तेल के कारोबार को कितना नुक़सान पहुँचा है, इसके बारे में 20 अप्रैल को उस वक़्त पता चला चला जब अमरीका में इसकी क़ीमत अब तक के इतिहास के सबसे निचले पायदान माइनस 38 डॉलर प्रति बैरल की दर पर पहुँच गई. इससे पहले पिछले 40 सालों में यह कभी भी 10 डॉलर प्रति बैरल से नीचे नहीं गया था.
पिछले कुछ महीनों में कोरोना वायरस से हुए लॉकडाउन ने बाज़ार में तेल की मांग भयानक रूप से कम कर दी है क्योंकि अरबों लोग यात्राएं नहीं कर रहे हैं. इसका असर किसी भी वित्तीय संकट, मंदी और युद्ध से ज़्यादा हुआ है.
अब अमरीका के पास इतना तेल है कि उसके पास रखने की जगह नहीं. हो सकता है कि निगेटिव में तेल की क़ीमत जाने की नौबत ना आए लेकिन इंडस्ट्री के विशेषज्ञों का कहना है कि यह आने वाले दिनों में संकट कम होता नहीं दिख रहा क्योंकि ये हालात हफ़्तों या फिर महीनों में नहीं ठीक होने जा रहे.
अमरीका के इंडिपेंडेंट पेट्रोलियम एसोसिएशन में अर्थशास्त्र और अंतराष्ट्रीय मामलों के उपाध्यक्ष फ्रेडिरक लॉरेंस का कहना है, “जिन चीज़ों के होने की आशंका थी वो उम्मीद से बहुत पहले ख़राब होनी शुरू हो गई है. पाइपलाइन कंपनियों की ओर से लोगों को नोटिस मिल रहा है और कहा जा रहा है वे अब और कच्चा तेल नहीं ले सकते. इसका मतलब हुआ कि कल को तेल के कुएँ बंद करने की नौबत आने वाली है.”
19वीं सदीं की शुरुआत से जो चीज़ वैश्विक पैमाने पर व्यापार का केंद्रीय तत्व हो वो अब पूरी दुनिया में इतनी प्रचूर मात्रा में है, कि कोई उसे पूछ नहीं रहा है. सूत्रों ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया कि दुनिया के अग्रणी तेल उत्पादक देशों में से एक रूस ने अपने तेल को बाज़ार से लेकर जलाने पर विचार कर रहा है.
नॉर्वे की एक बड़ी तेल कंपनी इक्वानोर ने अपनी तिमाही लाभांश में दो-तिहाई की कटौती कर दी है. अगले हफ़्ते दुनिया की बड़ी तेल उत्पादक कंपनियों एक्जॉन मोबिल कॉर्प, बीपी पीएलसी और रॉयल डच शेल पीएलसी की कमाई की रिपोर्ट आने वाली हैं. सभी से उम्मीद की जा रही है कि वे अतिरिक्त व्यय कटौतियों की बात करेंगे. निवेशकों की नज़र इस पर होगी कि ये कंपनियां अपने लाभांश को कैसे संभालती हैं.