सरकार ने कश्मीरियों को दो महीने तक एलपीजी सिलिंडर स्टोर करने का आदेश क्यों दिया?

    • Author, माजिद जहाँगीर
    • पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए
  • प्रकाशित

भारत-चीन सीमा विवाद के बीच केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर प्रशासन के ज़रिए निकाले गए दो आदेश के कारण आम नागरिकों में घबराहट और चिंता का माहौल पैदा हो गया है.

आदेश में तेल कंपनियों से एलपीजी सिलिंडर को स्टॉक करने के लिए कहा गया है, इसके साथ ही स्कूल की इमारतों को ख़ाली कराने के भी आदेश दिए गए हैं.

जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक दलों ने भी इस फ़ैसले पर आपत्ति जताई है.

पहला आदेश खाद्य, नागिरक आपूर्ति एंड उपभोक्ता विभाग के निदेशक ने जारी किया है, जिसमें तेल कंपिनयों को कहा गया है कि वो बॉटलिंग प्लांट्स और गोदाम में एलपीजी का इतना स्टॉक जमा कर लें कि दो महीने तक काम चल सके.

दूसरा आदेश गंदरबल के ज़िला पुलिस अधीक्षक ने निकाला है. एसपी ने मिडिल एंड हाईस्कूल समेत ज़िले के 16 शैक्षणिक संस्थानों को ख़ाली करने के आदेश दिए हैं.

गंदरबल के एसी मोहम्मद ख़लील पोसवाल ने बीबीसी को बताया कि हर साल होने वाले अमरनाथ यात्रा की वजह से ऐसा किया गया है.

उनके अनुसार यात्रा की सुरक्षा इंतज़ाम के लिए इस तरह की जगह की ज़रूरत है.

उनका कहना था, "केवल ऑफ़िस के लिए निकाले गए इस आदेश को ज़िला उपायुक्त के दफ़्तर में से किसी ने इसको सोशल मीडिया पर डाल दिया है. अगर अमरनाथ यात्रा होती है तो हमें आपात स्थिति में इस तरह की जगहों की ज़रूरत होती है. सेना की ज़रूरतों को लेकर रोज़ाना कई तरह के पत्राचार होते रहते हैं. लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि कोई चिंता की बात है."

उनका आगे कहना था, "यह हर साल होता है, ये कोई पहली बार नहीं होने जा रहा है. सेना के लिए हम जगहों की तलाश करते रहते हैं. यात्रा के समय हमें जहां जगह मिलती है वहां सुरक्षाकर्मियों के ठहरने का इंतज़ाम करते हैं."

गंदरबल ज़िला लद्दाख के करगिल से क़रीब है.

नियमित आदेश

उसी तरह खाद्य, नागरिक आपूर्ति एंड उपभोक्ता विभाग के निदेशक बशीर अहमद ख़ान ने कहा कि इस तरह का आदेश निकालना एक नियमित कार्यक्रम है.

उनका कहना था, "अगर इस तरह का आदेश जारी किया गया है तो इसमें बुराई क्या है. इसमें घबराने वाली कोई बात नहीं है. इस तरह की बैठकें होती रहती हैं और आदेश निकाले जाते रहते हैं. हम कंपनियों को इस तरह के आदेश देते रहते हैं. श्रीनगर-जम्मू राष्ट्रीय राजमार्ग जहां सर्दी के मौसम में भू-स्खलन होते रहते हैं, वहां हम गर्मी के मौसम में भू-स्खलन होते देख रहे हैं, इसलिए एलपीजी, केरोसिन और दूसरी ज़रूरत की चीज़ों को जमा करने के लिए कहा जा रहा है.''

धारा 370 ख़त्म करने और बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक से पहले भी इसी तरह के आदेश जारी किए गए थे, इसीलिए कश्मीर के लोगों में बेचैनी बढ़ गई है.

उस समय भी सरकार ने यही कहा था कि ये सब रूटीन मामला है और आम नागरिक को घबराने की ज़रूरत नहीं. उस समय राज्य के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने कहा था, ''आप कृपया करके अफ़वाहों पर ध्यान न दें.''

शायद इसीलिए इस बार राजनीतिक दलों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है और सरकार से इन आदेशों के बारे में सफ़ाई देने को कहा है.

पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ़्रेंस के उपाध्यक्ष ने एक ट्वीट कर कहा, ''सरकार के आदेश से लोगों में घबराहट बढ़ गई है और दुर्भाग्य से पिछले साल के झूठ और ग़लत आश्वासन के बाद अब अगर सरकार इस बार इन आदेशों के बारे में सफ़ाई भी देगी तो शायद ही हममें से कोई इन पर भरोसा करेगा. लेकिन इसके बावजूद सरकार को इन आदेशों के बारे में सफ़ाई देनी चाहिए.''

नागरिकों में बेचैनी

पूर्व विधायक और सीपीएम के राज्य सचिव एमवाई तारिगामी ने कहा कि इस तरह के आदेश ने लोगों में बेचैनी पैदा कर दी है.

उनका कहना था, ''इन आदेशों के बारे में कई तरह के क़्यास लगाए जा रहे हैं. लद्दाख में भारत-चीन सीमा पर जो कुछ अभी चल रहा है, उसके बीच अगर इस तरह के आदेश जारी किए जाते हैं तो लोगों में अफ़रा-तफ़रा मचना बहुत स्वाभाविक है. मैं चाहता हूं कि सरकार इस पर स्थिति साफ़ करे और ये भी बताए कि इस समय इस तरह के आदेश देने का क्या औचित्य है.''

जम्मू-कश्मीर अपनी पार्टी के अध्यक्ष सैय्यद अल्ताफ़ बुख़ारी ने बीबीसी से फ़ोन पर कहा कि ये बहुत अफ़सोस की बात है कि इस समय इस तरह का ग़ैर-ज़िम्मेदाराना आदेश जारी किया गया है.

अल्ताफ़ बुख़ारी का कहना था, ''हमारे लोग पिछले दो साल से काफ़ी परेशान हैं. मेरा मानना है कि या तो ये बहुत ही ग़ैर-ज़िम्मेदाराना क़दम है या फिर इसके पीछे कोई साज़िश है. मैंने खाद्य विभाग के निदेशक को कहते सुना है कि ये रूटीन मामला है, लेकिन अगर ये सचमुच में रूटीन मामला है तो हर बार हमारे ही लोगों को क्यों परेशान किया जाता है.''

बुख़ारी को बीजेपी का क़रीबी समझा जाता है.

जम्मू-कश्मीर पीपुल्स डेमोक्रेटिक फ़्रंट के चेयरमैन हकीम मोहम्मद यासीन ने भी इस फ़ैसले पर चिंता जताते हुए कहा कि सरकार की कथनी और करनी में साफ़ फ़र्क़ दिख रहा है.

उनका कहना था, ''धारा 370 और 35 ए हटाने के बाद से कई फ़ैसले किए गए हैं. धारा 370 हटाने से ठीक पहले पिछले साल भी ऐसे ही किया गया था. पहले वो मना करते हैं और फिर कहते हैं कि हां हमने किया है.''

दक्षिण कश्मीर के एक नागरिक बिलाल अहमद कहते हैं कि जब से उन्होंने इस आदेश के बारे में सुना है, वो घबराए हुए हैं.

एक और आम नागरिक श्रीनगर के चनपोरा के ख़ुर्शीद अहमद कहते हैं कि एक बार फिर कश्मीरियों को परेशान किया जा रहा है.

वो कहते हैं, ''हमलोग पिछले 30 साल से ये सबकुछ झेल रहे हैं. हमलोग मानसिक तौर पर बहुत परेशान हैं. भारत सरकार जो भी कर रही है वो सिर्फ़ वोट बैंक के कारण कर रही है. कल से फिर इस नए आदेश के बारे में बातचीत हो रही है. आप कह सकते हैं कि हमलोग दिमाग़ी तौर पर बीमार हो गए हैं. पिछले साल उन्होंने धारा 370 के लिए किया. लेकिन इस बार भारत को डर है कि चीन लद्दाख पर क़ब्ज़ा कर लेगा, इसीलिए भारत सरकार ये सब कर रही है.''

भारत-चीन सीमा विवाद का असर?

बीजेपी के प्रवक्ता अल्ताफ़ ठाकुर ने कहा कि भारत-चीन सीमा विवाद के कारण ऐसा हो रहा है.

उनका कहना था, ''जहां तक गंदरबल में स्कूलों का सवाल है, आपको पता है कि लद्दाख में भारत और चीन के बीच तनाव चल रहा है, इसलिए यहां पर सुरक्षाकर्मियों के लिए अस्थाई ट्रांज़िट कैंप बनाए गए हैं. ऐसा इसलिए किया गया है ताकि सुरक्षाकर्मियों की आवाजाही को आसान किया जा सके. एलपीजी स्टॉक करने की जहां तक बात है, ये राष्ट्रीय राजमार्ग पर मौसम को देखते हुए किया गया है. यह एक सामान्य बात है और इसीलिए प्रशासन ने दो महीने का स्टॉक जमा करने के लिए कहा है.''

जब बीजेपी प्रवक्ता से पूछा गया कि राष्ट्रीय राजमार्ग तो जाड़ों में बंद होते हैं, गर्मियों में नहीं तो उनका कहना था कि, ''इस बार भारी मॉनसून का अनुमान है. मैं लोगों से अपील करता हूं कि वो घबराहट में कोई चीज़ न ख़रीदें.''

धारा 370 हटाने के बाद कश्मीर में महीनों तक कर्फ़्यू, धरने, लॉकडाउन, इंटरनेट और टेलिफ़ोन शटडाउन देखे गए थे.

और उसके बाद कोरोना के कारण कश्मीर ने दोबारा लॉकडाउन देखा. अब सबकी निगाहें इस नए आदेश पर टिकी हैं कि इसबार क्या होगा.

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