हाथरस मामला: दो डॉक्टरों का दावा मीडिया से बात करने पर नौकरी से हटाया गया- प्रेस रिव्यू

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के दो डॉक्टरों का आरोप है कि हाथरस के कथित गैंगरेप मामले में अनाधिकारिक तौर पर मीडिया से बात करने की वजह से उन्हें नौकरी से हटा दिया गया है.
द हिंदू की ख़बर के मुताबिक, एएमयू के अधिकारियों का कहना है कि यह एक रूटीन मामला है, इसका हाथरस केस से कोई लेना-देना नहीं है.
बतौर कैज़ुअल्टी मेडिकल ऑफ़िसर कार्यरत रहे डॉ. मोहम्मद अज़ीमुद्दीन मलिक और उनके सहकर्मी डॉ. ओबैद इम्तियाज़ुल हक़ का आरोप है कि कुलपति तारिक़ मंसूर ने उनकी नौकरी छीन ली है.
सीएमओ-इंचार्ज एस.ए.एच ज़ैदी के हस्ताक्षर वाले पत्र में स्पष्ट तौर पर लिखा है कि कुलपति ने बतौर इमरजेंसी और ट्रामा मेडिकल ऑफिसर, उनकी नियुक्ति को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया है.
डॉ. मलिक ने बताया कि हाथरस मामले में फॉरेंसिक रिपोर्ट पर उनका बयान मीडिया में छपने के बाद उनसे लिखित जवाब मांगा गया था.

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कोरोना वैक्सीन सबसे पहले किन लोगों को मिलेगी
भारत में कोरोना वायरस की वैक्सीन आने के बाद सबसे पहले किसे वैक्सीन मिलेगी इसकी चर्चा खूब हो रही है. दुनियाभर में लोग कोरोना की सफल वैक्सीन का इंतज़ार कर रहे हैं.
इस बीच केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों ने बताया कि इस महामारी से निपटने के लिए पहले चरण में करीब तीन करोड़ लोगों को वैक्सीन दी जाएगी. इनमें फ्रंटलाइन में कोविड-19 से लड़ रहे स्वास्थ्यकर्मियों समेत बाकी कर्मचारी भी शामिल हैं.
हिंदुस्तान टाइम्स की ख़बर के मुताबिक, केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण ने मंगलवार को बताया कि तीन करोड़ लोगों में 70 लाख डॉक्टर और पैरा-मेडिकल स्टाफ के लोग शामिल होंगे. इनके अलावा दो करोड़ अन्य स्वास्थ्य कार्यकर्ता भी शामिल होंगे.
वैक्सीन देने के पहले चरण की समय सीमा जनवरी 2021 से जून 2021 तय की गई है.
स्वास्थ्य सचिव ने बताया कि कई निजी अस्पताल यह दावा कर रहे हैं कि उनके पास कोविड वैक्सीन के स्टोरेज की सुविधा उपलब्ध है, इसलिए सरकार ऐसे निजी अस्पतालों से भी बातचीत कर रही थी.
उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के पास भी ऐसी सुविधा उपलब्ध है, जिसके बारे में बहुत से लोगों को जानकारी नहीं है. मंत्रालय उनका भी इस्तेमाल वैक्सीन स्टोरेज के लिए करेगा.

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विदेश से माओवादी किताबें और वीडियो लाए थे तेलतुंबड़े: एनआईए
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने यलगार परिषद मामले में दायर की गई चार्जशीट में आरोप लगाया है कि पूर्व आईआईटी प्रोफ़ेसर आनंद तेलतुंबडे ने 'विदेश की अकादमिक यात्राओं' की आड़ में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में हिस्सा लिया और वहां से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के सदस्यों को दिखाने के लिए "विचारधारा, रणनीति और हथियारों" से संबंधित प्रतिबंधित किताबें और वीडियो लेकर आए.
आनंद तेलतुंबडे पहले आईआईटी-खड़गपुर और फिर गोवा इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट में पढ़ाते थे. 14 अप्रैल को उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया था.
द इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के मुताबिक, उन पर अपने छोटे भाई मिलिंद तेलतुंबडे को भी इस दिशा में प्रेरित करने का आरोप है और उनका नाम चार्जशीट में सीपीआई (माओवादी) के शीर्ष संचालकों और भगोड़े के तौर पर दर्ज है.
चार्जशीट में यह भी आरोप लगाया गया है कि आनंद तेलतुंबडे विदेश यात्राओं से जो किताबें और वीडियो लाते थे वो माओवादियों की ट्रेनिंग, हमलों और हमलों की रणनीति बनाने के अलावा नए लोगों की भर्ती को लेकर भी काफ़ी काम आते थे.

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पंजाब ने कृषि क़ानून के ख़िलाफ़ पास किया बिल
केंद्र सरकार की ओर से लाए गए कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ पंजाब विधानसभा ने एक बिल पारित किया है. केंद्र सरकार की ओर से बनाए गए नए कृषि क़ानून के ख़िलाफ़ ऐसा करने वाला पंजाब पहला राज्य है.
द टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक, सदन ने तीन खेती संशोधन बिलों के अलावा ढाई एकड़ तक की ज़मीन की कुर्की से किसानों को राहत देने के लिए सीपीसी में संशोधन करने के बिल को भी ध्वनिमत से पास कर दिया.
केंद्र सरकार ने हाल ही में तीन कृषि बिल संसद में पेश किए थे जो दोनों सदनों से पास होने के बाद क़ानून बन चुके हैं.
हालांकि देशभर के किसान इन कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतरे और विरोध जताया.
पंजाब के किसानों ने रेल रोको आंदोलन से लेकर सड़क जाम करके भी विरोध जताया. कई जगहों पर किसान अब भी प्रदर्शन कर रहे हैं.
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