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कोरोना का नया वैरिएंट ज़ीटा कितना ख़तरनाक है और कैसे नुक़सान पहुँचा सकता है?
- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 3 मिनट
पुणे स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी ने अपने एक अध्ययन में कोरोना वायरस का एक नया वैरिएंट मिलने की पुष्टि की है. मेडिकल क्षेत्र से जुड़ी प्री-प्रिंट रिपोर्ट्स प्रकाशित करने वाली वेबसाइट bioRxiv पर छपी रिपोर्ट में बताया गया है कि यह वैरिएंट ब्रिटेन और ब्राज़ील से आने वाले अंतरराष्ट्रीय यात्रियों के नाक और गले के स्वैब से मिला है.
इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बाद से सोशल मीडिया से लेकर मीडिया रिपोर्ट्स में तमाम तरह की आशंकाएं जताई जा रही हैं. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि ये वैरिएंट काफ़ी ख़तरनाक है.
सोशल मीडिया में कहीं इसे बेहद घातक वैरिएंट बताया जा रहा है तो कहीं इसकी तुलना डेल्टा वैरिएंट से की जा रही है.
बीबीसी हिंदी ने इस वैरिएंट से जुड़े सवालों के जवाब तलाशने के लिए इस वैरिएंट को डिटेक्ट करने वालीं नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी की वैज्ञानिक डॉक्टर प्रज्ञा यादव से बात की.
कहां से आया है ये नया वैरिएंट?
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी ने इस वायरस को ब्राज़ील और ब्रिटेन से भारत आए यात्रियों के गले और नाक के स्वैब से डिटेक्ट किया है.
डॉक्टर प्रज्ञा यादव बताती हैं, “कोरोना वायरस का वैरिएंट B.1.1.28.2 सबसे पहले ब्राज़ील में अप्रैल, 2020 में पाया गया था. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे एक अहम वैरिएंट के रूप में वर्गीकृत किया है. हाल ही में इसे ज़ीटा वैरिएंट के रूप में नामित किया गया है.''
''सार्स कोव-2 के जीनोमिक सर्विलांस के तहत वेरिएंट B.1.1.28.2 को ब्रिटेन (दिसंबर 2020 में) और ब्राज़ील (जनवरी 2021 में) से भारत आने वाले अंतरराष्ट्रीय यात्रियों के नमूनों से प्राप्त किया गया था. इन दोनों ही यात्रियों को संक्रमण से पहले किसी तरह की बीमारियां नहीं थीं और संक्रमित होने से ठीक होने तक इनमें कोरोना वायरस के लक्षण नज़र नहीं आए.”
कितना ख़तरनाक है नया वैरिएंट?
कोरोना वायरस के तमाम वैरिएंट्स की तरह वैज्ञानिक इस वैरिएंट को भी काफ़ी अहम मान रहे हैं. हालांकि, कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में इसे डेल्टा वैरिएंट जितना ख़तरनाक बताया गया है.
डॉ. यादव वैरिएंट से जुड़े वैज्ञानिक पहलुओं को सामने रखते हुए बताती हैं, “विश्व स्वास्थ्य संगठन किसी भी वैरिएंट को वेरिएंट ऑफ इंटरेस्ट की श्रेणी में तब डालता है जब एक वैरिएंट कई देशों में पाया जाए. इसके साथ ही अगर ये माना जाए कि वेरिएंट बड़ी आबादी फैलकर कम्युनिटी ट्रांसमिशन की स्थिति पैदा कर सकता है, तब भी इसे एक अहम वैरिएंट की श्रेणी में रखा जा सकता है जिस पर नज़र रखी जानी चाहिए.
इस वैरिएंट ने दिखाया है कि ये कुछ ईएयू मोनोक्लोनल एंटीबॉडी ट्रीटमेंट द्वारा विकसित प्रतिरोधक क्षमता में गंभीर कमी लाने की क्षमता रखता है. इसके साथ ही कुछ एमआरएनए वैक्सीन लगाए जाने के बाद सेरा से जो प्रतिरोधक क्षमता पैदा होती है, यह वैरिएंट उसे भी नुकसान पहुंचा सकता है.”
सरल शब्दों में कहें तो कुछ वैक्सीन इस वेरिएंट के ख़िलाफ़ पूरी तरह से प्रभावशाली साबित नहीं होंगी.
कैसे नुकसान पहुंचा सकता है ये वैरिएंट?
वैरिएंट की सिरियन हेम्सटर मॉडल स्टडी में पाया गया है कि इस वैरिएंट से संक्रमण होने के बाद वज़न में कमी आने, श्वसन तंत्र में वायरस के नमूने तैयार होने, और फेफड़ों के गंभीर रूप से प्रभावित होने का जोख़िम है.
डॉ प्रज्ञा यादव बताती हैं, “हमने सीरियन हेम्स्टर मॉडल पर इस वैरिएंट का अध्ययन किया है. ये कोविड-19 को समझने का एक प्रचलित तरीका है जिसमें जानवरों पर टेस्टिंग की जाती है. इस प्रक्रिया से वायरस की क्षमता का आकलन किया जाता है कि उसमें बीमारी पैदा करने में क्षमता कितनी है. हमने इसी मॉडल के तहत इस वैरिएंट की क्षमताओं की तुलना एक पहले पाए गए वैरिएंट से की है. इस तरीके से की गई जाँच से हमने ये पाया है कि इस वैरिएंट ने काफ़ी गंभीर बीमारी पैदा की है.”
कौन सी वैक्सीन होगी प्रभावी?
कोरोना वायरस का नया वैरिएंट सामने आने के बाद लोगों के मन में सबसे पहला सवाल ये होता है कि इस वैरिएंट से मुकाबले के लिए कौन सी वैक्सीन कारगर है.
डॉ यादव बताती हैं कि उनकी टीम ने इस वैरिएंट के ख़िलाफ़ कोविड-19 से बचाव के लिए तैयार की गई वैक्सीन 'कोवैक्सीन' की क्षमता का अध्ययन किया है.
वो कहती हैं, "हमने अपने अध्ययन में पाया है कि कोविड-19 वैक्सीन 'कोवैक्सीन' इस वैरिएंट से बचाने में सक्षम हो सकती है. इस वैक्सीन निर्माता की ओर से वैक्सीन द्वारा नए वैरिएंट से पैदा होने वाले ख़तरे को कम करने से जुड़ा डेटा नहीं दिया है. लेकिन वैक्सीन के टीकाकरण द्वारा इस वैरिएंट से भी बचाव मिलना चाहिए."
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