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मोहनजोदड़ो की समरीन सोलंगी, जो मिट्टी को भी 'सोना' बना देती हैं
- Author, रियाज़ सुहैल
- पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता, मोहनजोदड़ो (पाकिस्तान) से
- प्रकाशित
जब समरीन सोलंगी का जन्म हुआ, तो उनकी दादी ने कहा था, "यह सोने की उंगलियों वाली लड़की है."
और जब समरीन ने मिट्टी में अपने हाथ डाले, तो उसने सचमुच उसे सोना बना दिया.
समरीन सोलंगी मोहनजोदड़ो के पास स्थित एक गाँव हाजी लाल बख़्श शेख़ में रहती हैं. वह चिकनी मिट्टी से मोहनजोदड़ो की खुदाई से मिली मूर्तियों और मुहरों की शैली में चीज़ें बनाती हैं.
20 वर्षीय समरीन सोलंगी के चाचा और पिता भी मोहनजोदड़ो में मिले पुजारियों, नर्तकियों, मुहरों और हाथियों की शैली में कलाकृति बनाते थे. उन्होंने यह काम अपने पिता से सीखा था जो पुरातत्व विभाग में काम करते थे.
समरीन का कहना है कि उन्हें बचपन से ही मिट्टी से चीज़ें बनाने का शौक़ था, इसलिए वह स्कूल नहीं गईं और यह काम शुरू कर दिया. अब वह सब कुछ बना लेती हैं.
नदी की मिट्टी
हाजी लाल बख़्श शेख़ गाँव सिंधु नदी के पास स्थित है, जहाँ से वे चिकनी मिट्टी लाती हैं. मिट्टी को पहले सुखाया जाता है, इसके बाद कूट कर बारीक किया जाता है. महीन मिट्टी को मैदा कहते हैं. समरीन के मुताबिक़, मैदे को निकालने के बाद बाक़ी मिट्टी में पानी डाल कर उसे गूंथ लिया जाता है.
उनके पास पुजारी या किंग प्रीस्ट का साँचा मौजूद है, लेकिन बाक़ीं चीज़ें हाथ से बनाई जाती हैं, जिन्हें बनाकर सुखाने के लिए रखा जाता है. ये गर्मियों में एक से डेढ़ दिन में और सर्दियों में दो से तीन दिन में सूख जाते हैं.
मिट्टी के गहने
मिट्टी से गहने बनाने और पहनने की परंपरा तो मोहनजोदड़ो से लेकर सदियों पुरानी थी, लेकिन हाल ही अब यह एक बार फिर फ़ैशन में आ गया है. इन्हें अब भारत और पाकिस्तान समेत कई देशों में बनाया जा रहा है.
समरीन सोलंगी बताती हैं कि सिंध रोल सपोर्ट ऑर्गेनाइज़ेशन, नाम के एक ग़ैर-सरकारी संगठन ने उन्हें ज्वेलरी बनाने का प्रशिक्षण दिया है. समरीन कहती हैं कि तीन दिवसीय प्रशिक्षण में उनके साथ लगभग 10 लड़कियाँ थीं और उन्होंने ट्रेनिंग के दौरान सिखाई गई चीज़ों को अपने दिमाग़ में वैसे ही पका लिया है जैसे मिट्टी पकाई जाती है.
अब वह मिट्टी से कान की बालियाँ, झुमके और अन्य गहने बना लेती हैं. इन्हें बनाने के लिए उनके पास कोई विशेष उपकरण नहीं हैं. उनके पास सिर्फ़ एक टूटी हुई छुरी, बॉलपॉइंट केस और एक बॉक्स है जिससे गोलाई वग़ैरह कर लेती हैं. और ये पूरा कमाल किसी स्टूडियो या कारख़ाने में नहीं बल्कि उनके कच्चे घर और आँगन में होता है.
वो कहती हैं, "पहले मैं झुमके के घूंघरू और ऊपर की चक्की बनाती हूँ. उसके बाद नीचे की कप्पी बनाकर पेन से उसका डिज़ाइन बनाती हूँ. इन दोनों भागों को जोड़कर सूखने के लिए छोड़ देती हूँ. इसके बाद गोबर के उपले डालकर इसको पकाती हूं और सुबह तक यह तैयार हो जाते हैं."
मिट्टी के इन गहनों पर हर तरह के रंगों का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन झुमकों पर ख़ास तौर से चांदी और सोने का रंग ज़्यादा पसंद किया जाता है. समरीन के अनुसार, इस पर सुनहरा रंग लगाने के बाद, लाल और हरे रंग भर दिए जाते हैं, जिससे यह आकर्षक दिखाई देने लगते हैं.
'कोरोना ने सोशल मीडिया की ओर आकर्षित किया'
समरीन के घर का रोज़गार मोहनजोदड़ो आने वाले पर्यटकों पर निर्भर था, जो कोरोना की वजह से प्रभावित हुआ है. उनका कहना है कि पर्यटक गर्मियों में कम और सर्दियों में ज़्यादा आते थे, लेकिन कोरोना के कारण यहाँ पर्यटकों का आना बंद हो गया है. इसकी वजह से उनकी बनाई हुई मूर्तियाँ और मुहरें वग़ैरह नहीं बिकती थीं.
सक्खर की एक छात्रा अक़्सा शोरो ने समरीन सोलंगी की मदद की और उन्हें सोशल मीडिया से परिचित कराया, जिससे उनका यह हुनर लोकप्रिय हो गया और अब, उन्हें मिट्टी के आभूषणों के ऑर्डर मिल रहे हैं.
'हम बाबा के बेटे हैं'
समरीन सोलंगी के पिता का हुनर उनके पूर्वजों की भी विरासत है. वह कहती हैं कि उसकी छह बहनें हैं लेकिन कोई भाई नहीं है. 'भाई की कमी तो होती ही है, भाई तो भाई होता है, हम सोचते हैं कि हम बाबा के लिए बेटे हैं और हम बेटों वाला ही काम करते हैं. बाबा को कभी बेटे की कमी नहीं होने दी, बेटा तो बेटा होता है. अगर बेटियों को भी इसी नज़र से देखा जाए तो बेटियाँ भी बेटे ही होती हैं."
समरीन के पिता का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है. वह काम नहीं करते हैं, लेकिन इस काम में अपनी बेटियों का हाथ बँटाते हैं. समरीन और उनकी बहनें उनकी देखभाल करती हैं.
वह सुबह जल्दी उठ जाती हैं और मिट्टी से कभी मूर्तियाँ, मुहरें और कभी आभूषण बनाने लगती हैं. एक झुमका बनाने में एक घंटा लगता है. रंग वग़ैरह करने के बाद एक झूमके की क़ीमत तीन सौ रूपये हैं.
समरीन कहती हैं, "जो आमदनी होती है उससे सिर्फ़ गुज़ारा होता है, क्योंकि राशन के अलावा, रंग और अन्य सामान के साथ-साथ पैकिंग का भी ख़र्च होता है."
जब मैंने समरीन से पूछा कि उनका सपना क्या है? तो उन्होंने अपनी आदत के मुताबिक़ मुस्कुराते हुए कहा, "मेरी तो कोई इच्छा नहीं है."
मैंने उनसे पूछा कि कुछ तो होगा. इस पर वह एक बार मुस्कुराईं और कहा कि वे अपने परिवार और बहनों को ख़ुश देखना चाहती हैं.
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