अग्रिम ज़मानत की याचिका पर सुनवाई से पहले ही जेल जा चुका था पति, 45 दिन बाद पहुँचा मामला अदालत के सामने

प्रकाशित

सुप्रीम कोर्ट में एक केस के लिस्ट होने में देरी के कारण एक व्यक्ति को जेल जाना पड़ा.

दरअसल, तमिलनाडु के एक व्यक्ति ने 27 अगस्त को अग्रिम ज़मानत के लिए एक स्पेशल लीव पेटिशन दायर की थी जो सुनवाई के लिए अदालत में 45 दिन बाद पहुँची. सुप्रीम कोर्ट भी इस देरी से हैरान है.

अदालत ने कहा है कि इस व्यक्ति को इस केस में गिरफ़्तार ही नहीं किया जा सकता.45 दिनों के इंतज़ार के बाद इस याचिकाकर्ता के केस की सुनवाई, बीते शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एएम खानविलकर की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने हुई.

अदालत ने केस की सुनवाई में हुई देरी पर कहा, "ये क्या है? सिर्फ़ इसलिए कि वो अपनी पत्नी के साथ केस सुलझा नहीं पाया, उसे गिरफ़्तार कर लेना चाहिए?"

याचिकाकर्ता एडविन जयकुमार के वकील बी करुनाकरन ने अदालत से कहा कि उनके मुव्वकिल को गिरफ़्तारी से बचाया जाए.अदालत ने ऑर्डर पास करते हुए कहा जयकुमार की पत्नी और तमिलनाडु के मनाप्पाराई के पुलिस अधिकारियों को नोटिस जारी किया. इसी थाने में याचिकाकर्ता के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज है.

करुनाकरन ने अदालत को बताया कि उनके मुव्वकिल को तो पहले ही गिरफ़्तार कर लिया गया है.

करुनाकरन ने कहा, "मैंने ये याचिका 27 अगस्त को डाली थी. लेकिन ये आज, 16 अक्टूबर को सुनवाई के लिए पेश हुई है. मेरे मुव्वकिल पहले से ही जेल में हैं. मैं अदालत से दरख़्वास्त करता हूँ कि वो आदेश दें कि अग्रिम ज़मानत के मामलों को तुरंत लिस्ट किया जाए.

याचिकाकर्ता के वकील का ये भी कहना था कि उनका अग्रिम ज़मानत फ़ाइल करना किसी काम नहीं आया इसलिए अदालत से गुज़ारिश है कि वो भविष्य में ऐसे मामलों के लिए उचित दिशा-निर्देश जारी करें.

क्या है अग्रिम ज़मानत

अग्रिम ज़मानत तब ली जाती है जब अभियुक्त को किसी अपराध में गिरफ़्तारी का डर हो. ज़मानत एक क़ानूनी राहत होती है. इससे अभियुक्त को उस वक़्त तक के लिए अस्थायी स्वतंत्रता मिल जाती है जब तक मामला पूरी तरह निपट ना जाए.

अग्रिम ज़मानत का इस्तेमाल मुख्य रूप से दहेज संबंधित, घरेलू हिंसा आदि मामलों में राहत के लिए किया जाता है.

अग्रिम ज़मानत की अवधारणा इस तथ्य पर आधारित है कि कोई ग़ैर-ज़मानती अपराध होने पर अगर किसी शख़्स को गिरफ़्तारी की आशंका हो तो वो न्यायालय में आवेदन करके उस संभावित परेशानी से बच सके जो गिरफ़्तारी के कारण हो सकती है.

अग्रिम ज़मानत के आवेदन पर विचार करते समय न्यायालय इस बात पर भी विचार करता है कि कहीं ज़मानत मंज़ूर किये जाने के बाद अभियुक्त आज़ादी का दुरुपयोग तो नहीं करेगा.

अग्रिम ज़मानत शख़्स की गिरफ़्तारी के पहले होती है. धारा 438 के तहत केवल सत्र न्यायालय और उच्च न्यायालय को ही अग्रिम ज़मानत देने का अधिकार है.

ये भी पढ़ें

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)