कोरोना वायरस की मार से चरमराया मेडिकल कारोबार

    • Author, प्रभाकर मणि तिवारी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित

"ढाका में डाक्टरों ने 10 लाख का खर्च बताया था. लेकिन कोलकाता में हमें चार लाख का पैकेज मिला था. इसी महीने मेरी पत्नी का ऑपरेशन होना था. लेकिन कोरोना वायरस की वजह से वीज़ा निलंबित होने के कारण और हमें मजबूरन वापस जाना पड़ रहा है. अब पता नहीं क्या होगा?"

चटगांव के रहने वाले जलालुद्दीन अपनी पत्नी के इलाज के सिलसिले में सात मार्च को कोलकाता आए थे.

लेकिन सरकार की ओर से वीज़ा स्थगित करने और कोलकाता-ढाका के बीच बस, ट्रेन सेवाएं रोकने के फ़ैसले की वजह से इलाज और ख़रीददारी के लिए आने वाले हज़ारों बांग्लादेशियों की तरह वह भी अपने वतन लौट चुके हैं.

जलालुद्दीन भी उन हज़ारों लोगों में से एक हैं जो हर महीने सीमा पार करके कम खर्च में बेहतर इलाज के लिए कोलकाता पहुंचते हैं.

सीमा पार से आने वाले ऐसे लोगों ने कोलकाता को मेडिकल टूरिज़म यानी चिकित्सा पर्यटन का प्रमुख केंद्र बना दिया है.

बांग्लादेश से इलाज और साथ ही ख़रीदारी करने वाले लोग हर महीने काफ़ी पैसे खर्च करते हैं.

लेकिन कोरोना की वजह से सीमा पार से लगी पाबंदी इस उद्योग पर भारी पड़ रही है.

इसका असर अस्पतालों, होटलों/गेस्ट हाउसों और न्यू मार्केट जैसे मध्य कोलकाता के मशहूर बाजारों पर साफ़ नज़र आने लगा है.

भारी नुक़सान

बांग्लादेश से रोज़ाना सैकड़ों मरीज़ इलाज के लिए कोलकाता के विभिन्न निजी अस्पतालों में पहुंचते हैं.

लेकिन इस सप्ताह सीमा सील होने और ट्रेनों, बसों, उड़ानों के बंद होने से बांग्लादेश से लोगों का आना अचानक थम गया है.

नतीजतन जहां तमाम निजी अस्पतालों के आउटडोर में सन्नाटा है, वहीं होटल और गेस्ट हाउस भी खाली पड़े हैं.

बांग्लादेश से पेट्रापोल सीमा या उड़ानों के ज़रिए यहां पहुंचने वाले लोग इलाज और ख़रीददारी पर भारी रक़म खर्च करते हैं.

कोलकाता के एएमआरआई अस्पताल में हर महीने बारह सौ बांग्लादेशी मरीज आते थे.

वहीं, आर.एन. टैगोर इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट आफ कार्डियक साइंसेज में ओपीडी में मरीज़ों की तादाद 30 फ़ीसदी घटी है.

अस्पताल के क्षेत्रीय निदेशक आर.वेंकटेश कहते हैं, "हमारे अस्पताल में रोजाना लगभग दो सौ से ज्यादा बांग्लादेशी मरीज़ आते थे."

वहीं, पीयरलेस अस्पताल में रोजाना सौ बांग्लादेशी मरीज़ पहुंचते थे.

अस्पताल के एक जनसंपर्क अधिकारी सौमेन गुहा बताते हैं, "कोरोना के चलते लगी पाबंदियों के बाद अब सीमा पार से मरीज़ नहीं आ रहे हैं."

महानगर में घोष दस्तीदार इंस्टिट्यूट फार फर्टिलिटी रिसर्च नामक आईवीएफ क्लीनिक चलाने वाले डा. सुदर्शन घोष दस्तीदार बताते हैं, "मेरे क्लीनिक में हर महीने कम से कम 25 दंपती बांझपन के इलाज के लिए आते थे. लेकिन अब उनका आना बंद हो गया है."

दस्तीदार बताते हैं कि इलाज के लिए कोलकाता आने वाले बांग्लादेशियों की तादाद काफ़ी कम हो गई है. नए लोग नहीं आ रहे. ऐसे कुछ पुराने मरीज ही बचे हैं जिनका कोई गंभीर ऑपरेशन हुआ है.

एक सवाल पर वह बताते हैं, "कोलकाता के बड़े निजी अस्पतालों में ओपीडी में पहुंचने वाले लोगों में औसतन 35 से 40 फ़ीसदी बांग्लादेशी मरीज़ ही होते हैं."

अस्पतालों- होटलों को झटका

कोलकाता के 16 बड़े निजी अस्पतालों के संगठन एसोसिएशन आफ हॉस्पिटल्स आफ ईस्टर्न इंडिया (एएचईआई) के एक प्रवक्ता आँकड़ों के हवाले बताते हैं, "बांग्लादेशी मरीज हर महीने लगभग तीन सौ करोड़ रुपए इलाज पर खर्च करते हैं." यानी सीमा पार से ऐसे मरीजों के नहीं आने की स्थिति में अस्पतालों को इतनी रक़म का नुक़सान झेलना होगा."

महानगर के सदर स्ट्रीट और मार्कस स्ट्रीट इलाक़े में बने दर्जनों होटल बांग्लादेशियों और विदेशी पर्यटकों के पसंदीदा ठिकाने रहे हैं. दर्जनों होटल बांग्लादेश से आने वाले इन मरीज़ों और उनके परिजनों के सहारे गुलज़ार रहते थे.

लेकिन अब उनमें 90 फ़ीसदी कमरे ख़ाली पड़े हैं.

एक होटल के प्रबंधक दिनेश बागची कहते हैं, "मार्च के पहले सप्ताह तक रोज़ाना हमारा औसतन टर्नओवर एक लाख रुपए था जो अब मुश्किल से पाँच हज़ार रुपए रह गए हैं. हमने खर्चों में कटौती की है और कई कर्मचारियों को घर भेज दिया है."

बांग्लदेशियों में लोकप्रिय एक अन्य होटल के मैनेजर सुविमल सेन बताते हैं, "हमारे होटल के 60 कमरों में से ज्यादातर खाली पड़े हैं जबकि मार्च के पहले सप्ताह तक तमाम कमरे बुक थे. हमारे लिए खर्च चलाना भी भारी पड़ रहा है." वह कहते हैं कि यही स्थिति बनी रही तो कारोबार समेटना पड़ सकता है."

होटल एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन आफ ईस्टर्न इंडिया के सचिव सुदेश पोद्दार बताते हैं, "न्यू मार्केट इलाके में स्थित होटलों में 90 फ़ीसदी कमरे ख़ाली हैं. बांग्लादेशी नागरिकों की आवक ठप होने से हर महीने 15 से 20 करोड़ के नुक़सान का अंदेशा है."

खो गई बाज़ारों की रौनक

बांग्लादेश से हर महीने यहां आने वाले मरीज़ों की बढ़ती तादाद और उनसे डॉलर में होने वाली कमाई को ध्यान में रखते हुए महानगर के ज्यादातर बड़े अस्पतालों ने ढाका में अपने दफ्तर खोल दिए हैं जहां मरीज़ों को इलाज, खर्च और रहने-खाने के बारे में तमाम जानकारियां मुहैया कराई जाती हैं.

इसके अलावा बांग्लादेशी मरीजों की सहूलियत के लिए तमाम अस्पतालो में सिंगल विंडो की तर्ज पर बाकायदा अलग विभाग खोले गए हैं.

ऐसे ही एक कॉरपोरेट अस्पताल के रिलेशनशिप मैनेजर सुब्रत बागची बताते हैं, "हमारे अस्पताल में रोज़ाना कम से कम दो सौ बांग्लादेशी मरीज़ आते थे. लेकिन बीते एक सप्ताह से यह तादाद लगभग शून्य पर पहुंच गई है. सिर्फ पहले से अस्पताल में दाखिल कुछ मरीज ही बचे हैं."

एक अन्य अस्पताल के मैनेजर मोहन सान्याल बताते हैं, "हमारे अस्पताल में रोजाना आउटडोर में आने वाले मरीजों में से 40 फ़ीसदी बांग्लादेशी होते थे. लेकिन अब कोरोना के चलते लगी पाबंदियो के चलते इनका आना बंद हो गया है. यह सिलसिला लंबा खिंचा तो अस्पतालों को भारी नुकसान का अंदेशा है."

बांग्लादेशियों के वापसी के चलते महानगर के कई प्रमुख बाजारों की रौनक भी फीकी हो गई है.

अकेले धर्मतल्ला इलाके के न्यू मार्केट में रोजाना पहुंचने वाले 50 हज़ार ख़रीददारों में से 20 हजार बांग्लादेशी होते थे.

एस. एस. हाग मार्केट (न्यू मार्केट) ट्रेडर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अशोक गुप्ता बताते हैं, "बीते दो दशकों से यह बाजार बांग्लादेशी पर्यटकों पर ही टिका हुआ था. रोजाना यहां पहुंचने वाले ख़रीदारों में 40 फ़ीसदी वही लोग होते थे. ईद और दूसरे त्योहारों के मौके पर उनकी तादाद दोगुनी हो जाती थी. लेकिन अब यहां सन्नाटे का आलम है."

गुप्ता के मुताबिक, "न्यू मार्केट के दैनिक टर्नओवर में बांग्लादेशी खरीदारों का हिस्सा चार करोड़ का होता था."

कोलकाता में चिकित्सा पर्यटन की तस्वीर बीते लगभग एक दशक के दौरान तेजी से बदली है.

15 साल पहले तक महानगर में गिने-चुने निजी अस्पताल थे.

लेकिन उसके बाद सरकार की ओर से सस्ती दर पर ज़मीन और दूसरी सुविधाएं मुहैया कराने की वजह से अब महानगर के पूर्वी छोर पर कॉरपोरेट अस्पतालों की बाढ़ आ गई है.

इनमें टाटा कैंसर संस्थान से लेकर दूसरे तमाम अस्पताल शामिल हैं.

कोलकाता से ढाका के क़रीब होने और इन दोनों शहरों के बीच ट्रेन और बस जैसी आवाजाही की सुविधाओं के सस्ती होने की वजह से इस दौरान यह महानगर बांग्लादेशी मरीजों के सबसे पसंदीदा ठिकाने के तौर पर उभरा है.

मेडिकल टूरिजम के कारोबार से जुड़े सब्यसाची मुखर्जी बताते हैं, "कोलकाता हर हाल में सीमा पार से आने वाले मरीज़ों के लिए मुफीद है. यह नजदीक तो है ही, आम के आम और गुठली के दाम की तर्ज पर यहां उनको कम खर्च में बेहतर इलाज की सुविधा भी मिलती है और साथ ही ख़रीददारी भी अपेक्षाकृत कम पैसों में हो जाती है. बांग्लादेश में बेहतर इलाज की सुविधा नहीं मिल पाती. इसके अलावा वहां इलाज महंगा भी है."

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