बीबीसी न्यूज़ हिन्दी पर आज का कार्टून

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कोरोना के कारण सबसे ज़्यादा मौत अमरीका में हुई है. अकेले न्यूयॉर्क शहर में दो लाख से ज़्यादा लोग संक्रमित हुए हैं और 21 हज़ार से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं.

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दिल्ली में कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच लोगों को यही चिंता सता रही है कि दिल्ली में कोरोना क्या 'कम्युनिटी ट्रांसमिशन' के स्टेज में पहुंच चुका है.
इन शंकाओं का जवाब मंगलवार को होने वाली दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की बैठक के बाद शायद मिल सकता है.
दिल्ली के डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया ने ट्वीट कर यह सूचना दी है कि इस बैठक में यह चर्चा होनी है कि ‘क्या दिल्ली में कोरोना वायरस कम्युनिटी ट्रांसमिशन की स्थिति में पहुँच गया है.’
मंगलवार को होने वाली इस बैठक का नेतृत्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया करेंगे क्योंकि तबीयत ख़राब होने के कारण मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल इसमें शामिल नहीं हो सकेंगे.
ट्वीट में सिसोदिया ने लिखा है, “कल दिल्ली आपदा प्रबंधन अथोरिटी की बैठक अपने निर्धारित शेडयूल के अनुसार होगी. मुख्यमंत्री की तबीयत ठीक ना होने के कारण उन्होंने मुझे इस बैठक के लिए अधिकृत किया है.”
मंगलवार के लिए पहले से निर्धारित दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की इस बैठक में दिल्ली के उप-राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और दिल्ली पुलिस के कमिश्नर को भी शामिल होना है.
सोमवार सुबह बताया गया था कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की तबीयत ठीक नहीं होने की वजह से उनकी मंगलवार की सभी मीटिंगें रद्द कर दी गई हैं.

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सिंगापुर सरकार की ‘वायरस टास्क फ़ोर्स’ के प्रमुख ने सोमवार को बताया कि सिंगापुर में कोविड-19 के जो नये मामले सामने आये हैं, उनमें आधे से ज़्यादा में कोई लक्षण नहीं है.
एशियाई देशों में सिंगापुर, उन कुछ शुरुआती देशों में शामिल है जहाँ कोरोना वायरस संक्रमण बहुत अधिक फ़ैला है.
सिंगापुर में अब तक 38 हज़ार से अधिक केस दर्ज किये जा चुके हैं और वहाँ के प्रवासी मज़दूरों की बस्तियों में संक्रमण फ़ैलने से कोविड-19 के मामलों में तेज़ वृद्धि हुई है.
पिछले हफ़्तों में हुई टेस्टिंग के बारे में प्रेस से बात करते हुए ‘वायरस टास्क फ़ोर्स’ के सदस्यों ने कहा, “हमारे अनुभव के अनुसार, एक केस अगर लक्षण वाला सामने आ रहा है तो दूसरा केस बिना लक्षण वाले मरीज़ का है. और यह बदलाव हाल के हफ़्तों में हुआ है.”
पिछले दो सप्ताह में सिंगापुर में 6,294 नए केस सामने आये हैं. इनमें से कितने केस बिना लक्षण वाले मरीज़ों के हैं, इसे लेकर कोई संख्या नहीं दी गई है.
सिंगापुर से पहले चीन भी कह चुका है कि उनके यहाँ, वुहान शहर में क़रीब 300 केस ऐसे हैं जिनमें कोई लक्षण नहीं हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि ‘बिना लक्षण वाले मरीज़ों का सामने आना इसलिए चुनौती भरा है, क्योंकि इससे महामारी पर नियंत्रण करना और मुश्किल हो जाता है.’
लेकिन सिंगापुर सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि अगर बिना लक्षण वाले मरीज़ों का पता चलता भी है, तो समझने वाली बात यह है कि उनके पास संक्रमण फ़ैलाने के रास्ते कम रह जाते हैं क्योंकि वो ना खाँस रहे हैं और ना ही छींक रहे हैं.
पर बिना लक्षण वाले मरीज़ नए लोगों को संक्रमित कर सकते हैं जो कुछ लोगों के लिए ख़तरनाक साबिक हो सकता है, इसलिए सिंगापुर सरकार धीरे-धीरे ही लॉकडाउन को हटाये जाने के पक्ष में है.

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चीन सरकार ने सोमवार को अमरीकी सीनेटर रिक स्कॉट को चुनौती दी है कि ‘उनके पास इस बात के सबूत हैं तो वो पेश करें’ कि चीन पश्चिमी देशों द्वारा तैयार किये जा रहे कोविड-19 के वैक्सीन में बाधा डालने का प्रयास कर रहा है.
अमरीकी सीनेटर रिक स्कॉट ने अपने एक बयान में कहा था कि चीन, पश्चिमी देशों में वैक्सीन तैयार करने के काम को प्रभावित कर रहा है. उन्होंने यह भी कहा था कि इस बात के सुबूत उनके ख़ुफ़िया समुदाय से मिले हैं.
इसके जवाब में सोमवार को चीन के विदेश मंत्री हुआ चुनयिंग ने कहा, “जब अमरीकी सीनेटर कह ही रहे हैं कि उनके पास सबूत हैं कि चीन टीका तैयार करने के काम में बाधा डाल रहा है, तो उन्हें दुनिया के सामने पेश भी करें. इसमें शर्माने वाली क्या बात है.”
ट्रंप प्रशासन और वॉशिंगटन में बैठने वाले अमरीकी सरकार के वरिष्ठ अधिकारी कोरोना वायरस संक्रमण फैलने के लिए चीन को ज़िम्मेदार मानते रहे हैं. उनका यक़ीन है कि चीन ने स्थितियों को सही से नहीं संभाला जिसकी वजह से दुनिया में चार लाख से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है.
उधर चीन, अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप और उनकी सरकार के दावों को ख़ारिज करता रहा है.
प्रेस से बात करते हुए अमरीकी सीनेटर रिक स्कॉट ने जिस समय चीन को लेकर यह दावा किया था, तो उन्होंने इससे जुड़ी कोई भी जानकारी साझा नहीं की थी.
बीबीसी से बातचीत में रिक स्कॉट ने सिर्फ़ इतना कहा था कि ‘चीन नहीं चाहता की हम टीका पहले बनाएं.’

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दुनियाभर में कोरोना संक्रमण के जितने मामले अभी तक दर्ज किए गए हैं, उनमें आधे से ज़्यादा मामले कोविड-19 से सबसे ज़्यादा प्रभावित पांच देशों के हैं.
जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के आंकड़ों के अनुसार कोरोना संक्रमण के मामले 70 लाख पार कर चुके हैं.
अमरीका कोरोना से प्रभावित देशों की सूची में सबसे ऊपर बना हुआ है. अमरीका में संक्रमितों की संख्या 19 लाख से ज़्यादा है.
तकरीबन सात लाख मामलों के साथ ब्राज़ील इस लिस्ट में दूसरे नंबर पर है.
रूस में 467,073, ब्रिटेन में 287,621 मामलों के बाद भारत 257,486 केसेज़ के साथ इस लिस्ट में पांचवें नंबर पर है.
लेकिन इन देशों में कोरोना टेस्टिंग के पैमाने अलग-अलग हैं. हाल के हफ़्तों में अमरीका में टेस्टिंग की सुविधा का विस्तार किया गया है.
लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ब्राज़ील और भारत में टेस्टिंग बहुत छोटे पैमाने पर की जा रही है.
उनका कहना है कि यहां संक्रमण की जो स्थिति बताई जा रही है, हालात उससे भी ख़राब हो सकते हैं. लेकिन इसमें अलग-अलग जनसंख्या का मामला भी है.
अमरीका में 33 करोड़ लोग हैं जबकि भारत में 130 करोड़ लोग हैं.

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कोरोना वायरस महामारी के कारण मार्च महीने से बंद देश के अधिकांश धार्मिक स्थलों को सोमवार से फिर खोल दिया गया है.
गृह मंत्रालय द्वारा जारी की गई गाइडलाइंस को ध्यान में रखते हुए देश में लाखों की संख्या में मौजूद मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारे खोले गये हैं.
स्वास्थ्य मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार धार्मिक स्थलों में मूर्तियों और धार्मिक पुस्तकों को हाथ लगाना मना है. साथ ही कीर्तन और सामूहिक प्रार्थना करने वाले जत्थों के धार्मिक स्थलों में जाने पर फ़िलहाल रोक लगाई गई है.
दिल्ली के चाँदनी चौक स्थित गौरी शंकर मंदिर में सोमवार को लोग प्रार्थना करने पहुँचे.
हालांकि दिल्ली इस वक़्त कोरोना वायरस संक्रमण का दूसरा सबसे बड़ा हॉटस्पॉट है और यहाँ कोविड-19 के मामले तेज़ी से बढ़े हैं.
दिल्ली के नामी कालका जी मंदिर और गुरुद्वारा श्री बंगला साहिब में भी काफ़ी लोग प्रार्थना के लिए देखे गए.
श्री बंगला साहिब गुरुद्वारे के बाहर एक ‘डिसइन्फ़ेक्टेंट टनल’ बनाई गई है जिससे गुज़रने के बाद ही श्रद्धालुओं को गुरुद्वारे में जाने की अनुमति होगी.
सोमवार को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने भी गोरखनाथ मंदिर में प्रार्थना की.
लखनऊ की बड़ी ईदगाह मस्जिद में भी बहुत से नमाज़ियों को देखा गया.
देश के कई हिस्सों से ऐसी ही तस्वीरें देखने को मिल रही हैं, धार्मिक स्थलों में बहुत भीड़ तो नहीं, पर लोग पहुँच रहे हैं.
बताया गया है कि बद्रीनाथ समेत चार धाम यात्रा की भी तैयारियाँ पूरी कर ली गई हैं. हालांकि स्थानीय प्रतिनिधियों ने सरकार से अनुरोध किया है कि फ़िलहाल यात्रा ना शुरू करवाई जाये.
ओडिशा सरकार ने भी मौजूदा स्थिति को ध्यान में रखते हुए आदेश दिया है कि सभी धार्मिक स्थल 30 जून तक बंद रहेंगे.
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दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का कोरोना टेस्ट कराया जाएगा.
समाचार एजेंसी एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक़ बुखार और गले में खराश की शिकायत के बाद मुख्यमंत्री केजरीवाल का कोरोना टेस्ट कराने का फ़ैसला किया गया है.
ऐसी रिपोर्टें हैं कि उन्होंने खुद को घर में सेल्फ़ आइसोलेट कर लिया है.
मंगलवार दोपहर तक के लिए मुख्यमंत्री की पूर्व निर्धारित सभी मीटिंग्स रद्द कर दी गई हैं.
हालांकि दिल्ली सरकार की तरफ़ से मुख्यमंत्री के स्वास्थ्य पर फिलहाल कोई आधिकारिक बयान नहीं जारी किया गया है.
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दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने राज्य सरकार के अस्पतालों को दिल्लीवालों के लिए रिज़र्व किए जाने पर सफ़ाई दी है.
उन्होंने कहा, "अगर केंद्र सरकार ने अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को समय रहते भारत आने से रोक दिया होता तो हालात बेहतर होते. बढ़ते मामलों के लिहाज से देखें तो दिल्ली वालों को अस्पताल की ज़रूरत है. पड़ोस के राज्यों का कहना है कि उनके यहां कम मामले हैं तो ये बड़ा मुद्दा नहीं होना चाहिए. हमारे पास फिलहाल 8500-9000 बेड्स हैं. अगले 15 दिनों में हम इसे 15 हज़ार से 17 हज़ार तक बढ़ाना चाहते हैं. चूंकि हर दो हफ़्ते में संक्रमण के मामले दो गुने हो जा रहे हैं इसलिए हमें लगता है कि अगले दो हफ़्तों में 56 हज़ार मामले हो जाएंगे."
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"एक के बाद एक परिवार के लोग बीमार पड़ने लगे थे. कोई खांस रहा था तो किसी को छींक आ रही थी. पूरे माहौल में डर पसरा हुआ था."
नेहाली पवार बताती हैं कि कैसे कोरोना वायरस संक्रमण कहर बन कर उनके परिवार पर टूटा. 18 सदस्यों का उनका संयुक्त परिवार मुंबई में वडाला के नज़दीक रहता है.
हालांकि ये इलाक़ा झुग्गी झोपड़ियों और तंग गलियों से पटा पड़ा है लेकिन नेहाली के घर में नौ कमरे हैं.
कोरोना के कारण लगाए गए लॉकडाउन के दौरान देश के दूसरे परिवारों की तरह उनका परिवार भी अपने घर पर ही सिमट गया.
परिवार के सदस्य अलग-अलग तरह के पकवान बनाने, मिल कर गीत गाने, ताश के पत्ते खेलने और पूरी-पूरी रात जाग कर खेलने में बिताने लगे थे.
लेकिन महीने भर के भीतर ये खुशी उस वक्त ख़त्म हो गई जब परिवार के सामने कोरोना वायरस का संकट आया.
लेकिन वडाला के इस पवार परिवार ने इस बीमारी के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई जीत ली है.

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मायावती ने कहा, "दिल्ली देश की राजधानी है. यहाँ पूरे देश से लोग अपने जरूरी कार्यों से आते रहते हैं. ऐसे में यदि कोई व्यक्ति अचानक बीमार पड़ जाता है तो उसको यह कहकर कि वह दिल्ली का नहीं है इसलिए दिल्ली सरकार उसका इलाज नहीं होने देगी, यह अति-दुर्भाग्यपूर्ण. केन्द्र को इसमें जरूर दखल देना चाहिये.

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कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने 'द इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में लेख लिखकर' कोरोना वायरस महामारी के दौर में मनरेगा की अहमियत बताई है.
उन्होंने लिखा है कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) 2005, मौलिक और तर्कसंगत प्रणालीगत बदलावों का एक उदाहरण है.
उन्होंने लिखा है कि यह मौलिक इसलिए है क्योंकि इसने बेहद ग़रीब तक सत्ता हस्तांतरित की है और उन्हें भूख एवं नुक़सान से बचाया है.
ज़रूरतमंद लोगों के हाथों तक सीधे पैसा पहुंचाने का तर्क देते हुए सोनिया गांधी आगे लिखती हैं, "अस्तित्व में आने के बाद से यहां तक कि छह साल की इस द्वेषपूर्व सरकार में भी इसने अपना होना साबित कर दिया है. एक सरकार जिसने इसे बदनाम किया, खोखला किया और बाद में बेरुख़ी से इस पर भरोसा किया."
मनरेगा के अलावा कांग्रेस अध्यक्षा ने कांग्रेस सरकार की बनाई सार्वजनिक वितरण प्रणाली की महत्वता पर भी बल दिया है.
उन्होंने लिखा है कि यह कोविड-19 के दौर में ग़रीबों और सबसे कमज़ोर नागरिकों को भुखमरी और बेबसी से बचाने में एक आधार का काम करता है चाहे यह जिस तरीक़े से भी लागू किया गया हो.
सोनिया गांधी लिखती हैं कि सिविल सोसाइटी के बरसों के संघर्षों के बाद मनरेगा को सितंबर 2005 में अधिसूचित कर एक क़ानून बनाया गया, कांग्रेस पार्टी ने उनकी आवाज़ों को सुना.
लेख में सोनिया गांधी ने मोदी सरकार पर कई प्रकार से मनरेगा को कमज़ोर करने का भी आरोप लगाया.
उन्होंने मोदी सरकार से अपील करते हुए लिखा है कि कोरोना वायरस के इस राष्ट्रीय संकट में राजनीति का खेल खेलने का वक़्त नहीं है और यह बीजेपी बनाम कांग्रेस का मुद्दा नहीं है.
वो लिखती हैं कि इस शक्तिशाली तंत्र का इस्तेमाल करते हुए ज़रूरत के समय में भारत के लोगों की मदद की जानी चाहिए.

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कोरोना वायरस महामारी के इस दौर में अमरीका और चीन के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है.
एक अमरीकी सीनेटर ने चीन पर वैक्सीन बनाने के काम में रुकावट पैदा करने का आरोप लगाया है.
सीनेटर रिक स्कॉट ने अपने एक बयान में कहा कि चीन, पश्चिमी देशों में वैक्सीन तैयार करने के काम को प्रभावित कर रहा है.
उन्होंने कहा कि इस बात के सुबूत उनके खुफ़िया समुदाय से मिले हैं. हालांकि उन्होंने इससे जुड़ी कोई भी जानकारी साझा नहीं की.
चीन ने इस बीच वायरस के ख़िलाफ़ की गई अपनी कार्रवाई का बचाव करते हुए एक दस्तावेज़ जारी किया है, जिसमें दावा किया गया है कि चीन ने कोरोना वायरस के बारे में अमरीका को बीते चार जनवरी को ही सूचित कर दिया था.
चीन से शुरू हुआ कोरोना वायरस संक्रमण अब दुनिया भर में फैल चुका है. दुनिया में कोरोना वायरस संक्रमण के लगभग 70 लाख मामले हैं. वहीं मरने वालों की संख्या भी चार लाख से अधिक है.

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अमरीका का न्यूयॉर्क शहर सोमवार से ग़ैर-ज़रूरी सामानों के व्यापार के लिए भी खुल रहा है.
अमरीका प्रशासन का मानना है कि उनके यहाँ कोरोना वायरस महामारी का हॉटस्पॉट रहे न्यूयॉर्क शहर में परिस्थितियाँ अब सामान्य होती दिख रही हैं.
‘फ़ेज़-1’ में कुछ बदलावों के साथ स्थानीय प्रशासन द्वारा न्यूयॉर्क शहर को खोलने का सीधा मतलब है कि कंस्ट्रक्शन, मैनुफ़ैक्चरिंग और रिटेल क्षेत्र से जुड़े क़रीब 4 लाख लोग सोमवार से अपने काम पर लौटेंगे और शहर के सब-वे रेल सिस्टम के ज़रिये यात्राएं करने वाले लोगों में से क़रीब 90 प्रतिशत लोग फिर लौटेंगे.
हालांकि सभी लोगों से महामारी की रोकथाम संबंधी कुछ सावधानियाँ बरतने के लिए कहा गया है. स्थानीय प्रशासन ने इससे जुड़े निर्देश भी जारी किये हैं.
न्यूयॉर्क में अब तक कोविड-19 संक्रमण के दो लाख से ज़्यादा मामले दर्ज किये गए हैं और 21,844 लोगों की इस संक्रमण से मौत हुई है.
एक अनुमान के अनुसार, महामारी के दौरान इस शहर में आठ लाख से ज़्यादा लोगों की नौकरी जा चुकी है और शहर की आमदनी में इस साल नौ बिलियन अमरीकी डॉलर की कमी रहने का अनुमान लगाया गया है.
न्यूयॉर्क के गवर्नर एंड्र्यू क्योमो ने ट्विटर पर लिखा है, “कल (सोमवार) एक नया दिन होगा. न्यूयॉर्क फिर से खुल रहा है.”

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भारत में कोरोना वायरस संक्रमण के मामले रिकॉर्ड रूप से बढ़ना जारी हैं.

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न्यूज़ीलैंड में एक समय 1,500 से अधिक कोरोना संक्रमण के मामले थे लेकिन अब वहां पर कोरोना का एक भी सक्रिय मामला नहीं है.
ऐसा कहा जा रहा है कि न्यूज़ीलैंड ने वायरस को मात दे दी है या फिर वो उसे पहले स्थान पर जगह नहीं देना चाह रहा है.
तो अब सवाल यह उठ रहा है कि उसने यह कैसे किया?
इसकी पहली वजह देश में तेज़ी से और व्यापक तौर पर लॉकडाउन लागू किया था. देश ने 19 मार्च से ही सीमाएं बंद कर दी थी, उस समय देश में सिर्फ़ 30 मामले थे.
सात दिनों बाद हाई अलर्ट घोषित करते हुए देश में सख़्ती से लॉकडाउन लागू कर दिया गया था.
पांच सप्ताह के सख़्त लॉकडाउन के बाद पहली बार खाने की दुकानें और ग़ैर-ज़रूरी व्यापारिक प्रतिष्ठानों को खोलने की अनुमति दी गई थी.
आख़िरकार अप्रैल के अंत में संक्रमण लगभग शून्य हो गया और देश प्रतिबंध हटाने में सक्षम हो पाया.
वायरस इस देश से जाता हुआ दिख रहा है लेकिन प्रधानमंत्री जेसिंडा अर्डर्न ने चेताया है कि अभी सीमाएं नहीं खोली जाएंगी.