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शिव कुमार: नौदीप कौर के साथ किए गए थे गिरफ़्तार, पुलिस पर उठ रहे हैं कई सवाल
- Author, गुरप्रीत सैनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
24 वर्षीय मज़दूर अधिकार कार्यकर्ता शिव कुमार भी उसी मामले में जेल में हैं, जिसमें नौदीप कौर है.
वो हरियाणा के कुंडली इंडस्ट्रियल एरिया (केआईए) में प्रवासी मज़ूदरों का बकाया वेतन दिलाने की मुहिम चला रहे मज़दूर अधिकार संगठन के अध्यक्ष हैं. नौदीप कौर इसी संगठन की सदस्य हैं.
पुलिस का कहना है कि शिव कुमार भी 12 तारीख़ की उस घटना के वक़्त मौक़े पर मौजूद थे, जब फ़ैक्टरी के गेट पर प्रदर्शन कर रहे लोगों ने पुलिस पर हमला कर दिया था. इस घटना के बाद दर्ज दो एफ़आईआर में अवैध धन वसूली और हत्या की कोशिश से जुड़ी गंभीर धाराएँ लगाई गई हैं.
लेकिन उनके साथियों और परिवार का दावा है कि शिव कुमार वहाँ नहीं थे. उनका कहना है कि शिव कुमार और संगठन के अन्य सदस्यों पर कार्रवाई इसलिए की गई, क्योंकि वो केआईए में काम करने वाले मज़दूरों के हक़ की आवाज़ उठाते हैं.
संगठन के अन्य सदस्यों ने बीबीसी को बताया कि 12 तारीख़ की घटना वाले दिन भी संगठन के लोग, जिनमें ज़्यादातर मज़दूर ही शामिल हैं, किसी मज़दूर का बकाया वेतन दिलाने के लिए ही एक फ़ैक्टरी के बाहर धरना दे रहे थे, जहाँ पुलिस ने आकर पहले लाठीचार्ज किया.
उनका कहना है कि शिव कुमार अपनी आँखों की समस्या की वजह से मज़दूरों का बकाया दिलाने के लिए बाक़ी लोगों के साथ कम ही जाते थे. वो अधिकतर सिंघु बॉर्डर पर किसान आंदोलन में लगाए अपने संगठन के टेंट के पास बैठे मिलते थे, जहाँ कई मज़दूर आकर अपने बकाया वेतन को दिलाने के लिए संगठन से मदद की गुहार लगाते थे.
उनका कहना है कि 12 तारीख़ को भी शिव कुमार वहीं बैठे थे.
केआईए दरअसल सिंघु बॉर्डर से सटा सोनीपत का इलाक़ा है. किसानों के आंदोलन को इस मज़दूर संगठन ने शुरू से ही अपना समर्थन दिया था और वहाँ अपना टेंट लगा लिया था.
संगठन के लोगों के मुताबिक़, इसके बाद और भी ज़्यादा मज़दूर, जिनका लॉकडाउन से पहले का पैसा भी फँसा है, वो मदद के लिए नाम लिखवाते थे. इसके बाद से इस संगठन की मुहिम और तेज़ हो गई थी.
ये भी कहा जा रहा है कि किसान आंदोलन को समर्थन देने की वजह से भी संगठन के सदस्य निशाने पर आ गए. पहले नौदीप और फिर शिव कुमार को गंभीर धाराओं में गिरफ़्तार किया गया. शिव कुमार फ़िलहाल सोनीपत जेल में हैं.
परिवार के आरोप, हाई कोर्ट का हस्तक्षेप
शिव कुमार के पिता का आरोप है कि गिरफ़्तारी के कई दिन बाद तक भी पुलिस ने परिवार को जानकारी नहीं दी और ना ही शिव को वकील से मिलने दिया गया.
शिव कुमार के पिता राजवीर ने बीबीसी हिंदी से कहा, "हमारे एक पहचान वाले ने शिव कुमार को थाने में देखा, तब हमें 31 जनवरी को पता चला कि उसे पुलिस ने 16 जनवरी से उठाया हुआ है. पता चला है कि पुलिस ने उसे बुरी तरह पीटा है. उसका चश्मा छीन लिया गया है, उसे एक आँख से बिल्कुल नहीं दिखता है. ना पुलिस ने हमें गिरफ़्तारी के बारे में बताया, ना परिवार और वकील को मिलने दिया. हमें कहा कि वो क्वारंटीन है, इसलिए नहीं मिलने दे सकते."
शिव कुमार के पिता क़रीब डेढ़ महीने पहले उनसे किसान आंदोलन में ही आख़िरी बार मिले थे. तब उनके पिता गाँव के कुछ लोगों के साथ मिलकर किसान आंदोलन में शामिल होने आए थे.
पुलिस ने इन सभी आरोपों से इनकार किया है और कहा है कि उन्हें 16 नहीं, 23 जनवरी को गिरफ़्तार किया गया था, जिसके तुरंत बाद उनके परिवार को बताया भी गया.
बीबीसी से बातचीत में सोनीपत के कुंडली थाने के एसएचओ रवि कुमार ने कहा कि शिव कुमार का मेडिकल कराया गया था, और उनके पास सबूत हैं कि शिव कुमार के साथ कोई मारपीट नहीं हुई.
लेकिन परिवार और वकील ने ज़ोर देकर मांग की कि मेडिकल कराया जाए और पंजाब के अस्पताल में कराया जाए. उन्होंने आरोप लगाया कि शिव कुमार से क्वारंटीन का बहाना देकर इसलिए मिलने नहीं दिया जा रहा है, ताकि अगर कोई चोट हो तो वो इतने दिन में भर जाए.
शिव कुमार के वकील हरिंदर सिंह बैंस ने हाई कोर्ट में याचिका डालकर हस्तक्षेप की माँग की थी, जिसमें उन्होंने ये ज़िक्र भी किया कि शिव कुमार ने किसी की मदद से जेल के अंदर पर्ची भेजकर भी परिवार और दोस्तों को अपने साथ हुए बर्ताव की जानकारी दी है.
हरिंदर सिंह ने बीबीसी हिंदी को बताया कि याचिका में तीन माँग की गई थी-
पहली, मामले की जाँच सीबीआई जैसी किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए, क्योंकि सबसे गंभीर धाराओं वाली एफ़आईआर 25 में शिकायतकर्ता ख़ुद एसएचओ हैं और अगर शिकायतकर्ता ही उसकी जाँच करेगा, तो वो निष्पक्ष कभी नहीं हो सकती.
दूसरी मांग है कि इस बात की भी स्वतंत्र जाँच हो कि शिव कुमार के साथ टॉर्चर किया गया है और ग़लत तरीक़े से हिरासत में रखा गया. साथ ही पीजीआई चंडीगढ़ में उनका मेडिकल कराने की माँग की गई. तीसरी माँग थी कि वकील और पिता को शिव कुमार से मिलने दिया जाए.
शिव कुमार के वकील हरिंदर सिंह बैंस ने शुक्रवार को बीबीसी को जानकारी दी कि पंजाब हाई कोर्ट ने शिव कुमार का तुरंत चंडीगढ़ के सरकारी मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल में मेडिकल कराने का निर्देश दिया है. साथ ही जेल प्रशासन को कहा है कि वो शिव कुमार को उनके वकील और मां-बाप से मिलने दें.
जाँच के लिए मामला सीबीआई को ट्रांसफ़र करने के लिए हरियाणा सरकार को नोटिस भी जारी किया है. अब 24 फरवरी को नौदीप कौर के केस के साथ शिव कुमार के मामले की भी सुनवाई होगी.
हाई कोर्ट के निर्देश के बाद शनिवार को शिव कुमार को मेडिकल के लिए ले जाया गया.
पुलिस क्या कह रही है?
एसएचओ रवि कुमार के मुताबिक़, 12 तारीख़ को उनके और अन्य पुलिस वालों के साथ मारपीट की गई थी, जिसके सीसीटीवी फुटेज उनके पास हैं. उनका कहना है कि इससे पहले भी इन लोगों के ख़िलाफ़ शिकायतें आईं और 28 दिसंबर को भी एक एफ़आईआर दर्ज हुई थी.
उनके मुताबिक़, शिव कुमार को पहले पूछताछ के लिए 10 दिन की पुलिस रिमांड पर लिया गया था, उसके बाद दो तारीख़ को उन्हें सोनीपत जेल में न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.
एसएचओ रवि कुमार ने बताया कि मामले की जाँच एडिशनल एसएसओ कर रहे हैं, जो उनके जूनियर अधिकारी हैं.
कौन हैं शिव कुमार?
शिव कुमार सोनीपत के देबहु गाँव के रहने वाले हैं. वो दलित समुदाय से ताल्लुक़ रखते हैं.
उनके पिता दिन में खेत में मज़दूरी और रात में एक सरकारी स्कूल में मज़दूरी का काम करते हैं. शिव कुमार की तीन बहनें और एक भाई है. 12वीं की पढ़ाई करने के बाद शिव कुमार ने दो साल का आईटीआई में कोर्स किया और फिर कुंडली इंडस्ट्रियल एरिया में काम करने लगे.
उनके पिता ने बताया कि उनकी एक आँख में 10वीं कक्षा के बाद से समस्या आने लगी थी, उनको एक आँख से दिखना बंद हो गया और दूसरी से भी चश्मे के बिना ठीक से नहीं दिख पाते है. उन्होंने बताया कि शिव कुमार का एम्स में इलाज भी चल रहा है.
शिव कुमार के दोस्त बताते हैं कि वो पहले भी कई आंदोलनों का हिस्सा रहे हैं. उनके एक दोस्त जसमिंदर बताते हैं कि वो 2013 में उनसे एक आंदोलन में ही मिले थे और 2015 में 16 दिन के लिए उनके साथ जेल में रहे थे.
वो बताते हैं, "राइट टू एजुकेशन को लेकर हरियाणा में एक आंदोलन हुआ था. ग़रीब बच्चों के लिए प्राइवेट स्कूलों में कुछ सीटें रिजर्व करने का प्रावधान किया गया, लेकिन कई स्कूल एडमिशन नहीं दे रहे थे. तब हम छात्र थे और छात्र एकता मंच से जुड़े थे. हमने छात्र अभिभावक मंच नाम के संगठन के साथ मिलकर प्रदर्शनों में हिस्सा लिया. इससे कई स्कूलों में ग़रीब बच्चों के एडमिशन होने लगे. लेकिन इससे जुड़े एक प्रदर्शन के दौरान हमें गिरफ़्तार कर लिया गया, हम पर एक स्कूल में आगजनी करने और एक टीचर की साड़ी फाड़ने जैसे आरोप लगा दिए गए. लेकिन बाद में हमें ज़मानत मिल गई और फिर केस का कोई आधार ना होने की वजह से केस बंद हो गया."
जसमिंदर बताते हैं कि इसके बाद हम अलग-अलग आंदोलनों में मिलने लगे. उन्होंने बताया कि एक बार किसान यूनियनों ने जेल भरो का कॉल दिया था, तब भी शिव कुमार दो बार गिरफ़्तार हुए थे.
उनके एक अन्य दोस्त अंकित बताते हैं कि कुंडली इंडस्ट्रियल एरिया में काम शुरू करने के बाद जब शिव कुमार ने मज़दूरों को वहाँ मुश्किल स्थितियों में काम करते देखा, तो 2018 के आख़िर में मज़दूर अधिकार संगठन बनाया.
वो बताते हैं कि लॉकडाउन के दौरान केआईए में फँसे कई मज़दूरों को उन्होंने राशन बाँटा और प्रशासन पर दबाव बनाया, जिससे मज़दूरों को बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश अपने घर भेजने के लिए बसों का इंतजाम किया गया.
वो कहते हैं कि आज भी केआईए की दीवारों पर नारे लिखे मिल जाएँगे कि इस नंबर पर कॉल करके राशन माँगो.
मज़दूर अधिकार संगठन के एक सदस्य राज यादव ने कहा कि कुंडली इंडस्ट्रियल एरिया में कभी भी किसी ट्रेड यूनियन को बढ़ने नहीं दिया गया. जब लेबर कोर्ट के धक्के खाकर मज़दूर थक गए, तो ख़ुद इकट्ठे होकर अपने बकाया पैसे माँगने लगे. संगठन का दावा है कि अब तक 300 मज़दूरों के क़रीब पाँच लाख रुपए दिलवाए गए हैं.
केआईए में काम कर चुके अभिषेक नाम के एक मज़दूर ने बीबीसी को बताया कि मज़दूर अधिकार संगठन की मदद से उन्हें अपने तीन महीने से बकाया 2250 रुपए मिले. वहीं मनजीत ने बताया कि उनको एक कंपनी से उनके बकाया 5000 रुपए संगठन ने दिलाए थे.
ऐसे भी आरोप हैं कि ऐसे धरनों को बढ़ता देख यहाँ कंपनियों की एसोसिएशन ने क्विक रिस्पॉन्स टीम बनाई, जिसमें बाउंसर रखे गए, जो ऐसे धरनों को रोकने का काम करते थे.
लेकिन कुंडली इंडस्ट्रियल एसोसिएशन के अधिकारी इस तरह के आरोपों से इनकार करते हैं. एसोसिएशन के मुताबिक़, कुंडली इंडस्ट्रियल एरिया में मज़दूरों की समस्याओं के समाधान के लिए व्यवस्था है और यहाँ लेबर डिपार्टमेंट का ऑफ़िस भी है.
एफ़आईआर में वसूली के आरोप भी लगाए गए हैं. लेकिन संगठन के सदस्यों का कहना है कि वो मज़दूरों की मेहनत का पैसा दिलाने के लिए काम करते हैं, जिसे वसूली का नाम दिया जा रहा है, जबकि अगर वो वसूली करते, तो उनके परिवार के लोग आज भी मज़दूरी नहीं कर रहे होते.
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