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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव: इलाहाबाद की इस सीट पर योगी के मंत्री और सपा के बीच फिर है मुक़ाबला - ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, प्रयागराज से
- प्रकाशित
जिस सीट पर उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य हारते रहे थे उस सीट पर भारतीय जनता पार्टी के मौजूदा मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है. सिद्धार्थ नाथ सिंह वर्ष 2017 में भारतीय जनता पार्टी की या फिर यूं कहा जाए, नरेंद्र मोदी की लहर में जीते थे.
इलाहाबाद (पश्चिमी) की ये सीट पारंपरिक रूप से बाहुबली अतीक़ अहमद की रही है जो समाजवादी पार्टी या फिर निर्दलीय उम्मीदवार होकर यहां से जीतते रहे थे.
उन्होंने वर्ष 1989 से लेकर वर्ष 2004 तक इस सीट का प्रतिनिधित्व किया. फिर वो लोकसभा की फूलपुर सीट से जीत गए थे.
मगर पिछले चुनाव, यानी वर्ष 2017 में हुए विधानसभा के चुनाव में केशव प्रसाद मौर्य ने इस सीट पर चुनाव नहीं लड़ा था और टिकट सिद्धार्थ नाथ सिंह को मिल गया था. केशव प्रसाद मौर्य तब विधान परिषद के सदस्य बन गए थे.
हालांकि लहर के बावजूद इस सीट पर समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार और इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ की पहली महिला अध्यक्ष ऋचा सिंह को भी 60 हज़ार से ज़्यादा मत मिले थे जबकि सिद्धार्थ नाथ सिंह को 85,518 वोट मिले थे.
वहीं बहुजन समाज पार्टी की उम्मीदवार पूजा पाल को भी इस सीट पर 40 हज़ार से ज़्यादा वोट मिले थे. अतीक़ अहमद फ़िलहाल जेल में हैं मगर उनके परिवार का कोई भी सदस्य इस बार चुनाव नहीं लड़ रहा है.
अलबत्ता उनकी पत्नी असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल मुस्लिमीन यानी एआईएमआईएम में ज़रूर शामिल हुई हैं.
जानकार मानते हैं कि इस बार सिद्धार्थ नाथ सिंह के लिए मुश्किल भी हो सकती है क्योंकि इस बार मैदान में समाजवादी पार्टी ने एक बार फिर ऋचा सिंह को उतारा है.
बीजेपी और सपा उम्मीदवारों के दावे
राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार रतिभान त्रिपाठी ये मानते हैं कि इस बार इलाहाबाद (पश्चिमी) सीट पर मुक़ाबला कड़ा ज़रूर है मगर ऋचा सिंह के लिए मुश्किल इस मायने में भी सामने आ गई है कि समाजवादी पार्टी ने स्वामी प्रसाद मौर्य के दबाव में पहले टिकट अमरनाथ मौर्य को दिया था. लेकिन ऐन वक़्त में टिकट ऋचा सिंह को दिया गया.
बीबीसी से बात करते हुए वो कहते हैं, "चुनौती हो सकती थी सिद्धार्थ नाथ सिंह के लिए. मगर देखना होगा कि जिस टिकट को पहले अमरनाथ मौर्य को दिया गया और बाद में फिर उनसे लेकर इसे दोबारा ऋचा सिंह को दिया गया इसका असर अन्य पिछड़े वर्ग यानी ओबीसी के मतदाओं पर किस तरह पड़ता है."
हालांकि ऋचा सिंह अपनी जीत को लेकर बहुत आश्वस्त हैं. उनका दावा है कि पूरे प्रदेश में सत्ता विरोधी लहर यानी 'एंटी-इनकम्बेंसी' चल रही है.
वो कहती हैं, "एंटी-इनकम्बेंसी' का प्रभाव इलाहाबाद पश्चिमी सीट पर और भी ज़्यादा है क्योंकि पांच सालों में न तो विधायक उम्मीदों पर खरे उतरे ना सरकार. इस सीट से विधायक यानी सिद्धार्थ नाथ सिंह मंत्री भी हैं जिन्होंने अपने कार्यकाल में कुछ नहीं किया."
लेकिन सिद्धार्थ नाथ सिंह ने बीबीसी से बात करते हुए दावा किया कि पिछले पांच सालों में उनकी सरकार ने प्रदेश में जो किया है वो सब के सामने ही है, अपने विधानसभा क्षेत्र की चर्चा करते हुए वो कहते हैं कि सड़कों के चौड़ीकरण से लेकर रेलवे स्टेशन और हवाई अड्डे का सुंदरीकरण तक किया गया है.
सिद्धार्थ नाथ सिंह पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के नाती हैं और इलाहाबाद की राजनीति में 2017 से पहले तक उन्हें 'न्यू कमर' (नए खिलाड़ी) के तौर पर ही देखा जाता रहा था.
पिछली बार जब उन्हें टिकट मिला था तो भारतीय जनता पार्टी के पुराने कार्यकर्ता भी हैरान हो गए थे. राजनीतिक हलकों में कहा जाने लगा कि वो इलाहाबाद की राजनीति में 'पैराशूट' से उतारे गए हैं.
बावजूद इसके, उन्होंने जीत दर्ज की. हालांकि राजनीतिक हलकों में इसका श्रेय भी उन्हें देने की बजाय 'नरेंद्र मोदी की लहर' को ही दिया गया.
उत्तर प्रदेश की सरकार में कैबिनेट मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह कहते हैं, "सबसे बड़ी राहत लोगों को जो मिली है वो माफ़िया राज ख़त्म होने से मिली है. इसके अलावा लघु और मध्यम उद्योग लगाने के लिए युवाओं को प्रोत्साहित किया गया है जिसका असर भी देखने को मिल रहा है. राज्य सरकार और मेरे विभाग ने युवकों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई योजनाएं भी शुरू की हैं. इसलिए कोई सत्ता विरोधी लहर नहीं है."
कांग्रेस और बसपा
इस बार इस सीट पर दो मुसलमान उम्मीदवार भी हैं. एक बहुजन समाज पार्टी से खड़े हैं तो कांग्रेस ने भी इस सीट पर एक मुसलमान को टिकट दिया है. जानकार मानते हैं कि इस वजह से ऋचा सिंह को भी काफ़ी संघर्ष करना पड़ेगा.
दया राम सागर इसी विधानसभा क्षेत्र के प्रीतम नगर में रहते हैं जहां दलितों की भी ख़ासी आबादी है. वो कहते हैं कि पिछली बार भाजपा के पक्ष में लहर के बावजूद बहुजन समाज पार्टी की उम्मीदवार को 40 हज़ार से ज़्यादा वोट मिले थे जो इस बात का संकेत है कि संगठन के समर्पित मतदाता किसी भी परिस्थिति में पार्टी का साथ नहीं छोड़ सकते हैं.
इस बार भी बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की केपी कॉलेज में हुई जनसभा में उमड़ी भीड़ से साफ़ होता है कि संगठन का कितना बड़ा जनाधार है.
पार्टी के उम्मीदवार गुलाम क़ादिर कहते हैं कि इस सीट पर हो रहे संघर्ष में वो एकमात्र प्रत्याशी हैं जो विकास के मुद्दों को लेकर जनता के बीच जा रहे हैं.
राम लगन शर्मा की उम्र 70 साल है. धूमनगंज के रहने वाले शर्मा को लगता है कि इस बार चुनाव में उन्हें एक चीज़ तो स्पष्ट नज़र आ रही है और वो है - 'किसी भी दल की कोई लहर नहीं है.'
वो मानते हैं कि इस बार मुक़ाबले में समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार नज़र तो ज़रूर आते हैं, मगर इस बात को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि इस सीट पर दो मुसलमान उम्मीदवार भी हैं जिनमें से एक बहुजन समाज पार्टी के हैं.
इलाहाबाद पश्चिमी सीट में मुसलमानों की आबादी 85 हज़ार के आसपास है जबकि दलितों की आबादी 58 हज़ार है. वहीं 40 हज़ार अन्य जातियों के मतदाता हैं और 65 हज़ार पिछड़ी जाति के हैं.
प्रीतम नगर के अनीस राजनीति में उतनी ही दिलचस्पी रखते हैं जितना हर उत्तर प्रदेश वासी रखता है. वो दावा करते हैं कि वो किसी राजनीतिक दल के समर्थक नहीं हैं. उनको लगता है कि बहुजन समाज पार्टी ने ग़ुलाम कादिर को टिकट देकर भाजपा और समाजवादी पार्टी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं.
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