रिश्तों में तनाव के बीच पाकिस्तानी अधिकारियों की मेज़बानी क्यों कर रहा भारत? - प्रेस रिव्यू

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पाकिस्तान से रिश्तों में तनाव के बीच शंघाई सहयोग संगठन के तहत भारत और पाकिस्तान बातचीत जारी रखेंगे. इसके तहत पाकिस्तान का एक प्रतिनिधिमंडल भारत भी पहुंचा है.

अंग्रेज़ी अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया की ख़बर के मुताबिक शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) देशों के साइबर सुरक्षा सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए पाकिस्तान के अधिकारियों का एक प्रतिनिधिमंडल रविवार को भारत पहुंचा है.

भारत सात दिसंबर को एससीओ की बैठक की मेज़बानी कर रहा है. इससे पहले अक्टूबर में आतंकवाद-रोधी एससीओ की बैठक में हिस्सा लेने एक भारतीय प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान गया था. इस बैठक का उद्देश्य सदस्य देशों के बीच सहयोग को बढ़ावा देना था.

इस बीच भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की अध्यक्षता में अफ़ग़ानिस्तान की स्थिति को लेकर सदस्य देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की एससीओ की बैठक हुई थी. इस बैठक में पाकिस्तान और चीन के अलावा सभी सदस्य देशों ने हिस्सा लिया था.

सरकार का कहना था कि अफ़ग़ानिस्तान को लेकर हुई बैठक क्षेत्रीय स्थिरता और सुरक्षा के बढ़े मसलों पर क्षेत्रीय सहमति को दर्शाती है.

अख़बार ने आधिकारिक सूत्रों के हवाले से लिखा है कि एससीओ चार्टर को ध्यान में रखते हुए पाकिस्तान को न्योता दिया गया है. सुरक्षा ख़तरों और चुनौतियों से निपटने के लिए एससीओ देश कज़ाकिस्तान में एक एससीओ सूचना सुरक्षा केंद्र बनाने पर विचार कर रहे हैं.

नगालैंड की घटना से शांति वार्ता पर असर

नगालैंड के मोन ज़िले के तिरु इलाक़े में शनिवार रात सुरक्षाबलों की कार्रवाई में आम लोगों की मौत होने से नगा शांति वार्ता को झटका लग सकता है.

अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि सरकार से बात कर रहे समूह को लोगों के गुस्से के दबाव में बातचीत रोकनी पड़ सकती है.

एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी ने अख़बार को बताया, "ये नागालैंड पुलिस का अभियान नहीं था जिसमें लोगों द्वारा चुनी गई सरकार को ज़िम्मेदार ठहराया जा सके और जिसमें स्थानीय पुलिसकर्मी शामिल होते हैं. ये भारतीय सेना का अभियान था जो बुरी तरह ग़लत हो गया.''

"ये भारत बनाम नगा की लंबे समय से चली आ रही धारणा को बदल देगा. इससे अस्थायी तौर पर ही सही लेकिन विद्रोही समूहों को मज़बूती मिलेगी. इस मामले में केंद्र सरकार को कुशलता के साथ ज़िम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ तुरंत और प्रकट तौर पर कार्रवाई करनी होगी."

केंद्र सरकार लंबे समय से नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ़ नगालैंड (एनएससीएन) के अलग-अलग धड़ों को राज़ी करने में जुटी हुई थी. पिछले कुछ वर्षों में सरकार वार्ता का विरोध करने वाले कुछ समूहों को बातचीत की मेज़ पर लाने में कामयाब रही है.

इसमें कांगो कॉन्याक और निकी सुमी के समूह शामिल हैं जो पहले एनएससीएन के वार्ता विरोधी धड़े एनएससीएन-के का हिस्सा था.

निकी सुमी एनएससीएन-के के सैन्य कमांडर थे जिसका नगालैंड-म्यांमार सीमा से लगे ज़िलों में खासा प्रभाव है.

सूत्रों के मुताबिक इस घटना से भारत समर्थक समूहों पर भी लोगों की भावनाओं के अनुरूप चलने का दबाव होगा. अब तक केवल एनएससीएन-आईएम ही नगा शांति वार्ता में बाधा बनती आई है. दूसरे नगा समूह चाहते हैं कि वार्ता को जल्द से जल्द अंतिम रूप दिया जाए. लेकिन, अब ये घटना एनएससीएन-आईएम को वार्ता में भारत पर दबाव बनाने और अन्य समर्थक समूहों को अपनी आवाज़ उठाने के लिए दबाव बनाने में मदद करेगी.

हालांकि, केंद्र सरकार में एक सूत्र ने कहा, "अगर सरकार कुशलता के साथ इस मामले को संभालती है तो इसका बहुत अधिक प्रभाव नहीं होगा. तनाव वाले इलाक़ों में ऐसी हिंसा बहुत बड़ा झटका नहीं है भले ही वो कई सालों से ना हुई हो. कुछ आवाज़ें उठाई जाएंगी लेकिन अधिकतर समूह जानते हैं कि वो क्या चाहते हैं और बातचीत उसी पर होगी."

टीएमसी का प्रतिनिधिमंडल करेगा नगालैंड का दौरा

अंग्रेज़ी अख़बार हिंदुस्तान टाइम्स की ख़बर के अनुसार तृणमूल कांग्रेस का एक पांच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल आज नगालैंड में सेना के अभियान में मारे गए लोगों के परिवार से मुलाक़ात करेगा.

इस प्रतिनिधिमंडल में सांसद प्रसून बनर्जी, सुष्मिता देव, अपारूपा पोड्डार, सांतनु सेन और पार्टी प्रवक्ता बिस्वजीत देब शामिल होंगे.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने रविवार को पीड़ित परिवारों के साथ अपने संवेदनाएं ज़ाहिर की थीं और मामले में तुरंत जांच की मांग की थी.

'प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष शब्द जोड़ने से सीमित हुई भारत की आध्यात्मिक छवि'

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट के प्रमुख न्यायाधीश पंकज मित्तल ने भारत को प्राचीन काल से एक आध्यात्मिक देश बताते हुए कहा कि संविधान की प्रस्तावना में पहले से ही मौजूद 'संप्रभु, लोकतांत्रिक, गणतंत्र' जैसे शब्दों के बावजूद 1976 में 'समाजवादी' और 'धर्मनिरपेक्ष' शब्दों को जोड़े जाने से भारत की आध्यात्मिक छवि की विशालता सीमित हुई है.

इंडियन एक्सप्रेस में ख़बर है कि न्यायाधीश पंकज मित्तल ने रविवार को ये बातें एक कार्यक्रम में 'धर्म और भारतीय संविधान: पारस्परिक प्रभाव' पर लेक्चर के दौरान कहीं. ये कार्यक्रम जम्मू-कश्मीर और लद्दाख की अधिवक्ता परिषद ने आयोजित किया था.

उन्होंने कहा कि भारत अपने नागरिकों का ख़याल रखने में सक्षम है और उसमें समाजवादी प्रवृति पहले से ही निहित है. पांडवों से लेकर मौर्य, गुप्त, मुगलों और अंग्रेज़ों ने भारत पर शासन किया लेकिन भारत को कभी भी मुस्लिम, ईसाई या हिंदू राष्ट्र के रूप में धर्म के आधार पर परिभाषित नहीं किया गया क्योंकि इसे एक आध्यात्मिक देश के तौर पर स्वीकार किया गया था.

उन्होंने कहा कि 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द जोड़कर, हमने आध्यात्मिक उपस्थिति की अपनी विशालता को संकुचित कर दिया है..., "उन्होंने कहा कि "इसे एक संकीर्ण सोच कहा जा सकता है". वरना, भारत अनादि काल से एक आध्यात्मिक देश रहा है और इसका नाम "भारतीय आध्यात्मिक गणराज्य" होना चाहिए था.

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