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हरियाणा: बीजेपी मंत्री ने कहा, घर में भी किसान मरते, बाद में मांगी माफ़ी- प्रेस रिव्यू
हरियाणा के कृषि मंत्री का एक वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है.
पत्रकारों से बातचीत के दौरान हरियाणा की मनोहर लाल खट्टर सरकार में कृषि मंत्री जेपी दलाल कह रहे थे कि किसान अपने घरों में होते तब भी मरते.
एक पत्रकार ने उनसे दिल्ली की सीमाओं पर विरोध-प्रदर्शन के दौरान किसानों की मौत को लेकर सवाल पूछा था. इसी के जवाब में दलाल ने कहा कि वे अपने घर पर होते तब भी मरते. हलाँकि बाद में उन्होंने सफ़ाई दी और कहा कि उनके बयान को ग़लत तरीक़े से पेश किया गया है.
द इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में छपी एक ख़बर के अनुसार यह वीडियो शनिवार को भिवानी में हुए कार्यक्रम का है.
इसमें केंद्र सरकार के लागू किए गए कृषि क़ानूनों को लेकर दिल्ली की सीमाओं पर विरोध कर रहे 200 किसानों की मौत पर मीडिया के एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, "ये घर में होते तो भी मरते. यहां नहीं मर रहे हैं क्या? मेरी बात सुन लो लाख दो लाख में से दो सौ छह महीने में नहीं मरते क्या? कोई हार्ट अटैक हो के मर गया, कोई बुख़ार हो के मर गया."
इस वीडियो को दिल्ली की आम आदमी पार्टी ने भी शेयर किया है.
जब कृषि मंत्री से पूछा गया कि दुर्घटना में दस लोगों के मरने पर प्रधानमंत्री शोक ज़ाहिर करते हैं लेकिन किसानों के मामले में ऐसा नहीं है, तो उन्होंने कहा, "ये हादसे में नहीं मरे न, ये स्वेच्छा से मरे हैं. मरे हुए के प्रति पूरी पूरी संवेदनाएं हैं."
हालांकि उनके बयान को लेकर विवाद शुरू होने के बाद उन्होंने माफ़ी मांगी और कहा कि सोशल मीडिया पर उनके बयान को तोड़मरोड़ कर पेश किया जा रहा है.
उन्होंने कहा, "अगर मेरे बयान से किसी की भावनाएं आहत हुई हैं तो मैं उनसे माफ़ी मांगता हूं."
पैंगोंग त्सो में शुक्रवार तक पीछे हट जाएंगे सैनिक
पूर्वी लद्दाख में लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल यानी वास्तविक नियंत्रण रेखा के नज़दीक पैंगोंग लेक इलाक़े से पीछे हटने के लिए भारत और चीनी सेना ने प्रक्रिया शुरू कर दी है, जो शुक्रवार तक पूरी हो जाएगी.
हिंदुस्तान टाइम्स अख़बार के पहले पन्ने पर छपी एक ख़बर के अनुसार दोनों सेनाएं तय प्रक्रिया का पालन कर रही हैं और सैटेलाइट से मिल रही तस्वीरों के अनुसार पैंगोंग त्सो झील के उत्तर में फिंगर 8 से चीनी सेना की भारी गाड़ियां अब पीछे हटती दिख रही हैं.
अख़बार लिखता है कि राजधानी दिल्ली में रक्षा मंत्रालय ने शुक्रवार को डिसइंगेजमेंट प्रक्रिया की समीक्षा की और कहा कि प्रकिया का पूरी तरह पालन हो रहा है और उम्मीद की जा रही है कि 10 फ़रवरी को शुरू हुई इस प्रक्रिया को 19 फरवरी तक पूरा कर लिया जाएगा.
अख़बार के अनुसार सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, "मैं समझता हूं कि उद्देश्य की दिशा में अच्छी प्रगति हो रही है और तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार चीनी सेना पीछे हट रही है."
पैंगोंग त्सो डिसइंगेजमेंट प्रक्रिया के अनुसार चीनी सेना को फिंगर 8 से पूर्व तरफ श्रीजप प्लेन की तरफ बढ़ना है जबकि भारतीय सेना को फिंगर 3 के पास बने धन सिंह थापा पोस्ट तक पीछे हटना है.
फिंगर 4 और फिंगर 8 के बीच के पूरे इलाके को डी-मिलिटराइज़्ड ज़ोन में बदलना है यानी यहां किसी तरह की सैन्य गतिविधि नहीं होगी. इस इलाक़े में सेना की गश्त के लिए बाद में कमांडर स्तर की बातचीत में फ़ैसला लिया जाएगा.
अख़बार लिखता है कि चीनी सेना के टैंक और भारतीय सेना के हथियारों का पीछे हटना शुरू हो गया है कि भीतरी इलाक़ों या सेंट्रल या ईस्टर्न सेक्टर से चीनी सेना के पीछे हटने या फिर उनके सैन्य साजोसामान को पीछे हटाए जाने के संबंध में अब तक कोई सबूत नहीं मिले हैं.
भारतीय रक्षा मंत्रालय के अनुसार पैंगोंग त्सो डिसइंगेजमेंट प्रक्रिया के पूरे होने के बाद भारत गोगरा हॉट स्प्रिंग एरिया और डेपसांग से भी चीनी सेना के पीछे हटने को लेकर बातचीत करेगा.
प्रदर्शन करने का अधिकार असीमित नहीं - सुप्रीम कोर्ट
देश की सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि प्रदर्शन करने के अधिकार की भी सीमाएं हैं और ऐसा नहीं है कि उसका कहीं भी और कभी भी इस्तेमाल किया जा सके.
अख़बार जनसत्ता में छपी एक ख़बर के अनुसार सुप्रीम कोर्ट पिछले साल शाहीन बाग़ में हुए विरोध प्रदर्शनों से जुड़े अपने ही एक आदेश की समीक्षा की मांग कर रही एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी.
जस्टिस संजय किशन कौशल, जस्टिस अनिरुद्ध बोस और जस्टिस कृष्ण मुरारी की बेंच ने सुनवाई के दौरान अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार की व्याख्या करते हुए याचिका को खारिज कर दिया.
कोर्ट ने कहा कि वो आश्वस्त हैं कि जिस आदेश की समीक्षा करने की मांग की गई है उस पर फिर से विचार करने की ज़रूरत नहीं है.
इससे पहले अपने फ़ैसले में कोर्ट ने कहा था कि शाहीन बाग़ में हो रहे विरोध प्रदर्शनों के दौरान सार्वजनिक रास्तों पर कब्ज़ा जमाना स्वीकार्य नहीं है.
कोर्ट ने कहा था कि लंबे समय तक चलने वाले विरोध प्रदर्शन या फिर असहमति जताने के लिए किए जा रहे प्रदर्शन के लिए सार्वजनिक स्थानों पर कब्ज़ा नहीं किया जा सकता और दूसरों के अधिकारों को प्रभावित नहीं किया जा सकता.
कोर्ट का कहना था कि लोगों के पास असहमति व्यक्ति करने और विरोध प्रदर्शन करने का संवैधानिक अधिकार है लेकिन उसमें कुछ कर्तव्य भी शामिल हैं.
जम्मू कश्मीर जाएगा विदेशी नेताओं का प्रतिनिधिमंडल
विदेशी नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल के लिए एक बार फिर केंद्र सरकार जम्मू कश्मीर का दौरा आयोजित कर सकती है. ये ख़बर छापी है टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने.
अख़बार के अनुसार इस दौरे की योजना पर फिलहाल काम जारी है लेकिन उम्मीद की जा रही है इसमें यूरोपीय यूनियन के देशों के नेता समेत खाड़ी देशों के नेता शामिल हो सकते हैं.
अख़बार लिखता है कि प्रतिनिधिमंडल के सदस्य हाल में जिला विकास काउंसिल के चुनाव में जीते नेताओं से भी मुलाक़ात कर सकते हैं.
5 अगस्त 2019 को जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के बाद से अब तक विदेशी नेताओं के दो प्रतिनिधिमंडल जम्मू कश्मीर का दौरा कर चुके हैं.
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