कोरोना वायरस: बिहार में अब तक कोई मामला क्यों नहीं?

    • Author, नीरज प्रियदर्शी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, पटना से
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

भारत में कोरोना वायरस से संक्रमण के सबसे ज़्यादा मामले महाराष्ट्र से आए हैं. महाराष्ट्र में कोरोना वायरस से 42 लोगों में संक्रमण की पुष्टि हुई है. केरल में 19, उत्तर प्रदेश में 16 और कर्नाटक में 11 मामलों की पुष्टि हुई है.

बिहार देश का तीसरा सबसे बड़ी आबादी वाला राज्य है लेकिन यहां अब तक एक भी कोराना वायरस से संक्रमण का मामला सामने नहीं आया है.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कोरोना वायरस अभी बिहार नहीं पहुंचा है? कई लोग इस पर हैरानी जता रहे हैं.

बिहार के जाने-माने डॉक्टर अरुण शाह ने चमकी बुखार (एइएस संक्रमण) पर ख़ूब काम किया है.

वो कहते हैं, "यह आश्चर्य इसलिए है क्योंकि यहां लोग उपेक्षा कर रहे हैं. आमजन में डर है. मगर सिस्टम लाचार और बदहाल है. केवल स्कूल-कॉलेज बंद करना, आयोजनों को रद्द करना ही एहतियात नहीं हैं. सबसे ज़रूरी है इस वायरस को डीटेक्ट करना. बिहार में डायग्नोसिस की यह प्रक्रिया हो ही नहीं पा रही है."

डॉ शाह बिहार में कोरोना के संदिग्ध मरीज़ों की पहचान और उनके टेस्ट की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हैं.

वो कहते हैं, "सबसे पहले तो बिहार में कोर्इ लैब नहीं है, जहां यह जांच हो सके. सारे ज़िलों से लिए गए जांच के सैंपल्स पटना में एक जगह एकत्र किए जाते हैं, फ़िर इन्हें कोलकाता जांच के लिए भेजा जाता है. वहां से रिपोर्ट आती है. यह एक लंबी प्रक्रिया है. ऐसे में सवाल है कि सैंपल्स की क्वालिटी क्या वैसी ही रह पाती है जैसी रहनी चाहिए थी!"

बिहार सरकार के स्वास्थ्य विभाग के ताजा आँकड़ों के मुताबिक़ अब तक जांच कराए गए सभी 70 संदिग्ध मरीज़ों के सैंपल्स निगेटिव आए हैं. लेकिन पीएमसीएच में जिस कॉटेज वॉर्ड में कोरोना के संदिग्धों को रखा गया है, वहां पहुंचने का रास्ता गंदगी से भरा और दुर्गंध वाला है.

रास्ते पर नाली का पानी बह रहा था. मरीज़ तो मरीज़, डॉक्टर और नर्सें भी इसी रास्ते को पार कर जाने को विवश हैं.

कॉटेज वॉर्ड के ऊपरी तले पर कोरोना के संदिग्ध मरीज़ रखे गए हैं. वॉर्ड के नीचे कुछ सुरक्षाकर्मी मिले जिन्होंने अंदर जाने से यह कहते हुए रोक दिया कि मरीज़, डॉक्टर-नर्स और परिजनों के अलावा किसी को ऊपर जाने की अनुमति नहीं है.

सुरक्षाकर्मियों से बातचीत में ये भी पता चला कि बीती रात वॉर्ड से एक संदिग्ध मरीज़ भाग गया था. इसलिए सुरक्षा ज़्यादा चाक चौबंद कर दी गई है.

वॉर्ड के अंदर का हाल

पटना के मंदिरी की रहने वाले वालीं ऊषा यहां भर्ती अपने भाई से मिलकर आई थीं.

उन्होंने बताया, "कोई व्यवस्था नहीं है. जानवरों से भी ख़राब हाल में मरीज़ों को रखा गया है. उन लोगों को भी रखा गया है जिन्हें कोई बीमारी नहीं है और काफ़ी पहले उनका टेस्ट रिपोर्ट निगेटिव आ चुका है. डॉक्टर, नर्स और कर्मचारी मरीज़ों के साथ अछूतों सा व्यवहार कर रहे हैं."

ऊषा ने बताया कि उनके भाई अनिल को बीते शनिवार को ही भर्ती कराया गया था. उसी दिन सैंपल्स लिए गए. लेकिन तीन दिन बाद भी टेस्ट का रिज़ल्ट नहीं आया. कोरोना वॉर्ड के नीचे कुछ और ऐसे ही परिजन‌ मिले जिनके संदिग्ध मरीज़ों के टेस्ट का नतीजा अब तक नहीं आया है.

इसी बीच पीएमसीएच के आइसोलेशन वॉर्ड में भर्ती जमुई के रहने वाले मनीष कुमार मिश्रा ने बताया, "दिल्ली में रहकर काम करता हूं. पटना एयरपोर्ट से ‌संदिग्ध के तौर पर लाए गया हूं और शनिवार से पीएमसीएच में भर्ती हूं. लेकिन टेस्ट का रिज़ल्ट अभी तक नहीं आया है."

दुबई से लौटे समस्तीपुर के रहने वाले विनोद कुमार चौधरी को भी पीएमसीएच के कोरोना वॉर्ड में रखा गया है. उन्हें भी चौथे दिन तक टेस्ट रिज़ल्ट नहीं मिला था.

संदिग्ध मरीज़ों की शिकायतें एक जैसी थी. "न खाना समय पर मिलता है, न पानी. अगर कोई कुछ देने भी आता है तो बाहर रख कर चला जाता है. कोई सीधे मुँह बात नहीं करता. शुरू के 48 घंटे तक तो कुछ भी खाने को नहीं दिया गया. बहुत हंगामा करने पर अगले दिन रात में खाना आया. जब से भर्ती हैं तब से एक ही बेडशीट है, एक ही कपड़ा."

कोरोना वॉर्ड में अभी तक 13 संदिग्ध भर्ती किए जा चुके हैं.

वैसे तो वहां इटली से लौटे रांची के सिटी एसपी मनीष कुमार और उनकी पत्नी को भी रखा गया है. हालांकि मनीष कुमार के मुताबिक़ उनका कमरा अन्य मरीज़ों से अलग है और उनके लिए ख़ास तौर पर आदमी रखे गए हैं.

कितने समय‌ में हो जानी चाहिए कोरोना की जांच?

मरीज़ों में कोरोना वायरस के‌ संक्रमण की पुष्टि के लिए पांच तरह के सैंपल्स लिए जाते हैं.

स्वाब, नेजल एस्पिरेट, ट्रेशल एस्पिरेट, सप्टम और ब्लड.

डॉ शाह बताते हैं, "इनमें से कुछ सैंपल्स ऐसे हैं जिनका टेस्ट छह घंटे के अंदर नहीं किया गया तो रिज़ल्ट की क्वालिटी में फ़र्क आ सकता है.''

यही वजह है कि डॉ शाह बिहार में कोरोना की जांच की प्रक्रिया को नाकाम मानते हैं क्योंकि सैंपल्स को भेजने और रिपोर्ट मिलने में काफ़ी समय लग‌ जा रहा है.

उनका मानना है कि अगर सैंपल्स की क्वालिटी में फ़र्क आएगा तो स्वाभाविक है कि रिज़ल्ट निगेटिव आएंगे.

लेकिन सैंपल भेजने में ही लग जाते हैं 12 घंटे!

जांच की पूरी प्रक्रिया को लेकर पीएमसीएच के सूपरिटेंडेंट बिमल कुमार ने कई बातें बताईं.

कारक बताते हैं, "हमलोग केवल सैंपल्स कलेक्ट कर सकते हैं. उसका टेस्ट नहीं कर सकते. हमारे पास जितने भी‌‌ संदिग्ध मरीज़ आते हैं उनका सैंपल लेकर आरएमआरआई को भेज देते हैं. वहां ‌से पहले पुणे भेजा जाता था, लेकिन अब कोलकाता में भी लैब सेटअप हो जाने से नजदीक होने के कारण वहीं सैंपल्स भेजे ‌जा रहे हैं."

यह पूछने पर कि इस पूरी प्रक्रिया में कितना वक़्त लगता है? और क्या इतने वक़्त तक सैंपल्स की क्वालिटी मेंटेन रह पाती है?

कारक कहते हैं, "आपको नहीं समझ में आ रहा है कि कोलकाता भेजने और मंगाने में कितना समय लग सकता है? मानकर चलिए कि कम से कम 12 घंटे तो लग ही जाते हैं."

सैंपलों की क्वालिटी को लेकर उन्होंने कहा, "हमारा काम सिर्फ़ सैंपल कलेक्ट करके आरएमआरआई को देना है. बाक़ी का काम वही करती है."

लेकिन अगर 12 घंटे में भी सैंपल जांच के लिए कोलकाता पहुंच जा रहे हैं तो टेस्ट की रिपोर्ट आने में तीन से चार दिन का वक़्त क्यों लग रहा है?

बिमल इसके जवाब में कहते हैं, "ये तो आपको कोलकाता के लैब सेंटर से और आरएमआरआई से पूछना चाहिए. हम आपको सिर्फ़ इतना बता सकते हैं कि हमारे यहां भेजे गए सभी सैंपलों की रिपोर्ट निगेटिव आई है."

केवल विदेश से ही आए लोग संदिग्ध क्यों?

कोरोना के संदिग्धों की पहचान का प्रमुख पैमाना है कि "मरीज़ विदेश से या विदेश से आए किसी व्यक्ति के संपर्क में तो नहीं आया."

इसलिए यहां के एयरपोर्ट और राज्य की सीमाओं पर‌ विदेश से आ रहे लोगों की आवाजाही रोक दी गई है. जो आ रहे हैं उन्हें संदिग्ध माना जा रहा है.

डॉ शाह संदिग्धों की पहचान करने के इस पैमाने पर भी सवाल उठाते हैं.

वे कहते हैं, "क्या केवल विदेश और बाहर में रहने वाले लोग हवाई जहाज़ से ही आ रहे हैं? और केवल विदेश ही पैमाना क्यों? सभी पड़ोसी राज्यों तक में तो ये आ ही चुका है. आप स्टेशनों और बस‌ अड्डों पर देखिए कितनी भीड़ है. होली के बाद आम तौर पर राज्य से लोगों के जाने की भीड़ रहती है, लेकिन इन दिनों यहां वापस आने की हो गई है. क्या उनके साथ संक्रमण नहीं आ सकता? जब हम इन लोगों की स्क्रीनिंग ही नहीं कर पा रहे तो डायग्नोसिस का सवाल ही कहां है!"

क्या कहते हैं स्वास्थ्य मंत्री?

क्या सरकार कोरोना के ख़तरे को इग्नोर कर रही है? अगर नहीं तो जांच की प्रक्रिया को दुरुस्त क्यों नहीं किया जा रहा है?

बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे कहते हैं, "इग्नोर करने की कोई बात ही नहीं है. केवल हमारे यहां ही नहीं, कई राज्यों में इसकी जांच के लिए लैब नहीं है, वे भी दूसरी जगहों पर ही भेज रहे हैं. मगर हम अपने‌ स्तर से इसके लिए तेज़ प्रयास कर रहे हैं. महीने भर के अंदर राजेंद्र मेमोरियल इंस्टिट्यूट में इसकी जांच की व्यवस्था हो जाएगी."

स्वास्थ्य विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार अभी तक पूरे बिहार में 315 लोगों को संदिग्ध के तौर पर सर्विलांस में रखा गया है.

राज्य सरकार ने बुधवार को सूबे में महामारी एक्ट लागू कर दिया है, जो कि रिपोर्ट्स के मुताबिक इतिहास में पहली बार हुआ है.

एक तरफ़ कोरोना वायरस के आने वाले ख़तरे को देखते हुए बिहार सरकार एहतियातन रोज़ नए-नए‌ क़दम उठा रही है, वहीं दूसरी तरफ़ वह अभी तक अपने यहां कोरोना का एक भी मामला ढूंढने में विफल रही है.

बुधवार को बिहार विधानसभा में मास्क लगा कर पहुंचे नेताओं को देखकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उनसे कहा, "ऐसा करके आप लोग पैनिक मत क्रिएट करिए. इधर कोरोना नहीं है."

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