कश्मीर के मानवाधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार को यूएपीए मामले में मिली ज़मानत, जहांगीर अली, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली की एक अदालत ने शनिवार को कश्मीर के जाने-माने मानवाधिकार कार्यकर्ता ख़ुर्रम परवेज़ और पत्रकार इरफ़ान मेहराज को ज़मानत दे दी.
इन दोनों को नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) ने आतंकवाद के आरोपों में 2020 में यूएपीए दर्ज किए गए एक मामले में गिरफ़्तार किया था.
परवेज़ और मेहराज को नई दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट के प्रिंसिपल और सेशंस जज पीताम्बर दत्त ने ज़मानत दी. ज़मानत की शर्तों और नियमों के बारे में एक डिटेल्ड ऑर्डर आने की उम्मीद है.
इन दोनों को हिरासत में लेने के बाद भारत को संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों और अन्य वैश्विक मानवाधिकार समूहों और कार्यकर्ताओं की आलोचना का सामना करना पड़ा है.
इन्होंने परवेज़ और मेहराज पर लगे आतंकवाद के आरोपों को "मनमाना" और "राजनीति से प्रेरित" बताया है. ये समूह भारतीय अधिकारियों से उन्हें रिहा करने की मांग भी करते रहे हैं.
एनआईए ने 2020 के मामले में परवेज़ को 2021 में और मेराज को 2023 में श्रीनगर से गिरफ़्तार किया था.
उनको अन्य आरोपों के साथ-साथ 'गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम 1967' (यूएपीए) की विभिन्न धाराओं के तहत अक्तूबर 2020 में दर्ज हुए एक मामले में गिरफ़्तार किया गया था.
गिरफ़्तारी के वक़्त परवेज़ 'जम्मू-कश्मीर कोएलिशन ऑफ़ सिविल सोसाइटी' के प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर थे.
यह एक सिविल सोसाइटी समूह था जो जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों और चरमपंथियों के मानवाधिकार उल्लंघनों पर रिपोर्ट बनाते थे.
गिरफ़्तारी के समय मेहराज एक स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर काम कर रहे थे. उनकी रिपोर्टें 'डॉयचे वेले', 'द वायर' और 'द इंडियन एक्सप्रेस' जैसे मीडिया समूहों में छपी हैं. मेहराज ने कश्मीर यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएट की पढ़ाई की है.
दोनों के जेल से जल्दी बाहर आने की उम्मीद है क्योंकि उनके ख़िलाफ़ ऐसा कोई आपराधिक मामला नहीं है जिसके बारे में पता हो.
पिछले महीने, दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अलग मामले में परवेज़ को ज़मानत दी थी. लेकिन, अदालत ने उन्हें इस मामले पर कोई भी सार्वजनिक बयान देने से रोक दिया था.
परवेज़ की चार साल से ज़्यादा की क़ैद पर ध्यान देते हुए, जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की बेंच ने 10 जून को फ़ैसला सुनाया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उनके अधिकार, यूएपीए की धारा 43डी (5) के तहत ज़मानत पर लगी रोक से ज़्यादा अहम हैं.