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पीएम मोदी के प्रयासों से मिली कोवैक्सीन को 'मंज़ूरी', इस दावे पर WHO ने क्या कहा
भारत में बने कोरोना वायरस से लड़ने वाली वैक्सीन कोवैक्सीन को विश्व स्वास्थ्य संगठन के मान्यता देने की ख़बर के साथ-साथ मीडिया में ये भी ख़बर चल रही है कि ये प्रधानमंत्री मोदी की कोशिशों से संभव हुआ.
अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने अपनी एक रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से लिखा है कि पीएम मोदी ने कोवैक्सीन के आपात इस्तेमाल की मंज़ूरी दिलवाने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक टेड्रोस एडनॉम गेब्रियेसस को मनाने की कोशिश की जब वो उनसे जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान अलग से मिले.
एक और मीडिया समूह के प्रतिनिधि ने एक ट्वीट में मोदी और गेब्रिएसस की तस्वीर के साथ लिखा है- "वो बैठक जिससे मुहर लगी."
इसके जवाब में अब विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक अधिकारी ने ट्वीट कर स्थिति स्पष्ट की है.
संगठन की कम्युनिकेशंस विभाग की निदेशक गैबी स्टर्न ने लिखा है, "कोविड वैक्सीन के आपात इस्तेमाल को मंज़ूरी देने की WHO की प्रक्रिया सख़्त, वैज्ञानिक और मानकीकृत है. इसमें एक तकनीकी सलाहकार समूह के लिए बाहरी विशेषज्ञों को शामिल किया जाता है जो निर्माताओं और अन्य लोगों के डेटा की समीक्षा करते हैं कि वो कितनी कारगर और सुरक्षित है."
बीजेपी नेता और मोदी सरकार के कामकाज पर लगातार टीका-टिप्पणी करनेवाले नेता और राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने भी इस ट्वीट पर जवाब दिया है.
स्वामी ने लिखा, "निश्चित तौर पर बीजेपी की धूर्त आईटी सेल का मीडिया में कुछ लोगों पर बुरा प्रभाव पड़ा है."
कोवैक्सीन को मंज़ूरी
भारत में बनी कोरोना वायरस की वैक्सीन 'कोवैक्सीन' को विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO ने इमरजेंसी या आपातकालीन इस्तेमाल की अनुमति दे दी है.
पिछले कई महीनों में, कोवैक्सीन को बनाने वाली कंपनी भारत बायोटेक और WHO के बीच इस विषय पर बातचीत चल रही थी.
WHO ने बुधवार को एक बयान में कहा कि संगठन ने भारत बायोटेक की कोवैक्सीन को आपात स्थितियों में इस्तेमाल के लिए सूचीबद्ध करने का प्रस्ताव किया है.
WHO ने एक बयान में कहा, "WHO ने भारत बॉयोटेक द्वारा निर्मित कोवैक्सीन को 'इमरजेंसी यूज़ लिस्टिंग' में शामिल किया है. अब कोविड की रोकथाम करने वाली वैक्सीन में एक और नाम जुड़ गया है."
उसने साथ ही लिखा, "WHO की ओर से बनाई गई टेक्नीकल ऐडवाज़री ग्रुप, जिसमें दुनिया भर के नियामक विशेषज्ञ होते हैं, उन्होंने ये पाया है कि कोवैक्सीन कोविड19 से रक्षा के लिए WHO के मानकों का पालन करती है, और इस वैक्सीन के फ़ायदे इसके ख़तरों की तुलना में ज़्यादा हैं, और इसका सारी दुनिया में इस्तेमाल हो सकता है."
संगठन ने लिखा कि कोविड19 से लड़ने में दूसरी डोज़ लेने के 14 या उससे ज़्यादा दिन के बाद कोवैक्सीन 78% कारगर है, और स्टोर करने में आसानी की वजह से कम और मध्यम आय वाले देशों के लिए बहुत उपयोगी है.
हालाँकि, गर्भवती महिलाओं को कोवैक्सीन के इस्तेमाल को लेकर संगठन ने हरी झंडी नहीं दी है.
उसने लिखा है, "गर्भवती महिलाओं पर टीके का इस्तेमाल कितना सुरक्षित है, इसे लेकर अभी आँकड़े पर्याप्त नहीं हैं, और गर्भवती महिलाओं के बारे में अभी अध्ययन की योजना बनाई जा रही है."
कोवैक्सीन से पहले WHO ने भारत में सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया के बनाए टीके 'कोविशील्ड' को मान्यता दी थी.
कोविशील्ड ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी और दवा कंपनी एस्ट्राज़ेनेका ने मिलकर बनाई है उसी को सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया भारत में बना रहा है.
इसके अलावा भारत में रूस में निर्मित स्पूतनिक-V का भी इस्तेमाल हो रहा है. इसे भी WHO की मंज़ूरी मिल चुकी है.
कोवैक्सीन की शेल्फ़ लाइफ़ एक साल तक हुई
बुधवार को ही भारत बायोटेक ने कहा कि उसकी वैक्सीन को निर्माण के बाद से 12 महीने तक कारगर रहने के लिए मंजू़री मिल गई है.
उसने बताया कि भारत सरकार के विभाग - सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गेनाइज़ेशन - ने कोवैक्सीन की शेल्फ़ लाइफ़ को उसके मैनुफ़ैक्चरिंग डेट को बढ़ाकर एक वर्ष कर दिया है.
भारत बायोटेक के एक प्रवक्ता ने समाचार एजेंसी पीटीआई से कहा कि पहले कंपनी को कोवैक्सीन की शेल्फ़ लाइफ़ के छह महीने की मंज़ूरी मिली थी जिसे बढ़ाकर नौ महीने कर दिया गया था.
कैसे काम करती है कोवैक्सीन
कोवैक्सीन एक निष्क्रिय टीका है जिसका मतलब हुआ कि इसे मरे हुए कोरोना वायरस से बनाया गया है.
इसे बनाने वाली भारत बायोटेक ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ वायरोलॉजी से चुने गए कोरोना वायरस के सैंपल का उपयोग किया है.
शरीर की इम्यून कोशिकाएं टीका लगाने के बाद मरे हुए वायरस को भी पहचान लेता है. इसके बाद वह इम्यून सिस्टम को इस वायरस के ख़िलाफ़ एंटीबॉडी बनाने को प्रेरित करती हैं.
इस वैक्सीन की दोनों ख़ुराकों के बीच चार हफ़्तों का अंतर रखा जाता है. इसे दो से आठ डिग्री के तापमान पर स्टोर किया जा सकता है.
इस वैक्सीन के ट्रायल के तीसरे चरण के नतीजे बताते हैं कि यह टीका 81 फ़ीसद तक प्रभावी है.
24 साल पुरानी कंपनी भारत बायोटेक कुल मिलाकर 16 बीमारियों से बचाव के टीके बनाती है. इन टीकों को दुनिया के 123 देशों में भेजा जाता है.
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