पीएफ़ सेविंग्स के 37 करोड़ रुपये अवैध तरीक़े से निकाले गए - प्रेस रिव्यू

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कर्मचारी भविष्य निधि फंड से कई करोड़ की सेविंग्स मुंबई के क्षेत्रीय कार्यालय से धोखाधड़ी से निकालने का मामला सामने आया है. अंग्रेज़ी अखबार द हिंदू के मुताबिक ईपीएफओ के अधिकारियों की मिलीभगत से ऐसा मुमकिन हो पाया.

अख़बार ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि बुधवार तक 37 करोड़ रुपये निकाले गए. इनमें से ज़्यादातर की ईपीएफ़ से आंशिक निकासी की गई.

इस मामले में चार अधिकारियों को निलंबित किया गया है और ईपीएफ़ओ की एक ऑडिट टीम को कांदीवली के ऑफ़िस में जांच के लिए भेजा गया है.

ईपीएफ़ओ ने पुष्टि की है कि इस मामले में प्रशासनिक और आपराधिक कार्रवाई शुरू कर दी गई है, साथ ही पैसों की वसूली के प्रयास भी किए गए हैं.

अख़बार ने एक सूत्र के हवाले से बताया है कि वैसे ईपीएफ़ अकाउंट, जिनमें काफ़ी समय से पैसे नहीं डाले गए थे क्योंकि कर्मचारी विदेश चले गए थे या नौकरी बदल ली थी और खातों को जोड़ा नहीं था, उनसे फ़र्ज़ी दावा कर पैसे निकाले गए.

सूत्र के मुताबिक, "क़रीब 25 से 30 प्रतिशत रक़म निफ्ट का इस्तेमाल कर निकाली या ट्रांसफ़र की गई. इसे अंजाम देने में जूनियर क्लेरिकल लेवल के अधिकारियों ने मदद की, इनमें जूनियर सिक्युरिटी असिस्टेंट भी शामिल थे."

मुंबई क्षेत्र में ईपीएफ़ कार्यालयों ने इन धोखाधड़ी के मामलों का हवाला देते हुए निकासी प्रक्रियाओं को कड़ा कर दिया है और दावों के निपटान में ताज़ा गड़बड़ी से बचने के लिए नए निर्देश जारी किए हैं. अन्य पीएफ़ कार्यालयों में भी यही नियम अपनाए जा सकते हैं.

इस मामले पर द हिंदू के विस्तृत प्रश्नों के जवाब में, केंद्रीय पीएफ़ आयुक्त सुनील बर्थवाल के कार्यालय ने स्वीकार किया कि एक आंतरिक जांच में पाया गया है कि 'ग़ैर-मौजूद खातों' से बचत की रक़म निकाली गई है. इसके अलावा इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि 'किसी भी सदस्य के खाते से ईपीएफ़ बचत धोखाधड़ी से नहीं निकाला और ईपीएफ़ सदस्यों की बचत राशि सुरक्षित है.'

"आंतरिक जांच में पता चला है कि कुछ बेईमान अफ़सरों ने 'ग़ैर मौजूद खाते' बनाकर रक़म ट्रांसफ़र की है, जो खाते किसी भी ईपीएफ़ मेंबर के नहीं हैं, और ये रक़म निकाली है."

कार्यलय ने 37 करोड़ रुपये के द हिंदू के दावे को ग़लत नहीं बताया लेकिन कहा कि "गैर-मौजूद खाते से क्रेडिट की रक़म का पता लगाया जा रहा है."

पुलिस, सीबीआई जजों की शिकायतों का जवाब नहीं देती: चीफ़ जस्टिस रमन्ना

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सीबीआई और आईबी की आलोचना करते हुए कहा कि एजेंसियां न्यायाधीशों की सुरक्षा से संबंधित मामलों में "न्यायपालिका की बिल्कुल भी मदद नहीं कर रही हैं".

अंग्रेज़ी अख़बार द इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है कि कोर्ट ने कहा कि पुलिस और सीबीआई न्यायाधीशों की शिकायतों का जवाब नहीं देते हैं.

धनबाद के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश उत्तम आनंद की मौत के संबंध में दो-न्यायाधीशों की पीठ का नेतृत्व करते हुए मुख्य न्यायाधीश एनवी रमन्ना ने कहा, "देश में ऐसे कई मामले हैं जिनमें गैंगस्टर शामिल हैं और जहां हाई प्रोफाइल लोगों पर आरोप लगाये जाते हैं" और न्यायाधीशों को कभी-कभी "व्हाट्सएप, एसएमएस पर संदेश भेजकर मानसिक रूप से भी धमकाया जाता है" या सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से परेशान किया जाता है.

उन्होंने कहा कि कुछ मामलों में सीबीआई जांच के आदेश दिए गये थे लेकिन एजेंसी ने "कुछ नहीं किया."

मुख्य न्यायाधीश ने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल, जिन्हें इस मामले में कोर्ट की सहायता करने के लिए कहा गया था, उनसे कहा, "एक या दो जगहों पर, अदालतों ने सीबीआई जांच के आदेश दिए. यह दुखद है कि सीबीआई ने कुछ नहीं किया. हमें सीबीआई के रवैये में कुछ बदलाव की उम्मीद थी. लेकिन कोई बदलाव नहीं हुआ है."

जस्टिस रमन्ना ने "देश में एक ट्रेंड" की ओर भी इशारा किया जिसके तहत अपने मुताबिक आदेश नहीं आने पर आदलतों को बदनाम किया जाता है.

उन्होंने कहा कि वह पूरी ज़िम्मेदारी के साथ यह कह रहे हैं कि "यह इस देश में एक नया चलन है. यदि कोई प्रतिकूल आदेश पारित किया जाता है, तो न्यायपालिका को बदनाम किया जाता है. यदि न्यायाधीश पुलिस या सीबीआई के पास शिकायत दर्ज कराते हैं, तो वे कोई जवाब नहीं देते हैं. इंटेलिजेंस ब्यूरो और सीबीआई, न्यायपालिका की बिल्कुल भी मदद नहीं कर रहे हैं, "

चीफ़ जस्टिस रमन्ना और जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने एएसजे आनंद की मौत को "राज्य की विफलता" बताया.

चीफ़ जस्टिस रमन्ना ने कहा, "एक युवा जज की मौत के दुर्भाग्यपूर्ण मामले को देखें. यह राज्य की विफलता है. इस क्षेत्र में कोयला माफिया हैं और न्यायाधीशों के आवासों और सोसायटी को सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए थी."

केंद्र ने बताया- ऑक्सीजन प्रबंधन के लिए अप्रैल 2020 में कोई पैनल नहीं बना

केंद्र ने शुक्रवार को एक सूचना के अधिकार (आरटीआई) कार्यकर्ता को महामारी के दौरान एक सरकारी पैनल द्वारा मेडिकल ऑक्सीजन के प्रबंधन से संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड देने से इनकार करते हुए कहा कि अप्रैल 2020 में ऐसा कोई पैनल नहीं बनाया गया था.

अंग्रेज़ी अखबार द टेलीग्राफ़ ने लिखा है कि इस साल जून में सरकार ने सौरव दास को मांगी गई जानकारी देने से इनकार करने की दूसरी वजह बताई थी. तब आरटीआई अधिनियम की धाराओं का हवाला दिया गया था जो अधिकारियों को ऐसी जानकारी बताने की अनुमति देता है जो भारत के राष्ट्रीय हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती हैं.

दास ने केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय के उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग (डीपीआईआईटी) से मेडिकल ऑक्सीजन के प्रबंधन के लिए काम करने वाले अधिकारियों के एंपावरड ग्रुप की बैठकों की तारीखें, एजेंडा, प्रेज़ेंटेशन और मिनट्स से जुड़ी जानकारियां मांगी थीं. दास ने अपने प्रश्न में कहा था कि समिति का गठन अप्रैल 2020 में किया गया था.

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, केंद्र ने पिछले साल मार्च में डीपीआईआईटी सचिव गुरुप्रसाद महापात्र की अध्यक्षता में और अन्य मंत्रालयों के अधिकारियों के साथ एक समूह का गठन किया था, ताकि राज्यों को ऑक्सीजन सहित आवश्यक चिकित्सा उपकरणों की आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके.

डीपीआईआईटी ने शुक्रवार को कहा, "कोविड -19 महामारी के मद्देनज़र मेडिकल ऑक्सीजन की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए सचिव डीपीआईआईटी गुरुप्रसाद महापात्र की अध्यक्षता में अप्रैल 2020 में ऐसी कोई समिति गठित नहीं की गई थी" इसलिए, इसमें कहा गया कि दास ने जो जानकारी मांगी थी, वह मौजूद नहीं है.

दास ने द टेलीग्राफ से कहा, "इसे मार्च में बनाया गया हो या अप्रैल 2020 में, यह अप्रासंगिक है. मैंने इसके आधिकारिक रिकॉर्ड मांगे हैं."

पुडुचेरी से दास ने कहा, "यह सूचना के दुर्भावनापूर्ण इनकार की तरह प्रतीत होता है. उन्होंने पहले दावा किया था कि वे राष्ट्रीय हित के आधार पर जानकारी साझा नहीं कर सकते, वे अब दावा करते हैं कि इसका कोई अस्तित्व नहीं है."

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस साल 15 अप्रैल को एम्पावर्ड ग्रुप द्वारा उठाए गए क़दमों को सूचीबद्ध किया था, जिसमें कहा गया था कि एम्पावर्ड ग्रुप ने पिछले एक साल में राज्यों को ऑक्सीजन सहित आवश्यक चिकित्सा उपकरणों की सुचारु आपूर्ति की निरंतर निगरानी और सुविधा प्रदान की थी.

मंत्रालय ने कहा था कि इस समूह की गतिविधियों ने ऑक्सीजन उत्पादन बढ़ाने, मौजूद स्टॉक का उपयोग करने, और राज्यों में ऑक्सीजन की सप्लाई को व्यवस्थित करने में मदद की थी.

भारत में कोविड 'आर नॉट' एक से ऊपर पहुंचा

डेल्टा वैरिएंट के बढ़ते प्रभाव के कारण भारत में कोविड का आर नॉट यानी वो संख्या जो बताती है कि संक्रमण एक व्यक्ति से कितने दूसरे व्यक्तियों में फैलता है, एक से अधिक हो गया है. एक महीने पहले ये वैल्यू 0.93 थी.

अंग्रेज़ी अखबार द टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक रिप्रोडक्शन वैल्यू फ़िलहाल 1.01 है. इसका मतलब है कि एक संक्रमित व्यक्ति एक से अधिक लोगों को संक्रमित कर रहा है.

मार्च में जब केस बहुत तेज़ी से बढ़ रहे थे, तब आर वैल्यू 1.4 थी, जो बाद में 0.7 तक पहुंच गई थी.

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