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कोरोना वायरस: चार महीने के बच्चे के साथ माँ को फ़्लैट से निकाला
- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
कोरोना वायरस के संक्रमण से पूरी दुनिया में डर है. डर संक्रमित हो जाने का.
सरकार ने सोशल डिस्टेंस बनाने को लेकर गाइडलाइन्स जारी की हैं. कोरोना वायरस से मुक़ाबला करने का यह भी एक तरीक़ा है. लेकिन कई मामले अति-सक्रियता के भी हैं. इसमें किसी का डर, दूसरे के लिए मुसीबत बन गया है.
कुछ ऐसा ही हुआ चार महीने के बच्चे की उस माँ के साथ जिसे रातोरात अपना फ्लैट छोड़ना पड़ा क्योंकि वो उस अपार्टमेंट में नई थीं.
ये मामला सूरत के ओलपाड़ी स्ट्रीट स्थित अमर पैलेस अपार्टमेंट का है जहां स्कूल टीचर राधिका गामित कुछ दिनों के लिए रहने आई थीं. उनके साथ उनका चार महीने का बच्चा और पति भी थे.
लेकिन, अपार्टमेंट के लोगों ने कोरोना वायरस फैलने के डर से उन्हें एक रात भी फ्लैट में नहीं रहने दिया.
अपार्टमेंट के अध्यक्ष का कहना था कि वो अनजान लोगों को यहां नहीं रख सकते.
राधिका बताती हैं कि बार-बार अनुरोध करने और पुलिस की अपील के बावजूद भी किसी ने नहीं सुनी. उन्हें और उनके परिवार में किसी को संक्रमण नहीं था. उन्हें रात को अपने चार महीने के बच्चे के साथ फ़्लैट से निकलना पड़ा और एक स्कूल में रात गुज़ारनी पड़ी.
मैटरनिटी लीव से लौटी थीं राधिका
कोरोना वायरस का संक्रमण बढ़ने के साथ ही लोगों में डर भी बढ़ता जा रहा है जिसका नतीजा ये है कि वो हर अनजान को शक की निगाह से देख रहे हैं. इस डर ने धीरे-धीरे सामाजिक कलंक का रूप ले लिया है.
इसी का नतीजा है कि चिकित्सा कर्मियों से लेकर कोरोना वायरस के मरीज़ों के परिजन भी दुर्व्यवहार का सामना कर रहे हैं. इसी संदेह ने राधिका गामित को भी परेशानी में डाल दिया.
गुजरात की रहने वाली राधिका सूरत के उमरा में स्थित एक सरकारी स्कूल में पढ़ाती हैं.
वह छह महीने की मैटरनिटी लीव (मातृत्व अवकाश) पर थीं और तापी ज़िले के व्यारा में अपने घर पर रह रही थीं. उनके पति भी टीचर हैं लेकिन वो दूसरे ज़िले में काम करते हैं.
30 मार्च को राधिका की छुट्टियां ख़त्म हो गईं और वो स्कूल ज्वाइन करने के लिए अपने पति के साथ उमरा पहुंची. क्योंकि 22 तारीख़ से ही देशभर में लॉकडाउन लागू था इसलिए स्कूल में पढ़ाई नहीं हो रही थी.
लेकिन, स्कूल के टीचर्स को ज़रूरतमंद लोगों के लिए फ़ूड पैकेजिंग, राशन बंटवाने और अन्य व्यवस्थाओं की ज़िम्मेदारियां दी जा रही थीं.
राधिका गामित को भी स्कूल में ही रहकर व्यवस्था देखने की ज़िम्मेदारी दी गई. लेकिन, लॉकडाउन के दौरान राधिका के लिए घर ढूंढना एक बड़ी चुनौती थी. उनके पास एक छोटा बच्चा भी था इसलिए वह बहुत ज़्यादा ट्रैवल नहीं कर सकती थीं.
बच्चा होने से पहले वह रोज़ाना व्यारा से सूरत आती थीं जिसमें लगभग दो घंटे का समय लगता था. लेकिन, अब बच्चा होने के कारण वो इतनी दूर आना-जाना नहीं कर सकती थीं. इसलिए उन्हें नज़दीक की कोई कमरा चाहिए था.
सहकर्मी ने की मदद
तब उनकी सहकर्मी जसुबेन ने उनकी मदद की. अमर पैलेस में जसुबेन का एक फ़्लैट खाली था जिसे उन्होंने राधिका को 15 दिनों के लिए दे दिया. इसके लिए उन्होंने राधिका से कोई किराया भी नहीं लिया.
जसुबेन बताती हैं, “राधिका और मैं पहले से एक-दूसरे को जानते हैं. जब वो वापस आई तो यहां ठहरने का कोई ठिकाना नहीं था. अमर पैलेस में मेरा एक फ़्लैट खाली पड़ा था तो मैंने लॉकडाउन तक 15 दिनों के लिए राधिका को रहने के लिए दे दिया. यहां से स्कूल पांच मिनट की दूरी पर ही है. मैंने इंसानियत के नाते ऐसा किया क्योंकि वह लॉकडाउन में घर नहीं ढूंढ सकती थी.”
अब राधिका को लगा कि एक बड़ी समस्या का हल निकल गया लेकिन आगे उनके लिए एक और मुश्किल इंतज़ार कर रही थी.
राधिका बताती हैं कि 31 मार्च को वो फ़्लैट पर पहुंची और सामान रखा और फिर स्कूल चली गईं. स्कूल छह बजे ख़त्म होने बाद जब वो सोसाइटी में लौटीं तो लोग आपत्ति करने लगे. अपार्टमेंट के अध्यक्ष राजू हंसमुखभाई पटेल ने उन्हें फ़्लैट छोड़ने के लिए कहा और जसुबेन को भी फोन करके काफी दबाव बनाया. उनका कहना था कि किसी नए व्यक्ति को फ़्लैट में नहीं रख सकते. इससे कोरोना वायरस फैलने का ख़तरा है. आप किसी से लिखवाकर लाओ.
पुलिस से मांगी मदद
इसके बाद राधिका, उनके पति और जसुबेन के पति पुलिस के पास मदद मांगने गए. पुलिस ने भी अपार्टमेंट के अध्यक्ष को फोन किया और राधिक गामित को रहने देने के लिए कहा.
राधिका गामित बताती हैं, “उस दिन मैं अपने बच्चे को अपने पिता के पास छोड़कर कई घंटे बाहर रही. पुलिस को शिकायत की लेकिन पुलिस के कहने पर भी वो लोग नहीं माने. अपार्टमेंट में वापस आने के बाद राजू पटेल फिर मुझे कमरा खाली करने के लिए बोलने लगे.”
“उनका कहना था "उन्हें यहां पर बाहर का कोई व्यक्ति नहीं चाहिए. अपना सामान लेकर अभी निकल जाओ. बार-बार गार्ड आकर हमें निकलने के लिए कहने लगा. मैंने उनसे अनुरोध किया कि सिर्फ एक रात के लिए ही मुझे यहां रहने दो, रात में बच्चे को लेकर कहां जाऊं, सुबह चली जाऊंगी, लेकिन वो कुछ सुनने को तैयार नहीं थे. मैंने पुलिस को फिर से फोन किया. अपार्टमेंट के अध्यक्ष ने पुलिस का फोन भी नहीं उठाया. जब मैंने अपने फोन से बात कराई तो मुझसे ही झगड़ने लगे.”
आख़िर में हारकर रात 10 बजे राधिका को फ़्लैट छोड़ना ही पड़ा. पुलिस की गाड़ी में उन्हें और उनके सामान को स्कूल पहुंचाया गया. यहां उन्हें, उनके पति और बच्चे को एक समिति की मदद से खाना मिला. उन्हें पूरी रात स्कूल के कमरे में ही बितानी पड़ी.
संक्रमण न होने पर भी निकाला
राधिका कहती हैं, “मेरे परिवार में कोई भी कोरोना वायरस से संक्रमित नहीं है. ना तो हममें ऐसे कोई लक्षण हैं. यहां तक कि व्यारा में भी कोरोना वायरस का केस नहीं आया है. पुलिस ने भी उन्हें यही समझाया लेकिन फिर भी वो नहीं माने. उन्हें अगर निकालना ही था तो दिन में ही बता देते जब मैंने अपना सामान रखा था. मैं कोई और ठिकाना ढ़ूंढ लेती लेकिन रात में बेघर करने का क्या मतलब है.”
इस पूरे घटनाक्रम पर राजू हंसमुख पटेल का कहना है कि वो बिना किसी जानकारी के एक अनजान परिवार को कैसे अपार्टमेंट में रहने देते.
राजू पटेल कहते हैं, “कोरोना वायरस को लेकर गंभीर हालात बने हुए हैं. जो लोग जहां हैं, वहीं रहने को बोला जा रहा है. ऐसे में हम एक अनजान परिवार को कैसे रहने देते. फ़्लैट के मालिक ने हमें अपनी दोस्त की पहले से जानकारी नहीं दी थी. यहां रहने वाले दूसरे परिवारों को भी इससे ख़तरा हो सकता था.”
राजू पटेल ने बताया कि उन्हें शुक्रवार को पुलिस ने भी बुलाया था और उन्होंने अपना पक्ष पुलिस के सामने रखा.
वहीं, इस फ़्लैट की मालकिन जसुबेन कहती हैं, “क्या मुझे अपने ही फ़्लैट में किसी को रखने का अधिकार नहीं है? वहां पर मेरे एक और किराएदार रहते हैं. हमें भी सब लोग जानते हैं. मैंनें इंसानियत के नाते राधिका की मदद की. वो अपने छोटे से बच्चे को लेकर कहां घूमती. फिर जब राजू पटेल से मेरी बात हुई तो मैंने उन्हें राधिका के बारे में पूरी जानकारी दे दी. मैंने राधिका को किराए पर नहीं बल्कि कुछ दिनों के लिए मदद के तौर पर रखा था.”
मजबूर को होकर राधिका गामित को अब व्यारा ही लौटना पड़ा है. उन्होंने स्कूल से फिर से छुट्टी ली है और अपने ससुराल में रह रही हैं.
पहले भी आए ऐसे मामले
राधिका का मामला कोई पहला नहीं है.
कोरोना वायरस का डर सामाजिक कलंक का रूप लेता जा रहा है. लोग हर किसी को संदेह की नज़र से देखने लगे हैं.
मुंबई में एक 63 साल के शख़्स की कोविड 19 से मौत होने के बाद उनके परिवार और यहां तक कि सोसाइटी को भी इस सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ा था.
उस सोसाइटी में काम करने वाली मेड को दूसरी सोसाइटी ने अपने यहां काम देने से मना कर दिया. पीड़ित परिवार को 'हेट मैसेजेस' मिलने लगे.
कोरोना वायरस से संक्रमित मरीज़ों का इलाज़ करने वाले डॉक्टर ख़ुद इस भेदभाव को झेल रहे हैं.
डॉक्टर और नर्सों को लोग उनके घरों में आने नहीं दे रहे थे, जिसके बाद सरकार ने ऐसा करने वालों के ख़िलाफ़ सख्त दंडात्मक कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं.
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