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भारत में सरकार और सेना के संबंध कई मुश्किल दौर से गुज़रे हैं
- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 11 मिनट
अभी भी ये सवाल अक्सर पूछा जाता है कि एक विकासशील देश कैसे एक ऐसी सेना का निर्माण करे जिससे लोकतंत्र को कोई ख़तरा न हो? क्या असैनिक सरकार सेना पर नियंत्रण रखते हुए उसकी प्रभावशीलता को उच्चतम सीमा तक पहुंचा सकती है?
इसको भारतीय लोकतंत्र की एक सफलता माना जाएगा कि दस लाख से भी अधिक बड़ी सेना होने, कई युद्धों में भाग लेने और कई आंतरिक मोर्चों पर इस्तेमाल किए जाने के बावजूद सेना ने ज़ाहिरी तौर पर कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा दिखाने से परहेज़ किया है. लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि सरकार और सेना के संबंध हमेशा सौहार्दपूर्ण रहे हैं.
नेहरू नहीं बनाना चाहते थे करियप्पा को सेनाध्यक्ष
जवाहरलाल नेहरू ने करियप्पा को पहला भारतीय सेना प्रमुख नियुक्त किया लेकिन करियप्पा नेहरू की पहली पसंद नहीं थे. ऐसे विवरण मिलते हैं कि पहले उन्होंने नत्थू सिंह और फिर राजेंद्र सिंहजी को इस पद की पेशकश की थी लेकिन दोनों ने ये कहते हुए इस पद को अस्वीकार कर दिया था कि वो करियप्पा से जूनियर थे.
आज़ादी के बाद सेनाध्यक्ष के कार्यकाल पर बनाई गई नीति से नेहरू के लिए कई समस्याएं उठ खड़ी हुई थीं. पहले सेनाध्यक्ष का कार्यकाल 4 वर्ष रखा गया जिसे घटाकर बाद में तीन वर्ष कर दिया गया. नतीजा ये हुआ कि कई सेनाप्रमुख बहुत कम आयु में रिटायर हो गए.
नत्थू सिंह 51, करियप्पा 53 और थोरट और थिमैया सिर्फ़ 55 साल की उम्र में रिटायर कर दिए गए. स्टीवेन विलकिंसन अपनी किताब 'आर्मी एंड द नेशन' में लिखते हैं, 'ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि नेहरू को डर था कि अपने पद पर अधिक दिनों तक रहने वाले सेनाध्यक्ष कहीं अपनेआप को अधिक निश्चिंत न समझने लगें और उनमें राजनीतिक महत्वाकाँक्षाएं न विकसित हो जाएं.'
एक और पूर्व मेजर जनरल वी के सिंह ने भी अपनी किताब 'लीडरशिप इन इंडियन आर्मी' में लिखा है, 'ये फ़ैसला दुर्भाग्यपूर्ण था क्योंकि इसने सेना के चोटी के नेतृत्व को उस उम्र में उनके पद से हटा दिया जब उनमें देश को देने के लिए बहुत कुछ बाकी था और नेहरू को उनके अनुभव से फ़ायदा मिल सकता था. दिलचस्प बात ये थी कि ये नियम न तो नौकरशाही पर लागू हुआ और न ही वायुसेना या नौसेना पर. इसके बावजूद करियप्पा और नत्थू सिंह ने राजनीति में आकर चुनाव लड़ने की कोशिश की और दोनों ही चुनाव में पराजित हुए.'
नेहरू के सलाहकारों की योग्यता पर सवाल
नेहरू ने अपना बहुत समय वैश्विक मामलों पर दिया और घरेलू मामलों पर उनका ध्यान कम गया. इसकी तुलना में चीन के नेता माओ से तुंग ने अपने देश के बाहर एक या दो बार ही कदम रखा और विदेशी मामलों की पूरी ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री चू एन लाई को दी.
1962 के भारत चीन के युद्ध के बाद दुनिया में चीन की कूटनीतिक साख बढ़ी जबकि विदेशी मामलों को तरजीह देने वाले नेहरू की साख कम हुई. स्टीवेन विलकिंसन अपनी किताब 'आर्मी एंड द नेशन' में लिखते हैं, 'नेहरू के नेतृत्व में एक और कमी थी. उन्होंने अपने सलाहकारों को ढंग से नहीं चुना.
उनके सबसे नज़दीकी सलाहकार थे कृष्ण मेनन, जनरल थापर और बिजी कौल जो देश की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे. नेहरू ने इंटिलेंजेंस ब्यूरो के प्रमुख बी एन मलिक पर भी कुछ ज़्यादा ही विश्वास किया. शायद इसकी वजह सेना पर असैनिक नियंत्रण को मज़बूत करना था. नतीजा ये रहा कि भारतीय सेना चीन के साथ लड़ाई के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं थी. उसके पास उपयुक्त ख़ुफ़िया जानकारी का अभाव था और वो इसके लिए पूरी तरह से मलिक के आकलन पर निर्भर थी.'
लाल बहादुर शास्त्री को ग़लत सलाह
लाल बहादुर शास्त्री के शासनकाल में 1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ था. इस लड़ाई में पाकिस्तान के हमले पर तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल चौधरी ने ब्यास नदी से बड़ी संख्या में भारतीय सैनिक पीछे बुलाने का आदेश दिया था.' लड़ाई खत्म होने के अंतिम चरण में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने जनरल चौधरी से पूछा था कि क्या लड़ाई जारी रखने से भारत को फ़ायदा होगा ?
उस समय रक्षा मंत्री यशवंतराव चव्हाण के सचिव और बाद में भारत के गृह सचिव बने आर डी प्रधान अपनी किताब '1965 वॉर द इनसाइड स्टोरी' में लिखते हैं, 'जनरल चौधरी ने अपने मातहतों से सलाह मशवरा किए बगैर प्रधानमंत्री को गलत सलाह दी कि भारत के हथियारों का भंडार कम होता जा रहा है और उसके कई टैंक बर्बाद हो गए हैं. जबकि स्थिति इसके ठीक उलट थी. पाकिस्तान का नुक़सान भारत से कहीं ज़्यादा हुआ था. चौधरी की सलाह मानते हुए भारत ने पाकिस्तान द्वारा प्रस्तावित युद्ध विराम स्वीकार कर लिया था. कुछ रक्षा समीक्षकों ने इसे 1965 की लड़ाई की सबसे बड़ी ग़लती बताया था.'
सेना के आपसी विवादों को राजनीतिक नेतृत्व ने किया नज़रअंदाज़
इस लड़ाई में कई बार भारतीय वायुसेना ने अपने ही सैनिकों पर बम गिराए थे और फ्रेंडली फ़ायर यानी अपने लोगों को गोली लगने के भी कई उदाहरण देखने को मिले थे. अनित मुखर्जी अपनी किताब 'द एबसेंट डायलॉग' में बताते हैं कि 'अंतरसेना विवादों को सुलझाने में तत्कालीन सरकार ने न तो कोई दिलचस्पी दिखाई और न ही सेनाओं को सामंजस्य के साथ काम करने के लिए बाध्य किया.'
अरजान तारापोर ने 1965, 1971 और भारत के श्रीलंका ऑपरेशन पर ख़ासा काम किया है. वो अपने लेख 'स्ट्रैटेजीज़ ऑफ़ स्टालमेट एक्सप्लेनिंग इंडियाज़ मिलिट्री एफ़ेक्टिवनेस' में लिखते हैं, 'असैनिक नेतृत्व की सबसे बड़ी असफलता थी इस बात पर ध्यान न देना कि सैनिक कार्रवाई से देश के राजनीतिक लक्ष्यों को किस तरह पूरा किया जा सकता है.' एक और सैनिक इतिहासकार श्रीनाथ राघवन का मानना है कि 'सैनिक मामलों में राजनेताओं के दिलचस्पी न लेने और सूक्ष्म सवाल न पूछने की वजह से 1965 की लड़ाई बिना किसी फ़ैसले के समाप्त हुई.'
ये बात किसी से छिपी नहीं है कि सेनाध्यक्ष जनरल चौधरी और लेफ़्टिनेंट जनरल हरबख़्श सिंह के बीच सेना ऑपरेशन को लेकर काफ़ी मतभेद थे लेकिन राजनीतिक नेतृत्व ने मतभेदों को पाटने की कोई कोशिश नहीं की.
1971 में सेना के सामने ढाका पर कब्ज़ा करने का लक्ष्य ही नहीं रखा गया
1971 की लड़ाई में पिछले अनुभवों से सबक लेते हुए डी पी धर को नीति नियोजन समिति का अध्यक्ष बनाया गया जिनकी मुख्य भूमिका थी कूटनीतिक और सैनिक कार्रवाई के बीच सामंजस्य बैठाना. उनका काम उनके और थलसेनाध्यक्ष सैम मानेकशॉ के बीच बेहतरीन संबंधों की वजह से और आसान हो गया. दोनों ने 1947- 48 के कश्मीर युद्ध में भी साथ काम किया था. लेकिन इस सबके वावजूद 1971 की लड़ाई भी विवादों से अछूती नहीं रह सकी.
पूर्वी कमान के चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ जनरल जे एफ़ आर जेकब ने बीबीसी को बताया था कि 'सेना मुख्यालय ने ढाका पर कब्ज़ा करने का लक्ष्य ही नहीं बनाया था. उनका सिर्फ़ एक ही लक्ष्य था पूर्वी पाकिस्तान के एक बड़े इलाके पर कब्ज़ा करना ताकि वहां पर बांगलादेश की निर्वासित सरकार को पदासीन किया जा सके.' 1971 युद्ध का आधिकारिक इतिहास लिखने वाले एस एन प्रसाद लिखते हैं कि 'दुघर्टनावश या किसी वजह से भारत की युद्ध योजना लीक हो गई थी और पाकिस्तान के हाथ पड़ गई थी. इसलिए पाकिस्तानियों ने उसी के अनुसार अपनी रक्षण नीति बनाई जिसमें ढाका के रक्षण के लिए उन्होंने बहुत संसाधन नहीं रखे जिसका बाद में भारतीय सेना को फ़ायदा भी मिला.'
एयर चीफ़ मार्शल पी सी लाल का विरोध
1971 युद्ध के आधिकारिक इतिहास में भी ये स्वीकार किया गया है कि 'आख़िर तक भारतीय सेना के पास ढाका पर कब्ज़ा करने के आदेश नहीं थे. 11 दिसंबर, 1971 को कहीं जा कर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तीनों सेना प्रमुखों को ढाका पर कब्ज़ा करने के लिखित आदेश दिए.' पश्चिमी मोर्चे पर ऑपरेशनल स्पष्टता न होने और रणनीतिक योजना पर भ्रम की स्थिति के कारण छंब इलाके में भारत को काफ़ी ज़मीन गंवानी पड़ी थी. लड़ाई के बाद इंदिरा गांधी ने माउंटबेटन की सलाह पर अमल करते हुए चीफ़ ऑफ़ डिफेंस स्टाफ़ नियुक्त करने के बारे में गंभीरता से सोचा था.
जनरल मानेकशॉ ने इस पद के लिए अपना दावा पेश किया. लेकिन एयर चीफ़ मार्शल पी सी लाल ने इसका भारी विरोध किया. स्टीवेन विलकिन्सन अपनी किताब 'आर्मी एंड द नेशन' में लिखते हैं, 'पी सी लाल के विरोध से राजनेताओं और नौकरशाहों की जान में जान आई क्योंकि वो पहले से स्थापित कमांड और कंट्रोल व्यवस्था को छेड़ने में झिझक रहे थे. वो सेना को राजनीतिक रूप से इतनी ताकत नहीं देना चाहते थे जिसकी वजह से सेना पर सरकार का नियंत्रण कम हो जाए. नतीजा ये हुआ कि सैम मानेकशॉ को ये पद नहीं मिल सका.'
वरिष्ठ होते हुए भी जनरल एस के सिन्हा की अनदेखी की गई
जनरल कृष्णा राव के रिटायर होने के बाद जनरल एस के सिन्हा सबसे वरिष्ठ जनरल थे लेकिन उनकी जगह इंदिरा गांधी ने जनरल ए एस वैद्य को नया सेनाध्यक्ष बनाया. बाद में कुछ हल्कों में कहा गया कि ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि जनरल सिन्हा जयप्रकाश नारायण के बहुत क़रीब थे.
जनरल एस के सिन्हा ने अपनी आत्मकथा 'चेंजिंग इंडिया - स्ट्रेट फ़्रॉम हार्ट' में लिखा है, 'एक बार मैं पटना से दिल्ली हवाई जहाज़ से सफ़र कर रहा था. इत्तेफ़ाक से जेपी की सीट मेरे बग़ल में थी. हम लोग बातें करने लगे. मैं उन्हें पहले से जानता था. जब वो उतरने लगे, तो मैंने उनका ब्रीफ़केस उनके हाथों से ले लिया.'
जनरल सिन्हा ने आगे लिखा, 'जे पी ने मना भी किया कि ये अच्छा नहीं लगेगा कि वर्दी पहने एक जनरल मेरा ब्रीफ़केस ले कर चले. मैंने कहा मैं जनरल होने के साथ साथ आपका भतीजा भी हूँ. वो मुस्कराए और उन्होंने अपना ब्रीफ़केस मुझे पकड़ा दिया. जब हम हवाईअड्डे से बाहर आए तो मैंने वो ब्रीफ़केस जेपी को लेने आए एक शख़्स को पकड़ा दिया और उन्हें सेल्यूट कर उनसे विदा ली.
अगले दिन जब मैं तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल टीएन रैना से मिलने गया तो उन्होंने मुझसे कहा कि मुझे बताया गया है कि आप जेपी के बहुत नज़दीक हैं. एक अन्य मौके पर तत्कालीन वायुसेनाध्यक्ष ने जेपी का ज़िक्र करते हुए मुझसे पूछा था क्या कि वो बुड्ढ़ा आदमी अभी तक ज़िंदा है? मुझे उनका पूछने का ढंग और भाषा अच्छी नहीं लगी थी. मैंने तुरंत कहा कि ईश्वर की कृपा से भारत का महानतम व्यक्ति अभी भी जीवित है.'
इस बेबाकी का जनरल सिन्हा को नुक़सान उठाना पड़ा जब समय आने पर उनकी अनदेखी की गई. सिन्हा ने एक मिनट का समय न ज़ाया करते हुए अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया.
जनरल सुंदरजी ने राजीव गाँधी का विश्वास खोया
राजीव गांधी के समय में अरुण सिंह रक्षा राज्य मंत्री थे. उनके अपने तीनों सेनाप्रमुखों जनरल के सुंदरजी, एडमिरल तहिलियानी और एयर चीफ़ मार्शल डेनिस ला फ़ोनटेन से बेहतरीन संबंध थे. इसका परिणाम ये हुआ कि नौकरशाही को लगने लगा कि उसको पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा है.
पाकिस्तानी सीमा पर 'ब्रासस्टैक्स' युद्धाभ्यास से भारत की रक्षा मामलों पर निर्णय लेने की क्षमता में कई कमियां देखी गईं. कुछ लोगों ने तो यहाँ तक कहा कि इस बारे में प्रधानमंत्री राजीव गांधी तक को विश्वास में नहीं लिया गया. जनरल सुंदरजी को कई लोग भारत के बेहतरीन, महत्वाकांक्षी और विवादास्पद जनरल की संज्ञा देते हैं.
1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान जनरल सुंदरजी ने पश्चिमी कमान के प्रमुख के तौर पर सरकार से वादा किया कि ये ऑपरेशन एक दिन में पूरा हो जाएगा लेकिन इसे पूरा होने में तीन दिन लगे और सेना को टैंकों तक का इस्तेमाल करना पड़ा. उसी तरह 1987 में भी उन्होंने एलटीटीई की लड़ाकू क्षमता का कम अंदाज़ा लगाया और ये दावा किया कि भारतीय सेना उन पर दो हफ़्ते में नियंत्रण पा लेगी. भारतीय सेना एलटीटीई पर कभी नियंत्रण नहीं पा सकी. इन्ही कारणों की वजह से राजीव गाँधी का जनरल सुंदरजी से विश्वास उठ गया.
बाद में ए जी नूरानी ने फ़्रंटलाइन पत्रिका में लिखे लेख 'शॉकिंग डिस्क्लोज़र्स' में लिखा, 'जनरल दीपेंदर सिंह के अनुसार सामान्य दिनों में भी सेनाध्यक्ष और प्रधानमंत्री के बीच तालमेल की कमी अवाँछित हैं लेकिन अगर आपात स्थिति में ऐसा हो तो हालात और गंभीर हो जाते हैं. मुझे नहीं पता कि प्रधानमंत्री और सुंदरजी के बीच ऐसे हालात क्यों पैदा हुए. मुझे इतना पता है कि जब मैंने सुंदरजी से पूछा कि हमारे दृष्टिकोण को प्रधानमंत्री के सामने क्यों नहीं ढंग से रखा जा रहा तो उनका जवाब था, 'वो सुनता ही नहीं.''
कारगिल युद्ध में वाजपेई ने लगाई सेना पर बंदिशें
अटल बिहारी वाजपेयी ने सत्ता में आने के कुछ दिनों के भीतर ही भूमिगत परमाणु परीक्षण के आदेश दिए लेकिन इसके बारे में तीनों सेना प्रमुखों को अंतिम क्षण पर जानकारी दी गई. उनके ही कार्यकाल में वाइस एडमिरल हरिंदर सिंह को उपनौसेनाध्यक्ष बनाने के मुद्दे पर सरकार का विरोध करने के लिए नौसेनाध्यक्ष एडमिरल भागवत को बर्ख़ास्त कर दिया गया.
कारगिल युद्ध के दौरान वाजपेई के नियंत्रण रेखा न पार करने के आदेश की वजह से भारतीय सेना को बहुत नुक़सान उठाना पड़ा. पी आर चारी और स्टीफ़ेन कोहेन अपनी किताब 'फ़ोर क्राइसेस एंड पीस प्रोसेस' में लिखते हैं, 'शुरू मे सेना प्रमुखों ने इन बंदिशों का पालन किया लेकिन जैसे जैसे लड़ाई आगे बढ़ी उनके अपने ही अफ़सर इसकी आलोचना करने लगे और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड ने भी उन पर दबाव डालना शुरू कर दिया. लेकिन वाजपेयी ने तब भी अपना फ़ैसला बदला नहीं. लेकिन तोलोलिंग की लड़ाई जीतने के बाद उन पर नियंत्रण रेखा पार करने का दबाव कम पड़ गया.'
सियाचिन को सुलझाने में सेना ने नहीं दिया सरकार का साथ
मनमोहन सिंह के ज़माने में भारत और पाकिस्तान सियाचिन के मुद्दे को सुलझाने के काफ़ी नज़दीक आ गए थे लेकिन सेना के विरोध के कारण इसका समाधान नहीं पाया जा सका. ए जी नूरानी फ़्रंटलाइन पत्रिका में छपे अपने लेख 'टॉकेटिव जनरल्स' में लिखते हैं, सेना के विरोध का पूर्वानुमान लगाते हुए मनमोहन सिंह ने उन सभी जनरलों को आमंत्रित किया जिन्होंने सियाचिन में कभी न कभी सैनिकों को कमांड किया था. उन्होंने उनसे सियाचिन के विसैन्यीकरण पर उनके विचार माँगे.
इस बैठक में जनरल जेजे सिंह ने सरकार की पहल का विरोध किया और इस संवेदनशील मुद्दे के समाधान की सारी कोशिशों पर पानी फेर दिया. श्याम सरन अपनी किताब 'कौटिल्य टू द 21 सेंचुरी : हाउ इंडिया सीज़ द वर्ल्ड' में लिखते हैं, 'शुरू में जनरल जे जे सिंह इस प्रस्ताव के समर्थन में थे लेकिन जब उन्होंने देखा कि मंत्रिमंडल के कुछ सदस्य और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम के नारायणन इसका विरोध कर रहे हैं तो उन्होंने अपना रुख़ बदल दिया.'
वर्ष 2012 में तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह के जन्म सर्टिफ़िकेट के मामले ने बहुत तूल पकड़ा था. वो इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले कर गए लेकिन जब कोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया तो उन्होंने केस वापस ले लिया. अपना कार्यकाल समाप्त होने के बाद वो राजनीति में आ गए और उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा और मोदी मंत्रिमंडल में मंत्री भी बने.
सेना के राजनीतीकरण की शिकायत
नरेंद्र मोदी के ज़माने में दो दो जनरलों- प्रवीण बख़्शी और पी एम हरीज़ की वरिष्ठता को नज़रअंदाज़ करके जनरल विपिन रावत को सेनाध्यक्ष बनाया गया. यहीं नहीं जब उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया तो उन्हें भारत का पहला चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ बना दिया गया. अभी तक ये परंपरा चलती आई है सेना में काम कर रहा कोई जनरल राजनीतिक बयानों से अपनेआप को बचाता है. लेकिन कई जनरलों ने अपने कार्यक्षेत्र से बाहर जा कर सरकार के फैसलों के समर्थन में खुलेतौर पर अपनी राय ज़ाहिर की है.
टीकाकारों का मानना है कि इस बयानबाज़ी से सेना की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं जिसे आजादी के 73 सालों बाद भी भारतीय सेना ने करीने से सहेज कर रखा है. 2019 के बालाकोट हमले के बाद चुनाव आयोग ने सभी राजनीतिक दलों को पत्र भेज कर अनुरोध किया था कि चुनाव प्रचार में सैनिक चित्रों और प्रतीकों का इस्तेमाल नहीं किया जाए. लेकिन ज़मीनी स्तर पर इसका कोई ख़ास प्रभाव देखने में नहीं आया. एक मुख्यमंत्री ने तो भारतीय सेना को मोदी की सेना तक की संज्ञा दे डाली थी.
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