जहाँ शराब बनाने के लिए होता है मज़दूरों का उत्पीड़न, लगाये जाते हैं इलेक्ट्रिक शॉक

    • Author, फर्नांडो डुटर्टे
    • पदनाम, बीबसी वर्ल्ड सर्विस
  • प्रकाशित

दक्षिणी ब्राजील के शहर बेंटो गोंकाल्वेस में 22 फ़रवरी को पुलिस ने 200 से ज़्यादा लोगों को बचाया गया. इन लोगों से जबरन मज़दूरी कराई जा रही थी. इन्हें अपमानजनक हालात में रखने के साथ-साथ इनके साथ शारीरिक हिंसा की जा रही थी.

नीको लगातार खांसी के बावजूद अपने 15 सहयोगियों के साथ रहने वाले कमरे को छोड़ कर अंगूर चुनने के लिए निकल पड़े.

उन्होंने सोचा कि अंगूर से शराब बनाने के लिए उनके पास पर्याप्त हिम्मत है, लेकिन ऐसा नहीं था.

उत्तर-पूर्वी शहर सेल्वाडोर स्थित अपने घर से फ़ोन पर बात करते हुए वो बीबीसी से कहते हैं, "मैं उन लोगों को पीछे नहीं छोड़ सकता था जिन्हें मैं अपने साथ लाया था."

फ़ोन पर बात के दौरान वो अपनी खांसी रोकने की कोशिश करते सुनाई देते हैं.

नीको ने 47 कामगारों को इकट्ठा करने और उन्हें सेल्वाडोर से 3000 किलोमीटर दूर ब्राजील के शराब के इलाके बेंटो गोंकाल्वेस ले जाने में मदद की है.

उन सभी कामगारों को मुफ़्त में रहने की सुविधा और खाने के साथ हर दो महीने पर 770 डॉलर देने का वादा किया गया था.

ऐसे देश में जहां महीने की न्यूनतम मज़दूरी 250 डॉलर है, उसके मुक़ाबले इन कामगारों की अच्छी आमदनी है. लेकिन ऐसा क्या हुआ कि अच्छी आमदनी का अवसर उनके लिए एक बुरे सपने जैसा हो गया.

नीको बताते हैं, "हम जैसे ही वहां पहुंचे, हमें बिना आराम दिए काम पर भेज दिया गया. मैं तुरंत समझ गया कि कुछ गड़बड़ है."

मारपीट और बिजली के झटके

इसके बाद 15 घंटे की शिफ्ट, घटिया खाना और डराने-धमकाने की बारी आई.

इन मज़दूरों के जर्जर कमरों के बाहर निगरानी रखने लिए सुरक्षा गार्ड की तैनाती होती है. इनकी तैनाती इसलिए की जाती है ताकि किसी को भी भागने से रोका जा सके.

गार्ड रात में कामगारों के कमरे में अचानक घुस कर उन्हें काम पर जाने के लिए लिए मज़बूर करते हैं.

नीको बताते हैं, "जो मज़दूर ऐसा करने से हिचकते हैं या इसकी शिकायत करते हैं, उन्हें मारपीट और बिजली के झटकों के ज़रिए डराया जाता है."

उन्हें बारिश के दौरान काम करने से छाती में हुए संक्रमण के बाद भी काम करना पड़ता.

नीको ने आगे बताया, "वे बिजली का ऐसा उपकरण लेकर चलते हैं जिसमें से चिंगारी निकलती है. उस उपकरण का इस्तेमाल वो हमें नींद से जगाने के लिए करते हैं."

" वो कामगारों पर उस उपकरण का इस्तेमाल करने के लिए काफ़ी उत्साहित रहते हैं और झटके के बाद जब कोई कामगर चीखता तो वो हंसने लगते."

एक दूसरे मज़दूर पाउलो ने बीबीसी को बताया कि इस डर से उनका भी सामना हुआ. उन्होंने बताया कि उन्हें देर से उठने पर दो बार बिजली के झटके दिए गए.

वो बताते हैं, "उन्होंने मुझे कहा कि अगर मैंने मारपीट को लेकर हंगामा किया तो वो मुझे जान से मार देंगे."

नीके और पाउलो ने बीबीसी को बताया उन्होंने अपने साथ काम करने वाले कई साथियों के शरीर पर चोट और ख़रोच के निशान देखें है, जिन्होंने दावा किया कि उनके साथ गार्ड ने मारपीट की. हालांकि नीको और पाउलो इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी नहीं हैं.

दूसरे कई मज़दूर भी मारपीट को आम घटना बताते हैं.

पुलिस के ज्वांइट टास्कफ़ोर्स एजेंसियों ने 22 फ़रवरी को पाउलो और नीको समेत 18 से 54 की उम्र के बीच 205 मज़दूरों को वहां से बाहर निकाला था.

इन मज़दूरों से तीन सप्ताह तक बिना किसी ब्रेक के काम कराया गया था.

मज़दूरों ने इसकी शिकायत पुलिस से की. पुलिस को छापे के दौरान वहां बिजली के झटको वाले उपकरण और पेपर स्पे के डिब्बे मिले थे.

ब्राज़ील की तीन बड़ी शराब निर्माता कंपनियों को सर्विस देती थी कंपनी

इस ऑपरेशन की शुरूआत तीन मज़दूरों की शिकायत पर की गई थी, जो वहां से भाग निकले थे.

भागने के बाद उन मज़दूरों ने फ़ेनिक्स सर्विसेज का पर्दाफाश किया.

इस कंपनी ने ही नीको और उनके साथ आए लोगों को शराब बनाने की जगह पर काम दिलाया था.

यह कंपनी ब्राजील के तीन सबसे बड़े शराब निर्माता ऑरोरा, गैरीबाल्डी और सैलटन के लिए मज़दूर मुहैया करती है.

तीनों शराब निर्माता कंपनियों ने मज़दूरों के शोषण की जानकारी न होने की बात कही और सारा दोष कांट्रैक्टर पर मढ़ दिया है.

मज़दूर मुहैया करने वाली कंपनी फेनिक्स सर्विसेज़ ने एक बयान जारी किया जिसमें कहा गया कि,"आरोपों की जांच चल रही है और कंपनी किसी भी अनियमितता को दूर करने के लिए ज़रूरी सभी उपाय करेगी."

9 मार्च को शराब निर्माताओं ने कहा कि श्रम मंत्रालय के साथ एक समझौते के तहत कंपनियां जुर्माने के तौर पर 1.4 मिलियन डॉलर की राशि देने को तैयार है, जिसमें शोषित मज़दूरों के लिए मुआवज़ा भी शामिल है.

60,000 गुलाम

"शराब गुलाम कांड" को दुनिया के सामने स्थानीय पत्रकार ले कर आए और ये इस तरह की घटनाएं नई नहीं हैं.

साल 1995 से ब्राजील सरकार माना था कि इस तरह की घटनाएं हो रही हैं, और तब से लेकर अब तक 60,000 लोगों को गुलामी से बचाया जा चुका है. ये आकंडे ब्राज़ील के श्रम मंत्रालय ने पेश किए हैं.

इस तरह की घटनाएं सिर्फ ब्राजील में नहीं होती है. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुमान के मुताबिक़ साल 2021 में दुनिया भर में 28 मिलियन लोग जबरन मज़दूरी कर रहे थे.

ब्राजील के बाहिया राज्य के गुलामी-विरोधी सरकारी एजेंसी के मैनेजर एडमर फोंट्स कहते हैं, "जबरन श्रम के मामलों को 12 सालों तक देखने के बाद भी मैंने मज़दूरों को धमकाने के लिए ऐसा हिंसक आचरण नहीं देखा है."

वो आगे कहते हैं, "मज़दूरों को हायर कर शोषण करने वाले लोगों ने बहुत ढिठाई के साथ काम किया है उन्हें लग रहा था कि वो मज़दूरों के साथ ऐसे व्यवहार के बाद बच जाएंगे."

एडमर फोंट्स कहते हैं, "मज़दूर उत्तर-पूर्वी मूल के होते हैं जहां ग़रीबी और सूखाग्रस्त इलाकों की वजह से ये ब्राजील आते हैं."

"सभी लोगों ने बताया कि उन्हें लगातार प्रताड़ना दी गई."

फोंट्स बताते हैं कि ब्राजील में आधुनिक गुलामी पुरानी समस्या है.

वो मानते हैं कि कोविड-19 महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से ब्राजील में आई आर्थिक मंदी के कारण पिछले कुछ सालों में लोग जबरन मज़दूरी करने को और भी मजबूर हुए हैं.

एडमर फोंट्स कहते हैं, "जब लोगों का सामाजिक बहिष्कार बढ़ता है, तब लोग किसी भी तरह का काम करने को तैयार और बेताब हो जाते हैं."

धुर दक्षिणपंथी नेता जायर बोल्सोनारो ने आधुनिक ग़ुलामी पर रोक लगाने वाले कानूनी प्रयासों की कई मौकों पर आलोचना की थी.

"शराब ग़ुलाम" मामले की देखरेख करने वाले ब्राजील प्रोज़िक्यूसन सर्विस के ज़िला अटॉर्नी इतलवार मदीना ने बीबीसी से कहा, "ब्राज़ील में आधुनिक गुलामी राष्ट्रपति बोलसोनारो के साथ शुरू नहीं हुई थी, लेकिन उन्होंने इस मुद्दे को सार्वजनिक रूप से बौना बना दिया."

नस्लीय और शैक्षिक पूर्वाग्रह

मदीना ने यह भी कहा कि बोल्सनारो प्रशासन ने ग़ुलामी-विरोधी जांच के लिए बजट को घटा दिया और हाल के सालों में ऐसे मामलों की जांच के लिए अधिकारियों की कमी भी हो गई थी .

"हम नियम के उल्लंघनों को रोकने के लिए जांच पर निर्भर हैं."

श्रम मंत्रालय के आंकड़ों से पता चलता है कि 1995 और 2022 के बीच मज़दूरों के अधिकारों के उल्लंघन के 45% मामलों के लिए सिर्फ पशुपालन और गन्ना कटाई क्षेत्र ज़िम्मेदार थे.

ज़्यादातर काले और मिश्रित नस्ल के मज़दूर शोषित किए जाते हैं. इनकी शिक्षा कम होती है, कम शिक्षा की वजह से इन्हें काम के झूठे वादों से लुभाया जाता है. इसमें पुरुषों की संख्या ज़्यादा है.

ताइने डॉस सैंटोस इसमें अपवाद हैं. 17 साल की उम्र में मां बनने की वजह से उन्हें साओ पाउलो कॉफी बग़ान में काम करना पड़ा.

जून 2021 में एक छापे में बचाए जाने से पहले ताइने ने बिना भुगतान के 50 दिनों तक लगाातार काम किया था.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "मैं एक छोटे शहर से आती हूं जहां हर किसी के लिए पर्याप्त नौकरियां नहीं होती हैं. इसलिए लोग अक्सर अस्थायी काम खोजने की तलाश में रहते हैं."

"लेकिन किसी ने मुझे कभी नहीं बताया कि मुझे एक कै़दी की तरह रखा जाएगा."

इस अनुभव ने ताइने को एक एनजीओ बनाने के लिए प्रेरित किया. एनजीओ अस्थायी मजदूरों को उनके अधिकारों के बारे में जानकारी देने का काम करता है, ताकि उन्हें ग़ुलामी की स्थिति में अपने लिए मौजूद श्रम योजनाओं का पता चल सके.

वो कहती हैं, "मैं नहीं चाहती कि कोई भी फिर कभी इससे गुजरे."

गुलामी का अतीत

पत्रकार और राजनीतिक वैज्ञानिक नतालिया सुज़ुकी का कहना है कि श्रमिकों की सुरक्षा के लिए शोषण के ख़िलाफ़ 'फर्स्ट लाइन ऑफ डिफेंस' ज़रूरी है.

सुज़ुकी ब्राज़ील में एक एनजीओ की प्रभारी हैं. इस एनजीओ का उद्देश्य सामाजिक कार्यकर्ताओं और शिक्षकों को प्रशिक्षण देना है ताकि वे संभावित पीड़ितों को शिक्षित कर सकें.

सुज़ुकी बताती हैं, "ब्राजील के उत्पादन क्षेत्रों में ग़ुलामी की जड़ें जमी हुई हैं और आम जनता इससे दुखी हैं"

"हमें इस मानसिकता को बदलने की ज़रूरत है."

शराब ग़ुलाम कांड के पांच दिन पहले ब्राजील के श्रम निरीक्षण मंत्रालय ने देश के मध्य-पश्चिमी क्षेत्र गोइआस में एक गन्ने के खेत में 139 श्रमिकों को 'आधुनिक ग़ुलामी' की स्थिति में पाया.

ग़ुलामी से बचाए जाने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है. सिर्फ 2022 में 2500 से ज़्यादा लोगों को बचाया गया. इन आंकड़ों की संख्या 2013 के बाद से सबसे ज़्यादा थी.

अगर वित्तीय स्थिति में सुधार नहीं होता है तो बचाए गए श्रमिकों के लिए बेहतर विकल्प देपाना आसान नहीं है.

नीको स्वीकार करते हैं कि बेंटो गोंकाल्वेस में बुरे अनुभवों के बावजूद उन्हें काम की तलाश में फिर से बहुत दूर तक जाना पड़ सकता है.

वो कहते हैं, "कोविड -19 महामारी के बाद से मेरे पास नियमित काम नहीं है और मुझे अपने बच्चों को पालना है."

एडमर फोंट्स नीको और बाकी मज़दूरों से लगातार संपर्क में हैं.

उन्हें इस बात का डर है कि ऐसे काम देने वालों की कमी नहीं है जो इनकी मज़बूरी का फ़ायदा उठा लें.

वह कहते हैं, "दुखद वास्तविकता यह है कि ब्राजील ने 1888 में गुलामी को ख़त्म कर दिया था. लेकिन देश में इसका अस्तित्व अब भी है."

मज़दूरों के अनुरोध पर नाम बदले गए हैं.

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