आर्मी स्कूल हमला केस: पाकिस्तान की इमरान ख़ान सरकार पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

    • Author, शहज़ाद मलिक
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू डॉट कॉम, इस्लामाबाद
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 5 मिनट

पाकिस्तान में सुप्रीम कोर्ट ने इमरान ख़ान सरकार को आर्मी पब्लिक स्कूल पर हुए हमले के मामले में जांच आयोग की रिपोर्ट पर अमल के लिए चार हफ़्ते का वक़्त दिया है. कोर्ट ने सरकार से कहा है कि वो जवाबदेह लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई तय करे.

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सरकार को निर्देश किया कि वो चार हफ़्ते में रिपोर्ट पेश करे. कोर्ट ने कहा है कि इस रिपोर्ट पर प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के दस्तख़्त होने चाहिए. इस मामले में बुधवार को प्रधानमंत्री इमरान ख़ान कोर्ट के सामने पेश हुए.

पाकिस्तान में पेशावर के आर्मी स्कूल पर साल 2014 में हुए हमले के मामले की सुप्रीम कोर्ट स्वत: सज्ञान लेकर सुनवाई कर रहा है. इस मामले को सुन रही तीन सदस्यीय पीठ की अगुवाई चीफ़ जस्टिस गुलज़ार अहमद कर रहे हैं.

कोर्ट के आदेश पर पेश हुए प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने कहा, "उनके लिए कोई भी ऐसा ख़ास व्यक्ति नहीं है जिस पर कार्रवाई नहीं हो सके. कोर्ट के आदेश के मुताबिक कार्रवाई की जाएगी. "

आर्मी पब्लिक स्कूल पर हमला 16 दिसंबर 2014 को हुआ था. इसमें 150 से अधिक लोग मारे गए थे. इनमें 140 से ज़्यादा बच्चे थे. तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने इस हमले की ज़िम्मेदारी ली थी.

आर्मी पब्लिक स्कूल पर हुए आतंकवादी हमले की जांच के लिए गठित न्यायिक आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इस घटना को "सुरक्षा विफलता" करार दिया था और कहा था कि इस घटना ने देश की सुरक्षा व्यवस्था पर सवालिया निशान लगा दिया है.

प्रधानमंत्री को पेश होने का आदेश क्यों दिया गया?

बुधवार सुबह स्वत: संज्ञान मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस गुलज़ार अहमद ने प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को व्यक्तिगत रूप से तलब किया और टिप्पणी की कि ये मामले ऐसे नहीं चलेंगे और इसके लिए जिम्मेदारी तय करनी होगी.

जब मामले की सुनवाई शुरू हुई तो चीफ़ जस्टिस ने अटॉर्नी जनरल ख़ालिद जावेद से पूछा कि क्या उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की पिछली सुनवाई के दौरान दिए गए निर्देशों के बारे में प्रधानमंत्री को सूचित किया था. जिसका अटॉर्नी जनरल ने 'नहीं' में जवाब दिया और कहा कि वह इस संबंध में प्रधानमंत्री से निर्देश लेकर कोर्ट को सूचित करेंगे.

ग़ौरतलब है कि पिछली सुनवाई के दौरान, इस हमले में मारे गए बच्चों के माता-पिता ने साल 2014 में पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ़, डीजी आईएसआई लेफ़्टिनेंट जनरल ज़हीर-उल-इस्लाम, के अलावा तत्कालीन संघीय गृह मंत्री चौधरी निसार अली ख़ान, कोर कमांडर पेशावर हिदायत-उर-रहमान और ख़ैबर पख़्तूनख़्वा के मुख्यमंत्री परवेज़ खटक के ख़िलाफ़ केस दर्ज करने की याचिका दायर की थी.

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल से पूछा कि इन बच्चों के परिवार वालों की याचिका के बारे में प्रधानमंत्री को अवगत कराया गया है, जिस पर अटॉर्नी जनरल ने कहा कि इस संबंध में अभी उनसे (प्रधानमंत्री से) बात नहीं हुई है.

उन्होंने कहा कि इस घटना से संबंधित जो रिपोर्ट सामने आई है, उसमे इन लोगों की कोई भूमिका नहीं है और न ही उनके बारे में कुछ कहा गया.

अटॉर्नी जनरल ने कहा कि हम अपनी सभी गलतियों को स्वीकार करते हैं, लेकिन उच्च अधिकारियों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज नहीं की जा सकती.

चीफ़ जस्टिस ने टिप्पणी की कि इस हमले में चौकीदारों और सैनिकों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की गई है, जबकि वास्तव में कार्रवाई ऊपर से शुरू होनी चाहिए थी.

उन्होंने कहा कि उच्च पदों वाले वेतन और लाभ ले कर चलते बने, जबकि निचले पदों वाले मुक़दमों का सामना कर रहे हैं.

पीठ में मौजूद जस्टिस एजाज़-उल-अहसन ने टिप्पणी की कि यह संभव नहीं है कि चरमपंथियों को अंदर से समर्थन न मिला हो. उन्होंने कहा कि एपीएस की घटना सुरक्षा में चूक की वजह से हुई थी.

बेंच में मौजूद जस्टिस क़ाज़ी अमीन ने प्रतिबंधित तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) का नाम लिए बिना कहा कि ऐसी सूचना हैं कि राज्य किसी समूह के साथ बातचीत कर रहा है. उन्होंने सवाल किया कि क्या असली दोषियों तक पहुंचना और उन्हें पकड़ना राज्य का काम नहीं है.

चीफ़ जस्टिस ने टिप्पणी की कि जब अपने लोगों की सुरक्षा की बात आती है तो देश की ख़ुफ़िया एजेंसियां कहां चली जाती हैं.

इस स्वतः संज्ञान मामले की सुनवाई में अभी ब्रेक हुआ है. स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, अटॉर्नी जनरल कोर्ट का आदेश लेकर प्रधानमंत्री के घर गए हैं, जो सुप्रीम कोर्ट से थोड़ी ही दूरी पर है.

एपीएस आयोग की रिपोर्ट

ग़ौरतलब है कि कुछ समय पहले पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने पेशावर में आर्मी पब्लिक स्कूल पर हुए आतंकवादी हमले की जांच के लिए छह साल पहले गठित एक न्यायिक आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक करने का आदेश दिया था.

इस आयोग के अध्यक्ष पेशावर हाईकोर्ट के जस्टिस मोहम्मद इब्राहिम ख़ान थे. इस आयोग ने आर्मी पब्लिक स्कूल पर हुए हमले की 500 पेज से अधिक की रिपोर्ट जुलाई 2020 को पाकिस्तान के चीफ़ जस्टिस को भेजी थी.

आयोग ने इस घटना में ज़ख़्मी होने वाले और मरने वाले बच्चों के माता-पिता सहित 132 लोगों के बयान दर्ज किए थे, जिनमें 101 सिविलियन और 31 सुरक्षाकर्मी और अधिकारी शामिल थे.

पाकिस्तान सेना के जनसंपर्क विभाग के अनुसार, आर्मी पब्लिक स्कूल पर हमला करने वाले गिरोह में 27 लोग शामिल थे, जिनमें से नौ मारे गए थे और 12 को गिरफ़्तार कर लिया गया था.

पाकिस्तानी अधिकारियों ने इस घटना में शामिल कई लोगों को सैन्य अदालतों में मुक़दमा चला कर सज़ा दी है, लेकिन मारे गए बच्चों के माता-पिता का कहना है कि उनके बच्चे एक छावनी में सेना द्वारा संचालित स्कूल में पढ़ने गए थे, वो युद्ध के मैदान में नहीं थे. उनका यह भी कहना है कि वो अपने बच्चों की सुरक्षा की फ़ीस नियमित रूप से स्कूल प्रशासन को देते थे. इसके बावजूद ये हमला कैसे हुआ, किसकी लापरवाही से हुआ और इसका ज़िम्मेदार कौन है?

हमले में मारे गए बच्चों के माता-पिता की यही मांग है कि इस हमले की ज़िम्मेदारी तय की जाए और जिनकी लापरवाही के कारण यह हमला हुआ है, उन्हें सज़ा दी जाए.

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