे थे.
एफ़आईआर के मुताबिक़ "अभियुक्तों के पास कुल छह फोन पाए गए और एक लैपटॉप. उनके पास 'जस्टिस फॉर हाथरस विक्टिम' लिखा एक पोस्टर था. ये लोग शांति भंग करने के मक़सद से हाथरस जा रहे थे. मीडिया रिपोर्ट्स से प्रतीत हो रहा है कि कुछ असामाजिक तत्व जातिगत तनाव और दंगा भड़काने का प्रयास कर रहे हैं. अभियुक्त carrd.co नाम की वेबसाइट भी चला रहे हैं और इस वेबसाइट के माध्यम से विदेशी चंदा इकट्ठा कर रहे हैं. इनके पास से बरामद पोस्टर 'एम आई नॉट इंडियास डॉटर' सामाजिक वैमनस्यता बढ़ाने और जन विद्रोह भड़काने वाले हैं. वेबसाइट के कृत्यों से यूएपीए के सेक्शन 17 और 18 के अंतर्गत मामला बन रहा है. आईटी एक्ट की धारा 65, 72 और 75 में मामला बन रहा है."
कप्पन की हेबियस कॉर्पस याचिका पर 12 अक्तूबर को चीफ़ जस्टिस बोबडे, एएस बोपन्ना, वी रामासुब्रमनियन की बेंच ने पहली सुनवाई की थी.
कप्पन के लिए केस लड़ रहे वकील कपिल सिबल ने कोर्ट को बताया था कि उनके मुवक्किल से परिवार को और वकील को नहीं मिलने दिया जा रहा.
उनकी मांग थी कि कोर्ट राज्य सरकार को नोटिस जारी करे और मथुरा ज़िला जज को जेल में मानवाधिकार उल्लंघन की जांच करने का निर्देश दे.
लेकिन कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस नहीं दिया था और वकील सिब्बल को पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट जाने की सलाह दी थी. लेकिन सिब्बल के आग्रह पर कोर्ट ने चार हफ्ते बाद की तारीख़ दी थी.
16 नवंबर की सुनवाई के दिन कोर्ट ने कहा कि वो आर्टिकल 32 की याचिकाओं को बढ़ावा नहीं देना चाहता. हालांकि कोर्ट उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस भेजने के लिए राज़ी हो गया था.