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टेरर फ़ंडिंग से जुड़ी अमरीकी रिपोर्ट से बढ़ सकती है पाकिस्तान की मुश्किलः नज़रिया
अमरीकी विदेश विभाग की ओर से जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे चरमपंथी संगठनों की फ़ंडिंग रोकने में विफल रहा है.
अमरीकी विदेश विभाग ने संसद के प्रस्ताव पर 2018 के लिए तैयार की गई चरमपंथ पर आधारित वार्षिक रिपोर्ट में यह बात कही है.
इससे पहले चरमपंथ को मिलने वाली वित्तीय मदद की निगरानी करने वाली एजेंसी फ़ाइनेंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स (एफ़एटीएफ़) ने भी ठोस कार्रवाई करने के लिए पाकिस्तान को चार महीने का वक़्त दिया.
अमरीकी विदेश विभाग की इस रिपोर्ट में क्या प्रमुख बातें हैं और यह पाकिस्तान के लिए कितनी मुश्किलें खड़ी सकती है, यही जानने के लिए बीबीसी संवाददाता नवीन नेगी ने संपर्क किया अमरीका में मौजूद डेलावेयर यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर मुक्तदर ख़ान से. पढ़िए उनका नज़रिया.
अमरीका का विदेश मंत्रालय हर साल वैश्विक आतंकवाद पर अपनी रिपोर्ट पेश करता है. इसमें दुनियाभर में घट रही चरमपंथी घटनाओं का ज़िक्र होता है, साथ ही कौन देश इसे लेकर क्या कर रहा है, इसकी बात भी होती है.
इस रिपोर्ट के आधार पर अमरीका की संसद इन देशों को दी जाने वाली आर्थिक मदद पर फैसला लेती है.
ताज़ार रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान ने दो चीज़ें नहीं की. एक तो पाकिस्तान ने अपनी ज़मीन पर चल रहे चरमपंथी गुटों के खिलाफ कार्रवाई करने में कोताही की है. दूसरा, पाकिस्तान में चरमपंथी संगठनों के लिए खुले आम धन जुटाने का काम होता है, उसे रोकने के लिए पाकिस्तान सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया है.
वहां लश्कर-ए-तैयबा जैसे संगठनों के लिए धन जुटाने के लिए सड़कों पर डब्बे लगे होते हैं और लोग आम तौर पर उनमें पैसे डाल देते हैं.
पाकिस्तान के लिए ये काफी गंभीर खबर है, क्योंकि इसके दो हफ्ते पहले ही पेरिस स्थित एफ़एटीएफ़ ने कहा था कि उन्होंने पिछले साल पाकिस्तान को 27 एक्शन प्वाइंट्स दिए थे, उनमें से 22 पर पाकिस्तान ने कोई कदम नहीं उठाया और अगर फरवरी 2020 तक उसने कुछ नहीं किया तो उसे ब्लैकलिस्ट कर दिया जाएगा.
इसकी वजह से पाकिस्तान के लिए विदेशी आर्थिक सहायता, विदेशी निवेश वगैहरा मुश्किल हो जाएगा.
एफ़एटीएफ़ एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है, जो टेरर फंडिग को कम करने की कोशिश करती है.
दो हफ्तों के बीच आई इन दोनों रिपोर्टों से साफ ज़ाहिर होता है कि इमरान खान ने नए पाकिस्तान में चरमपंथ के खिलाफ लड़ाई की जो बड़ी-बड़ी बातें की थी, उसके लिए वो कोई कदम नहीं उठा रहे हैं.
पाकिस्तान पर कितना दबाव?
अमरीका के सांसद इस मुद्दे को लेकर पाकिस्तान पर दबाव डालेंगे. हालांकि अभी ये नहीं कहा जा सकता कि व्हाइट हाउस क्या करेगा.
मीडिया में इस मुद्दे की काफी चर्चा हो रही है. हालांकि अमरीकी मीडिया में अभी इसका इतना कवरेज देखने को नहीं मिला है.
हालांकि ये रिपोर्ट हर साल आती है और रिपोर्ट में कहा जाता है कि पाकिस्तान अभी भी कोई कार्रवाई नहीं कर रहा है.
इसलिए अब लोग और नेता इसपर इतनी कड़ी प्रतिक्रिया नहीं देते हैं, जितना इस मुद्दे पर करना चाहिए.
अमरीका का रुख
खबरों के मुताबिक रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि पाकिस्तान ने अफगानिस्तान- तालिबान के साथ अमरीका की बातचीत में मदद करने का वादा किया था, लेकिन उसपर ज़्यादा कुछ किया नहीं.
साथ ही हक्कानी समूह की फंड रेज़िंग और पाकिस्तान के कुछ प्रांतों में खुले तौर पर चल रहे इस समूह को रोकने के लिए भी कोई कदम नहीं उठाया गया.
पाकिस्तान के प्रति अमरीका का सैन्य, सांस्कृति और राजनीतिक रुख ज़रूर बदला है.
15-20 साल पहले भारत को वो अपना सहयोगी नहीं मानता था, जबकि पाकिस्तान को एक करीबी सहयोगी और दोस्त के रूप में देखता था. लेकिन अब ये रुख एकदम बदल गया है.
व्यापारिक और अब कश्मीर से जुड़ी मुश्किलों के बावजूद भारत को अमरीका एक बड़े सहयोगी, आर्थिक सहयोगी और करीबी के रूप में देखता है. लेकिन पाकिस्तान के साथ ऐसा नहीं है.
वो कहता है कि वो पाकिस्तान के साथ ताल्लुकात बेहतर नहीं करना चाहते, लेकिन मजबूरी है क्योंकि अफगानिस्तान में वो फंसे हुए हैं. और पाकिस्तान के पास मौजूद परमाणु हथियारों से भी अमरीका का एक तबका परेशान है.
वो डरते हैं कि अगर वो हथियार लश्कर-ए-तैयबा, तालिबान या अलकायदा के हाथ लग जाएं तो ये अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए बड़ा खतरा होगा.
इसलिए पाकिस्तान के साथ रिश्ता बनाए रखना अमरीका की कहीं ना कहीं मजबूरी है.
इमरान खान पर कितना दबाव?
संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर को लेकर इमरान खान के भाषण को मुस्लिम मुल्कों में काफी कवरेज मिला. इंग्लैंड में भी मीडिया में काफी कवरेज हुआ. लेकिन अमरीका के प्रमुख मीडिया में उतना अटेंशन नहीं मिला.
पाकिस्तानी-अमरीकियों और कुछ दूसरे मुस्लिम-अमरीकियों ने इमरान खान के भाषण की तारीफ की.
लेकिन इससे पाकिस्तान या इमरान खान की छवि नहीं बदली.
दूसरी बात, इमरान खान ने चुनाव से पहले और पिछले 10-15 साल की अपनी राजनीति में उन्होंने काफी अमरीका विरोधी बाते की हैं. जैसे 9/11 जैसे मसलों के पीछे अमरीका का ही हाथ बताया है.
तो अमरीका की विदेश नीति के अधिकारी ये इतना जल्दी भूलने को तैयार नहीं हैं.
दक्षिण एशिया के सभी विश्लेषक जानते हैं कि इमरान खान पश्चिम विरोधी और अमरीका विरोधी ज़रूर हैं. हालांकि अब वो मजबूरन पश्चिमी राय से इत्तेफाक रखने की कोशिश कर रहे हैं.
लेकिन उससे हटकर पाकिस्तान की सुरक्षा के अलावा, आर्थिक मसले भी हैं. पाकिस्तान ने चीन से रिश्ते गहरे किए हैं. चीन से उसने कई अरबों का कर्ज़ ले लिया है.
हालांकि चीन उन्हें उतनी आर्थिक मदद नहीं दे पा रहा. मजबूरन पाकिस्तान को फिर आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक की तरफ रुख करना पड़ रहा है.
वहां फिर अमरीका की मदद चाहिए होगी. अमरीका की लोन गारंटी के बगैर उन्हें आईएमएफ का लोन मिल नहीं सकता.
वॉशिंगटन की रिपोर्ट से ज़्यादा एफ़एटीएफ़ की रिपोर्ट अहम है. अगर फरवरी में दबाव डाला जाता है और वो अस्थाई रूप से ब्लैक लिस्ट हो जाता है तो पाकिस्तान सरकार कुछ ना कुछ कदम ज़रूर उठाएगी.
पाकिस्तान के कट्टरपंथी तबके के साथ इमरान खान के काफी करीबी रिश्ते हैं. जो बाते वो कहते हैं, इमरान खान उन्हीं बातों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर कूटनीतिक तरीके से कह देते हैं.
उनके प्रति इमरान खान का रवैया बहुत ही सहानुभूति भरा है. इसलिए इमरान खान के लिए ये मुश्किल होगा कि वो इन चरमपंथी समूहों के खिलाफ कड़े कदम उठाएं.
भारत को कितना समर्थन मिलेगा?
फिलहाल भारत की जो कूटनीतिक स्थिति है, वो कश्मीर की वजह से थोड़ी कमज़ोर हो गई है.
और जिस तरह से हाल में भारत सरकार, यूरोपीय सांसदों को कश्मीर लेकर गई, उससे पिछले कुछ हफ्तों से भारत कूटनीतिक स्तर पर कमज़ोर पड़ा है.
कहा जा रहा है कि कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद वहां चरमपंथ बढ़ सकता है.
अगर ये बढ़ता है और कश्मीर में सेना की ओर से हो रहा कथित मानवाधिकार उल्लंघन बढ़ता है तो भारत के लिए ये मुश्किल होगा कि वो चरमपंथ के मुद्दे पर पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग-थलग कर सके.
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