बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से राज्य में रेलवे स्टेशनों और
बस स्टैंडों पर प्रवासी मज़दूरों की भीड़ जमा होने को लेकर रिपोर्ट देने के लिए
कहा है.
मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता और न्यायाधीश के के पटेल की पीठ ने
शुक्रवार को सेंटर ऑफ़ ट्रेड यूनियंस की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए ये निर्देश
दिया.
याचिका में कहा गया था कि महाराष्ट्र से श्रमिक स्पेशल ट्रेनों और
बसों से अपने राज्यों में लौटने का आवेदन देने वाले श्रमिकों को कोई जानकारी नहीं
दी जा रही है.
ये भी कहा गया कि ट्रेनों और बसों पर सवार होने से पहले उन्हें तंग और
गंदी जगहों पर ठहराया गया है जहाँ खाने-पीने और ज़रूरी सुविधाओं की कोई व्यवस्था
नहीं है.
अतिरिक्त सॉलिसिटर जेनरल अनिल सिंह ने कहा कि प्रवासी मज़दूरों की
समस्या पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही दखल दे चुका है.
अदालत ने इसे नोट किया, मगर कहा कि इसके बावजूद राज्य सरकार को दो जून
तक रिपोर्ट पेश करनी होगी.
अदालत ने कहा,"स्थानीय परिस्थितियों को देखते हुए, हम ये मानते हैं कि सरकार को प्रवासी
मज़दूरों की तकलीफ़ों के बारे में एक रिपोर्ट देनी चाहिए कि कैसे इस पर ध्यान दिया
जा रहा है.
खंडपीठ ने कहा कि उन्होंने अख़बारों में आ
रही तस्वीरों को देखा है जिसमें मज़दूर ना केवल स्टेशनों बल्कि पास के रास्तों पर
भी रह रहे हैं.
अदालत ने कहा,"लोगों को इस तरह जुटने
देने से जिस मक़सद से लॉकडाउन लगाया गया था, वो मक़सद ही उल्टा हो जाएगा."
अदालत ने आगे कहा," रिपोर्ट में बताना चाहिए
कि राज्य से बाहर जाने के लिए किसी प्रवासी मज़दूर को किन-किन प्रक्रियाओं का पालन
करना है, कितने समय में वो ट्रेन या बस पर सवार हो पाएगा, और इस प्रतीक्षा के दौरान
उसे कहाँ ठहराया जाएगा, और उसके जीवनयापन के लिए क्या प्रबंध किए गए हैं."