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तमिलनाडु में बीजेपी ने खेला जाति कार्ड, लेकिन क्या ये कामयाब होगा?
- Author, मुरलीधरन काशीविश्वनाथन
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
तमिलनाडु में मतदान की तारीख़ क़रीब आ रही है. इसी बीच केंद्र सरकार ने एक क़ानून पारित कर दक्षिण तमिलनाडु की सात अनुसूचित जातियों को 'देवेंद्र कूला वेल्लालुर' नाम देकर एकजुट किया है.
क्या जातियों को इस तरह एकजुट करने से बीजेपी को फ़ायदा मिलेगा?
माना जाता है कि कन्याकुमारी और तमिलनाडु के पश्चिमी ज़िलों में बीजेपी मज़बूत हो रही है. ये कहा जा रहा है कि कन्याकुमारी में नादर समुदाय और पश्चिमी ज़िलों में गौंडर समुदाय को क़रीब लाकर बीजेपी मज़बूत हुई है.
अब बीजेपी दक्षिण तमिलनाडु की अनुसूचित जातियों को आकर्षित करने के प्रयास में है. इसी क्रम में जातियों को 'देवेंद्र कूला वेल्लालुर' की संज्ञा दी गई है. लेकिन क्या बीजेपी को दूसरे ज़िलों में भी इस जाति आधारित एकीकरण से मदद मिली है?
माउंट कार्मेल कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर अरुण कुमार कहते हैं, "हो सकता है कि हिंदूवादी संगठनों को कन्याकुमारी में जाति के आधार पर लोगों को एकजुट करने से मदद मिली हो. लेकिन दूसरे ज़िलों में ये रणनीति कारगर नहीं रही है. वहां रणनीति क्यों नाकाम हुई ये समझने के लिए हमें ये देखना होगा कि कन्याकुमारी में हिंदू संगठनों ने किस तरह अपनी जड़ें जमाई हैं. यहां इस रणनीति ने काम किया और समर्थन वोटों में बदला.'
प्रोफ़ेसर अरुण कुमार ने कन्याकुमारी क्षेत्र में हिंदू संगठनों के मज़बूत होने पर लंबा शोध किया है.
कन्याकुमारी में कैसे मज़बूत हुए हिंदू संगठन?
भारत की आज़ादी के बाद साल 1956 तक कन्याकुमारी केरल का हिस्सा था. कन्याकुमारी के तमिलनाडु राज्य में शामिल होने से पहले ही यहां हिंदू संगठनों ने पैर पसारने शुरू कर दिए थे.
प्रोफ़ेसर कुमार कहते हैं, "कन्याकुमारी ज़िले में आरएसएस की पहली शाखा साल 1948 में पद्मनाबापुरम महल में लगी थी. 1963 में हुए सांप्रदायिक दंगों ने भी यहां हिंदू संगठनों को मज़बूत किया. विवेकानंद मेमोरियल के बनने से पहले ही वहां मा. पो शिवगननम ने उस जगह को विवेकानंद चट्टान का नाम देते हुए तख़्ती लगा दी थी. वहां के ईसाई लोगों ने इस जगह को ज़ेवियर रॉक बताते हुए कड़ा विरोध भी किया था. जब उस नामपट्टी को तोड़ दिया गया तो दंगा हो गया. फिर उस जगह पर विवेकानंद मेमोरियल बना. लेकिन दोनों ही समुदायों के दिलों में उस दंगों के जख़्म ताज़ा रहे."
धर्म का प्रभाव
इस ज़िले में द्रविड़ विचारधारा की पार्टियों की गतिविधियों का भी कोई ख़ास असर नहीं हुआ. कन्याकुमारी में 80 फ़ीसद आबादी नादर समुदाय की हैं. इसमें हिंदू नादर और ईसाई नादर दोनों शामिल हैं. अय्या समूह भी इनसे निकले हैं. यदि आर्थिक नज़रिए से देखें तो ईसाई नादरों के हालात बेहतर थे. इसके बाद अय्या समूह थे और फिर हिंदू नादर तीसरे नंबर पर थे. ऐसे में आर्थिक स्थिति में फ़र्क़ की वजह से हिंदू नादरों को धर्म के आधार पर एकजुट करना आसान था.
जब तक कामराज वहां थे, ये अंतर तो था लेकिन बहुत बड़ा नहीं था. लेकिन 1982 में हुए एक दंगे के बाद धानूलिंगा नादर ने कांग्रेस छोड़ दी और हिंदूवादी फ्रंट में शामिल हो गए. इसके बाद से यहां हिंदू संगठन मज़बूत ही होते गए हैं. इन संगठनों ने आर्थिक स्थिति में फ़र्क़ को सामाजिक भेदभाव की तरह पेश किया और लोगों को धीरे धीरे एकजुट करते गए.
प्रोफ़ेसर अरुण कुमार कहते हैं, "1982 के दंगे के बाद हिंदू नादरों में एक बड़ी हिंदूवादी लहर चली थी. 1984 में पद्मनाभपुरम सीट से हिंदू फ्रंट का उम्मीदवार जीत गया था. ये पहला मौका था जब किसी हिंदू संगठन के उम्मीदवार को तमिलनाडु में जीत मिली. इस जीत के बाद कन्याकुमारी में कई शाखाएं स्थापित की गईं थीं."
कैसे बदलीं स्थितियां?
कन्याकुमारी ज़िले में आमतौर पर राष्ट्रीय पार्टियां मज़बूत रही हैं. लेकिन 2009 के चुनावों में यहां डीएमके के हेलेन डेविडसन जीत गए थे. तब तक कन्याकुमारी में कोई प्रांतीय पार्टी नहीं जीती थी. आज़ादी के बाद और कन्याकुमारी के तमिलनाडु में शामिल होने के दौरान भी कांग्रेस के लिए यहां राष्ट्रवादी विचारधारा फ़ायदेमंद साबित होती थी. हालांकि मार्शल नेसामणी और कामराज के निधन के बाद हिंदू नादरों ने हिंदू संगठनों के क़रीब जाना शुरू कर दिया था.
अरुण कुमार बताते हैं, "इस सबके बीच, बीजेपी यहां हिंदू नादरों के अलावा दूसरी जातियों को आकर्षित करने की कोशिशें भी कर रही थी. वो पद्मनाभपुरम में रहने वाली एक ख़ास जाति कृष्णावगाई को आकर्षित करने में रूचि ले रही थी. बीजेपी दूसरी जगहों पर भी ऐसी जाति आधारित एकजुटता बनाने में लगी थी. लेकिन बीजेपी के ऐसे प्रयास कन्याकुमारी के बाहर दूसरे ज़िलों में कारगर होते दिखाई नहीं देते हैं."
मदुरै के एक शोधकर्ता नाम न ज़ाहिर करते हुए कहते हैं, "यदि किसी बाहरी के नज़रिए से देखें तो बीजेपी एक धार्मिक पार्टी लगती है. लेकिन वह जाति पर ज़्यादा ध्यान देती है."
वो कहते हैं, "बीजेपी ने इन जातियों के जन्म की कहानियों को सहर्ष स्वीकार कर लिया. उदाहरण के तौर पर देवेंद्र कूला वेल्लालुर लोग अपने आप को इंद्र से जोड़ते हैं. बीजेपी यहां नंदानार की तस्वीर चुनावी पर्चों में इस्तेमाल करती है. ये पर्चे ऐसे इलाक़ों में बांटे जाते हैं जहां उनकी पूजा होती है. इस तरह की गतिविधियां कम ही संख्या में सही लेकिन लोगों का ध्यान ज़रूर आकर्षित करेंगी."
दलितों पर शोध करने वाले रघुपति कहते हैं, "बीजेपी शुरुआत से ही ऐसा कर रही है. चाहें पिछले लोकसभा चुनाव हों या फिर इस बार के विधानसभा चुनाव. यही बीजेपी का तरीक़ा है. वो जातियों और पुराणों में बुनी गई कहानियों को स्वीकार करते हैं. वो अपनी राजनीतिक गतिविधियां भी इसी बिंदू से शुरू करते हैं."
पश्चिमी ज़िलों में जातिगत एकीकरण
दक्षिणी ज़िलों में नादरों और देवेंद्र कूला वेल्लालुर लोगों के साथ मिलकर काम करने के बाद बीजेपी ने पश्चिमी ज़िलों में भी ऐसे ही जातिगत आधार पर एकीकरण करने की कोशिश की है. 90 के दशक में भी पार्टी ने अरुणदतियारों और गौंडरों के साथ भी यहीं करने की कोशिश की थी. बीजेपी ने जब पश्चिमी ज़िलों में काम करना शुरू किया तो सबसे पहले सबसे पिछड़े लोगों के साथ किया.
''1990 के दशक से पहले पश्चिमी ज़िलों में बीजेपी को एक ख़ास पीड़ित जाति से जोड़कर देखा जाता था. 1991 में अर्जुन संपथ यहां पार्टी के ज़िला महासचिव थे. वो भी एक शोषित जाति से ही थे. फिर बीजेपी ने 1993 में गौंडर जाति पर ध्यान देना शुरू किया. ये वो समय था जब द्राविण मूल की पार्टयों से नाराज़ लोग बीजेपी के साथ जुड़ रहे थे. उद्योगपति पोल्लाच्ची महालिंगम जैसे लोगों के समर्थन ने इसमें मदद की. इसकी एक वजह ये भी थी कि कोयंबटूर में अधिकतर बड़ी दुकानों के मालिक मुसलमान थे. जब हिंदूवादी संगठन गौंडर समुदाय को इस बहाने एकजुट कर रहे थे तब ही कोयम्बटूर में धमाका हुआ. इसके बाद यहां दंगा भी हुआ. इससे बीजेपी के लिए हालात बेहतर हो गए.''
बीजेपी की रणनीति
"ऐसा हो क्यों रहा है? द्रविड़ पार्टियां जातिगत मतभेदों को बहुत तरजीह नहीं देती हैं और उन्हें जारी रहने देती हैं. ऐसे में वो अल्पसंख्यक समूह जिन्हें द्रविड़ पार्टियों ने नज़रअंदाज़ किया है वो अपनी अलग पहचान और समर्थन चाहते हैं. इस स्थिति में बीजेपी की तरफ़ हो जाते हैं. पश्चिमी ज़िलों में कन्नड़ भाषी लोगों को एकजुट करने के लिए बीजेपी ने साल 2014-2016 के बीच बहुत सी छोटी-छोटी बैठकें की थीं. इन बैठकों में पीएस येदियुरप्पा जैसे नेता भी शामिल हुए थे. इसके अलावा जातियां जिन मुद्दों का सामना कर रही हैं, बीजेपी उन्हें भी सुलझाने की कोशिशें कर रही हैं."
अरुण कुमार कहते हैं, "बीजेपी ने ये वादा भी किया है कि डीनोटिफ़ाइड ट्राइब (नामांकित जनजाति) की कुछ जातियों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया जाएगा. हिंदू संगठनों के दफ़्तरों इस पर चर्चा करने के लिए बैठकें भी चल रही हैं. यदि इन जातियों को ये दर्जा मिल गया तो ये बीजेपी का वोट बैंक बन सकी हैं."
क्या बीजेपी इस तरह जातिगत एकीकरण करती रहेगी और क्या इससे राजनीतिक फ़ायदा मिलता रहेगा? दरअसल बीजेपी इस समय इस बात का फ़ायदा उठा रही है कि द्रविड़ पार्टियों ने जातिगत भेदभावों को जारी रहने दिया.
अरुण कुमार कहते हैं, "हम निश्चिंत होकर ये नहीं कह सकते हैं कि इसका फ़ायदा होगा ही. जब लोग जाति के आधार पर एकजुट होंगे तब हिंदू पहचान मज़बूती से स्थापित नहीं हो पाएगी. यही वजह है कि बीजेपी को कन्याकुमारी और कोयम्बटूर में भी हार का सामना करना पड़ा. कोयम्बटूर दंगों के बाद 1998 और 1999 में बीजेपी के सीपी राधाकृष्णनन यहां जीते थे. लेकिन जीत का वो सिलसिला चला नहीं. जातियों के बीच मतभेद गहरे हैं और वो हिंदू पहचान के साथ एकजुट नहीं हो पाती हैं."
रघुपति कहते हैं, "भले ही बीजेपी ने देवेंद्र कूला वेल्लालुर की पहचान गढ़ने में बहुत मेहनत की हो लेकिन अभी तुरंत पार्टी को इसका राजनीतिक फ़ायदा नहीं मिल पाएगा क्योंकि आमतौर पर ये लोग वामपंथी प्रभाव में रहते हैं. ऐसे में लगता नहीं कि इससे बीजेपी को वोट मिलेंगे. यदि ऐसी गतिविधियों से वोट मिलते तो फिर जॉन पंडियन एगमोर से क्यों लड़ रहे हैं? बीजेपी की हिंदूवादी विचारधारा देवेंद्र कूला वेल्लालुर और नादर समुदायों के ख़िलाफ़ ही है. मूल मुद्दों को सुलझाए बिना ये रणनीति बहुत आगे नहीं बढ़ सकती है."
लेकिन बीजेपी को अब भी कन्याकुमारी में भरपूर समर्थन मिल रहा है. भले ही 2019 लोकसभा चुनावों में यहां कांग्रेस के उम्मीदवार एच वसंथकुमार ने जीत हासिल की हो, अब भी यहां एक बड़ा तबक़ा है जो बीजेपी का समर्थन करता है. उदाहरण के तौर पर जब बीजेपी ने हिंदू छात्रों के लिए वज़ीफ़ा की माँग करते हुए प्रदर्शन किया तो एक लाख से अधिक लोग जुटे थे.
कन्याकुमारी और पश्चिमी ज़िलों जिनमें कोयम्बटूर भी शामिल है के अलावा दूसरे ज़िलों में भी बीजेपी की यही रणनीति है. वो ऐसे समुदायों को अपने पाले में करने की कोशिश करती है जिन्हें मुख्य पार्टियां नज़रअंदाज़ करती हैं.
उदाहरण के तौर पर मदुरै में पार्टी सौराष्ट्र समुदाय को अपने पाले में लेने की कोशिश कर रही है. उनका समर्थन करके बीजेपी यहां ऐसा वोट बैंक बनाना चाहती है जो लंबे समय तक उसके साथ ऱहे. लेकिन राजनीति में इस रणनीति से वोट मिलेंगे या नहीं ये सिर्फ़ बीजेपी की गतिविधियों पर ही निर्भर नहीं करेगा बल्कि इस बात पर भी निर्भर करेगा कि द्रविड़ पार्टियों समेत दूसरी पार्टियां यहां कैसे प्रतिक्रिया देती हैं.
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