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ना सुन पाने के बाद भी सतीश गुजराल बने भारत के चोटी के चित्रकार
- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
अपने जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा सतीश गुजराल ने एक गूँगे शख़्स के रूप में बिताया. जब वो सिर्फ़ आठ साल के थे, उनके सुनने की ताक़त चली गई.
एक दिन पहलगाम में वो शरारती बच्चों के साथ बड़े पत्थरों से भरी एक नदी को पार करने की कोशिश कर रहे थे, तभी वो तेज़ रफ़्तार पानी में बह गए. उनका पैर एक पत्थर के नीचे फंस गया. इस दुर्घटना में उनकी जान तो बच गई लेकिन उन्हें क़रीब एक साल तक बिस्तर पर रहना पड़ा.
धीरे-धीरे उनके सुनने की क्षमता कम होनी शुरू हो गई और एक दिन वो पूरी तरह से बहरे हो गए. उस दिन का वर्णन करते हुए उन्होंने अपनी आत्मकथा 'अ ब्रश विद लाइफ़' में लिखा, "उस दिन अगर मेरी माँ ने मुझे झिंझोड़ कर जगाया नहीं होता तो मुझे पता ही नहीं चलता कि सुबह हो गई है और मेरे घर का आँगन सूरज की रोशनी से नहा उठा है. मेरी आखें एक बिल्कुल शाँत दुनिया में खुली. मैंने अपना मुँह खोल कर कुछ कहने की कोशिश की लेकिन मैं अपनी ही आवाज़ नहीं सुन पाया. मेरी माँ ने मुझे हिलाया और पूरी ताक़त से मेरे कानों में चिल्लाई. मैं सिर्फ़ उनके मुँह को खुलते हुए देखता रहा. मुझे कुछ भी सुनाई नहीं पड़ा."
उस समय तक सतीश उर्दू पढ़ना और लिखना और पंजाबी बोलना सीख चुके थे. उनको दिल्ली के एक मूक और बधिर स्कूल में भेजा गया. वहाँ कुछ दिन पड़ने के बाद उन्हें अंदाज़ा हो गया कि अगर वो वहाँ कुछ और दिन रहे तो उनकी बोलने की ताकत भी जाती रहेगी. उनके पिता उन्हें वहाँ से निकाल कर लाहौर के मेयो स्कूल ऑफ़ आर्ट्स ले गए.
सतीश इस दौरान उर्दू शायरी, उपन्यास और जीवनियाँ पढ़ कर अपने उर्दू के ज्ञान को बढ़ाते गए. मेयो स्कूल से वो मुंबई के जेजे स्कूल ऑफ़ आर्ट्स में पढ़ने आए. सुन पाने की क्षमता न होते हुए भी उन्होंने अपने-आप थोड़ी बहुत अंग्रेज़ी सीखी. अंग्रेजी शब्दों की आवाज़ के सुने बिना ही उन्होंने कुछ महीनों में अंग्रेज़ी बोलनी सीख ली. विभाजन के कुछ सालों बाद उन्हें मेक्सिको में चित्रकला सीखने की स्कॉलरशिप मिली. उनके कला जीवन का सबसे बड़ा क्षण तब आया जब उनके बनाए गए लाला लाजपत राय के चित्र को संसद के केंद्रीय हॉल में लगाया गया.
इंदिरा गांधी का तैल चित्र
उनके बड़े भाई भारत के पूर्व प्रधानमंत्री इंदर कुमार गुजराल ने उनका परिचय जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गाँधी से करवाया. उन्होंने उनके तैल चित्र भी बनाए. बाद में इसका ज़िक्र करते हुए सतीश गुजराल ने अपनी आत्मकथा में लिखा, "जब इंदिरा का चित्र पूरा हो गया तो मैंने अपने घर में चुनिंदा चित्रकारों, कला आलोचकों और कला प्रेमियों को वो चित्र देखने अपने घर बुलाया. बाद में इंदिरा के पति फ़िरोज़ गांधी के एक दोस्त वरिष्ठ पत्रकार इंदर मल्होत्रा ने मुझे बताया कि फिरोज़ ने उनसे कहा ता कि मैं एक ऐसी महिला की तस्वीर बना कर अपना समय क्यों बर्बाद कर रहा हूँ जिसकी सिर्फ़ एक ख़ासियत है कि वो प्रधानमंत्री की बेटी है. अगले दिन मशहूर कला इतिहासकार चार्ल्स फ़ाबरी ने स्टेट्समैन अख़बार में उस चित्र की आलोचना करते हुए लिखा कि गुजराल इंदिरा गाँधी की शख़्सियत के निचोड़ को चित्रित करने में असफल रहे."
बाद में जब नेहरू ने इंदिरा के उस चित्र को देखने की इच्छा प्रकट की तो इंदर मल्होत्रा नें बहुत कोशिश की कि वो इस चित्र को न देखें. कारण पूछने पर इंदर ने उनसे कहा, "बहुत से लोग समझते हैं कि इस चित्र में इंदिरा को एक दृढ़ महिला के रूप में दिखाया गया है जिससे आभास मिलता है कि उन्हें दूसरों को तकलीफ़ में देख कर खुशी मिलती है."
नेहरू ने जवाब दिया, "ये इंदिरा गाँधी का बिल्कुल सही चित्रण है."
सतीश गुजराल का इंदिरा गांधी का बनाया गया वो चित्र अभी भी इलाहाबाद के आनंद भवन में लगा हुआ है. गुजराल ने अपने चित्रों में जिस संवेदनशीलता के साथ विभाजन की विभीषिका को चित्रित किया, वो अतुलनीय है.
बेल्जियम दूतावास को किया डिज़ाइन
सतीश गुजराल के करियर का सबसे बड़ा ब्रेक तब आया जब उन्होंने दिल्ली में बेल्जियम के दूतावास को न सिर्फ़ डिज़ाइन किया बल्कि अपनी देखरेख में बनवाया भी. इंटरनेशनल फ़ोरम ऑफ़ आर्किटेक्चर्स ने इसे बीसवीं सदी के सर्वश्रेष्ठ हज़ार भवनों में जगह दी है. बाद में उन्होंने सऊदी अरब के शाह फ़ैसल का फ़ार्म हाउज़, बहरीन के प्रधानमंत्री का निवास, काठमांडू में भारत का दूतावास और गोवा विश्वविद्यालय का भवन और लखनऊ का अंबेदकर स्मारक भी डिज़ाइन किया.
भारत सरकार ने गुजराल को 1999 में भारत के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया.
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