डॉक्टर सैय्यदना मुफ़द्दल सैफ़ुद्दीन: बोहरा समुदाय के धर्मगुरु जो बने जामिया मिल्लिया इस्लामिया के चांसलर

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जामिया मिल्लिया इस्लामिया (जेएमआई) कोर्ट (अंजुमन) के सदस्यों ने सर्वसम्मति से डॉक्टर सैय्यदना मुफ़द्दल सैफ़ुद्दीन को यूनिवर्सिटी का नया चांसलर चुना है.

जामिया अंजुमन में 45 सदस्य होते हैं जिनमें से तीन सांसद भी हैं.

डॉक्टर सैफ़ुद्दीन मंगलवार को अपना कार्यभार संभालेंगे और अगले पाँच सालों तक इस पद पर रहेंगे. वो डॉक्टर नजमा हेपतुल्ला की जगह लेंगे.

डॉक्टर सैय्यदना सैफ़ुद्दीन बोहरा समुदाय के 53वें धर्मगुरु हैं. वो साल 2014 से ये पद संभाल रहे हैं.

यूनिवर्सिटी की ओर से जारी प्रेस रिलीज़ के अनुसार, डॉक्टर सैय्यदना मुफ़द्दल बोहरा के बारे में बताया गया है कि उन्होंने अपना जीवन समाज की बेहतरी के लिए समर्पित कर दिया. इस दौरान उन्होंने शिक्षा, पर्यावरण, समाजिक-आर्थिक पहलुओं पर ख़ास काम किया.

सैय्यदना सैफ़ुद्दीन ने गुजरात में सूरत के अल-जामिया-तुल सैफ़ियां से तालीम हासिल की है. उन्होंने मिस्र की अल-अज़हर यूनिवर्सिटी से भी पढ़ाई की है.

उन्होंने मुंबई में अल-जामिया तुस सैफ़ियां के नए कैंपस का 10 फ़रवरी 2023 को उद्घाटन किया था जहाँ उनकी मुलाक़ात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी हुई थी.

कौन हैं डॉ सैय्यदना मुफ़द्दल सैफ़ुद्दीन?

डॉक्टर सैय्यदना मुफ़द्दल सैफ़ुद्दीन दाऊदी बोहरा समुदाय के सर्वोच्च धर्मगुरु हैं. इस समुदाय की विरासत फ़ातिमी इमामों से जुड़ी है जिन्हें पैग़ंबर हज़रत मोहम्मद (570-632) का वंशज माना जाता है.

यह समुदाय मुख्य रूप से इमामों के प्रति ही अपना अक़ीदा (श्रद्धा) रखता है. दाऊदी बोहराओं के 21वें और अंतिम इमाम तैय्यब अबुल क़ासिम थे.

उनके बाद 1132 से आध्यात्मिक गुरुओं की परंपरा शुरू हो गई जो दाई-अल-मुतलक़ सैयदना कहलाते हैं.

दाई-अल-मुतलक़ का मतलब होता है - समुदाय का सर्वोच्च नेता. उनको अपना अध्यात्मिक गुरु मानने वाले लोग भारत के अलावा दुनिया के कई देशों में हैं, बोहरा समुदाय के एक प्रवक्ता का कहना है कि "वे अपने मानने वालों को शांति, सदभाव और देशभक्ति का संदेश देते हैं."

सैय्यदना मुंबई में विशाल 'सैफ़ी महल' में रहते हैं, बताया जाता है कि दाई अल मुतलक की नियुक्ति मौजूदा सर्वोच्च नेता 'ईश्वरीय परामर्श' से करता है. मौजूदा शीर्ष नेता के पिता भी बोहरा समुदाय के सर्वोच्च नेता थे.

डॉक्टर सैफ़ुद्दीन जिस समुदाय के धार्मिक नेता हैं, उसे आम तौर पर पढ़ा-लिखा, मेहनती, कारोबारी और समृद्ध माना जाता है.

अदालतों में जारी विवाद

ये मामला 52वें धर्मगुरू के सौतेले भाई खुजैमा कुतुबउद्दीन 2014 में मुंबई हाईकोर्ट में ले गए थे, उन्होंने ख़ुद को 53वां सैय्यदना घोषित कर दिया था.

खुजैमा कुतुबउद्दीन की मृत्यु 2016 में हो गई जबकि मुकदमे का फ़ैसला नहीं आया था, मौत से पहले खुजैमा अपने बेटे ताहिर फ़ख़्रउद्दीन को अगला सैय्यदना मनोनीत कर चुके थे, ताहिर ने अपने पिता की जगह लेते हुए ख़ुद को 54वां सैय्यदना घोषित कर दिया.

ताहिर फ़ख़्रउद्दीन ने अदालत से गुज़ारिश की कि उन्हें उनके पिता की जगह स्वीकार किया जाए और उनके पिता खुजैमा कुतुबउद्दीन की ओर से दायर किया गया मुकदमा चलता रहे. अदालत ने उनकी यह अर्ज़ी मंज़ूर कर ली.

इस मामले की मुंबई हाईकोर्ट में चल रही है.

खुजेमा कुतुबउद्दीन के करीबी लोगों का दावा है कि 52वें सैय्यदना ने अपने छोटे भाई खुजेमा क़ुतुबुद्दीन को माजूम यानी अपना नायब पहले ही नियुक्त कर दिया था.

खुजैमा कुतुबउदीन के परिवार से जुड़े लोगों का मानना है कि अगर सैय्यदना का औपचारिक तौर पर अपने उत्तराधिकारी के नाम का एलान किए बग़ैर ही इंतक़ाल हो जाता है तो ऐसी स्थिति में उनके माजूम को ही अगला सैय्यदना मान लिया जाता है.

फ़रवरी 2014 में 52वें सैय्यदना डॉक्टर बुरहानुद्दीन की मौत के बाद उनके बेटे मुफ़द्दल सैफ़ुद्दीन 53वें सैय्यदना बने.

बोहरा समुदाय से जुड़े एक वरिष्ठ व्यक्ति का कहना है, "52वें दाई-अल-मुतलक ने 2011 में ही, यानी अपनी मृत्यु से काफ़ी पहले सैयदना मुफ़द्दल सैफ़ुद्दीन को सार्वजनिक तौर पर अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था."

सुप्रीम कोर्ट में बोहरा समुदाय से जुड़ा एक और मुकदमा चल रहा है.

महिलाओं में ख़तने की प्रथा को लेकर कुछ महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है लेकिन इस मामले सैय्यदना किसी भी रूप में जुड़े नहीं हैं.

देश विदेश में अनुयायी

देश-विदेश में जहां-जहां भी बोहरा धर्मावलंबी बसे हैं, वहां सैय्यदना की ओर से अपने दूत नियुक्त किए जाते हैं, जिन्हें आमिल कहा जाता है. ये आमिल ही सैय्यदना के फ़रमान को अपने समुदाय के लोगों तक पहुंचाते हैं और उस पर अमल भी कराते हैं.

स्थानीय स्तर पर सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों में भी इन आमिल मौजूद होते हैं. एक निश्चित अवधि के बाद इन आमिलों का एक स्थान से दूसरे स्थान पर तबादला भी होता रहता है.

शादी-ब्याह, बच्चे का नामकरण, विदेश यात्रा, हज, नए कारोबार की शुरुआत, मृतक परिजन का अंतिम संस्कार आदि सभी कुछ सैय्यदना के आशीर्वाद से होते हैं. ऐसे मौकों पर लोग आर्थिक भेंट भी देते हैं.

इसके अलावा समाज का प्रत्येक व्यक्ति को अपनी वार्षिक आय का एक हिस्सा दान में देता है.

आमिलों के माध्यम से इकट्ठा किए गए धन का उपयोग सामुदायिक कल्याण के कार्यों में किया जाता है.

दाई-अल-मुतलक़ यानी सैय्यदना दाऊदी बोहरों के सर्वोच्च आध्यात्मिक धर्मगुरु ही नहीं बल्कि समुदाय के कई सामाजिक, धार्मिक, शैक्षणिक और पारमार्थिक ट्रस्टों के मुख्य ट्रस्टी भी होते हैं. इन्हीं ट्रस्टों के ज़रिए समुदाय की तमाम मस्जिदों, मुसाफ़िरख़ानों, शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों, दरगाहों और क़ब्रिस्तानों का प्रबंधन होता है.

(इस लेख को पहली बार 2018 में प्रकाशित किया गया था जिसे स्वतंत्र पत्रकार अनिल जैन ने लिखा था, उसी लेख के संपादित अंश)

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