You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
अलीगढ़: जहां नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ सड़क पर हैं ग़रीब-मज़दूर
- Author, चिंकी सिन्हा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश) से
- प्रकाशित
इस शहर में जहां इंटरनेट ना हो, वहां की गलियों से रास्ते तलाशना, कुछ टेढ़ी खीर है. गूगल मैप के ज़रिए रास्ता ढूंढना तो असंभव ही था. यह अलीगढ़ के पुराने शहर वाला इलाक़ा है जो घुमावदार गलियों से भरी है. आज जहां जानी-मानी जगहें जगमगाते दुनिया के नक़्शों में मिल जाती है, उन नक़्शों में शाह जमाल अनजाना है जैसे वो किसी देश में ही ना हो.
यह समाज से बाहर धकेल दिए गए ग़रीब और संसाधनविहीन लोगों की बस्ती है. यहां बहुत से लोग झुग्गियों में रहते हैं जिनके घरों में कहीं दीवारें नहीं तो कहीं छत नहीं. यह बस्ती किसी आइने के टूटे हुए टुकड़ों जैसी है. आइने के टूटे टुकड़ों में कोई तस्वीर पूरी नहीं दिखती.
उर्दू में शाह जमाल का अर्थ होता है 'ज़्यादा सुंदर'. लेकिन पिछले एक महीने से ज़्यादा समय से यहां औरतें मौसम, सरकार और पुलिस की लाठियों की मार और धमकियों के बावजूद धरने पर बैठी हुई हैं.
उनके आंदोलन को मीडिया में तब तक जगह नहीं मिली, जब तब उन्होंने अपने सिर पर एक तंबू की छाया नहीं टांग ली. फिर जीवनगढ़ और पुराने शहर के अपर कोर्ट इलाक़े के दूसरे ग़रीब और साधनविहीन लोग उनसे आ मिले और 22 फ़रवरी को पुराने शहर के अपर कोर्ट पुलिस स्टेशन के बाहर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया.
उनकी मांग थी कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन उनका अधिकार है. पिछले कई दिनों से बारिश और सर्दी से बचने के पॉलिथिन की चादरें लपेटकर बैठी औरतों को मौसम से बचने के लिए एक शिविर लगाने की ज़रूरत है.
23 फ़रवरी को उस वक़्त तनाव बढ़ गया जब कुछ लोगों ने इन औरतों को बाबरी मंडी इलाक़े के पास जूलूस निकालने से रोका. इन महिलाओं का कहना है जूलूस रोकने वाले हिंदुत्ववादी गुट के लोग थे.
वहीं भीम आर्मी के नेतृत्व में सैकड़ों सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों को शाह जमाल में ईदगाह की ओर जूलूस निकालने से पुलिस और रैपिड एक्शन फ़ोर्स ने रोक दिया. यह प्रदर्शनकारी धरनास्थल की ओर जा रहे थे. इस दौरान गोलियां चली. 25 वर्षीय मोहम्मद तारिक़ को गोली लगी. हालांकि अब उनकी हालत सुधर रही है मगर उस दिन झड़पों में आठ लोग घायल हुए.
तीन अलग-अलग पुलिस थानों में 350 लोगों के ख़िलाफ़ 12 अलग-अलग मामलों में केस दर्ज किए गए. इन लोगों के ख़िलाफ धारा 307 (हत्या के प्रयास) और धारा 153ए (सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाने) के तहत आरोप भी लगाए गए.
एफ़आईआर में 40 लोगों के नाम दर्ज किए गए जिसमें कुछ महिलाएं और कुछ अलीगढ़ विश्वविद्यालय के छात्र शामिल हैं. पहले शाम छह बजे से रात बारह बजे तक इंटरनेट बंद कर दिया गया और बाद में इस समय को बढ़ा दिया गया.
"शाह जमाल में जैसे कोई सरकार ही नहीं"
धरने के 28वें दिन मंगलवार रात पुलिस से इजाज़त मिलने के बाद धरना स्थल पर लाल और सफ़ेद रंग का एक शिविर खड़ा कर दिया गया. पूरी सड़क के एक तरफ़ क़ब्रिस्तान की हरे रंग की दीवार खिंची हुई है.
क़ब्रिस्तान के भीतर 14वीं सदी के सूफ़ी संत शमसुल आफ़रीन शाह जमाल की दरगाह मौजूद है. माना जाता है कि इनकी कृपा से लोगों का पागलपन तक ठीक हो जाता है. कई वर्षों पहले दरगाह से ईदगाह के बीच जंगल हुआ करता था लेकिन धीरे-धीरे उसकी जगह पर बस्तियां बनती गईं.
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफ़ेसर मोहम्मद सज्जाद लिखते हैं, "शाह जमाल विरोध प्रदर्शन की एक ख़ास बात यह है कि यह प्रदर्शन समाज के उच्च वर्ग का नहीं बल्कि अलीगढ़ के श्रमिक वर्ग और दिहाड़ी मज़दूरी करने वाले मुसलमानों का है. शाह जमाल इलाके में ज़्यादातर मज़दूर, रिक्शा खींचने वाले और छोटे व्यापारी रहते हैं जो अलीगढ़ के सामाजिक और आर्थिक जीवन के सबसे निचले पायदान पर आते हैं."
वो आगे कहते हैं कि शाह जमाल में जैसे कोई सरकार ही नहीं है. सरकार के नाम पर बस एक पुलिस थाना है. इसकी तंग गलियों मे कुछ कारखाने हैं जहां ताले और टिन की चादरें बनाई जाती हैं. यहां एक हिंदू श्मशान घाट भी है जिसकी दीवारों पर सुबह शाम चील और गीदड़ बैठे दिखाई देते हैं.
यहां अस्पताल या सरकारी स्कूल नही हैं. ज़्यादातर बच्चे गुज़ारे के लिए इन कारखानों में काम करते हैं. इनमें एक छोटा लड़का भी है जो प्रदर्शनकारियों की मदद करता है. 2018 अपने पिता की मौत के बाद उसने स्कूल छोड़ दिया था और एक दुकान में काम करने लगा था.
उसने कहा, "वो हमें बेघर कर देंगे. मेरी मां यहां आती है. मैं यहां मदद करने आता हूं."
एफ़आईआर से इन लोगों पर ख़तरा बढ़ा
पहली बार विरोध प्रदर्शन नई ईदगाह के भीतर 23 जनवरी को शुरू हुआ था. दो दिन का यह विरोध प्रदर्शन अलीगढ़ शहर के मुफ़्ती मोहम्मद ख़ालिद हमीद के आह्वान पर शुरू हुआ था. लेकिन महीने के अंत तक पड़ोसी इलाकों की महिलाएं आने लगीं और उन्होंने नयी ईदगाह के बाहर की सड़क पर धरना शुरू कर दिया. उन्होंने शाहीन बाग़ की महिलाओं को सड़क पर धरने पर जमे बैठे देखा था.
एक लड़की ने नाम बिना बताए कहा, "इन महिलाओं को लगा कि अगर वो ईदगाह के भीतर धरना देंगी तो उन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया जाएगा."
धरनास्थल पर रात में बाबासाहेब आंबेडकर का एक पोस्टर हवा में फड़फड़ा रहा था और एक महिला माइक्रोफ़ोन पर कह रही थी कि वो नए कानून को उन्हें बेघर करने नहीं देंगी.
धरनास्थल पर तीन पालियों में काम करने वाली 40 लड़कियों में से एक हैं 26 वर्षीय तबस्सुम जो सड़क पर एक पेड़ की ओर इशारा करते हुए कहती है कि उन्होंने यहां मंच नहीं बनाया क्योंकि वो पुलिस का ध्यान स्पीकर की ओर आकर्षित नहीं करना चाहती थीं.
स्थानीय हिंदी अख़बारों में छपे संपादकीय लेखों में इस विरोध प्रदर्शन को 'हिंसक' और 'राजनीति से प्रेरित' क़रार दिया गया है.
रविवार को बिना नाम के लिखी गई एफ़आईआर से इन लोगों पर ख़तरा बढ़ गया है.
दस्तावेज़ जुटाना एक बड़ा मसला
शाह जमाल इलाक़े में क़ब्रिस्तान से सटी एक गली में बुधवार दोपहर को कुछ महिलाएं बैठी मिलीं. उनमें से एक महिला ने अपना नाम बताए बिना कहा, "वे हमें कालकोठरी में डाल देंगे. मैं अपनी बेटियों और नाती पोतों को नहीं मिल पाऊंगी.''
उनमें से एक महिला 65 साल की हैं जो घरों में काम करती हैं. उन्हें इसके बदले उन्हें 600 रुपये और खाना मिलता है. इनमें से अधिकांश औरतों के लिए नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज़ जुटाना एक मसला है. जहां वो रहती हैं उन घरों पर उनकी मिल्कियत नहीं है क्योंकि यह मकान वक्फ़ बोर्ड की दान दी गयी ज़मीन पर बने हैं. बहुत से लोग 30 साल पहले यहां आकर बसे थे.
इनमें से एक 80 वर्षीय लतीफ़ हुसैन अपने घर के बाहर बैठे थे. उनका घर एक झुग्गी है जिसके सामने खुली ज़मीन है, जिसे फटी-पुरानी तारपीन की चादर से ढंका गया है. यहीं उनका परिवार सोता है.
20 वर्षीय अफ़शा कॉलेज की छात्रा हैं और यहीं अपनी दादी के साथ रहती हैं. 28 जनवरी को अफ़शा अपनी दोस्तों के साथ ईदगाह गयी थीं मगर पुलिस ने उन लोगों को वहां से भगा दिया. वहां से वो लोग अदा कॉलोनी गये और वहां दूसरी औरतें उनके साथ जुड़ गईं.
वो कहती हैं, "हम ईदगाह लौटे और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने का फ़ैसला किया. हमने तय किया कि हम किसी राजनीतिक दल को इसे हथियाने नहीं देंगे."
बस्सुम का घर इसी गली में है. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करने के बाद उन्होंने दिल्ली में नौकरी की और पिछले साल अलीगढ़ वापस लौटीं.
दिन में दो-ढाई सौ महिलाएं धरनास्थल पर होती हैं और शाम को 200-300. वो बताती हैं कि वो यही सोती हैं.
शुरुआत में ये महिलाएं बैठने के लिए ईदगाह से नमाज़ के लिए इस्तेमाल होने वाली दरियां लाती थीं. फिर कुछ महिलाएं कंबल और तकिए ले आईं. कुछ स्थानीय लोग इन्हें खाना देते हैं लेकिन यह शाहीन बाग़ जैसा नहीं है जहां लंगर लगाए जाते हैं, उदारवादी लोग और कलाकार आते हैं.
यहां पर लोगों ने 10 दिन पहले ही अपना सोशल मीडिया अकांउट खोला है. यहां महिलाएं रोज़े रखती हैं जैसा रमज़ान के महीने के दौरान होता है.
हम इस इलाके में घूमे. तबस्सुम बताती हैं यह बेहद ग़रीब बस्ती है ज़्यादातर लोगों का गुज़ारा मुश्किल से होता है. शाहीन बाग़ की तरह यहां कवि और जाने-माने लोग और वक्ता नहीं आते. यहां की महिलाएं ही माइक्रोफ़ोन पर बोलती हैं और दुआएं पढ़ती हैं.
पिछले महीने बारिश और सर्दी बढ़ने पर कई बार लोगों को लगा कि प्रशासन उनके विरोध प्रदर्शन को बंद कर देगा. इसके महिलाएं और पुरुष घर-घर जाकर लोगों से धरनास्थल पर प्रदर्शन में शामिल होने की अपील करने लगे ताकि धरना जारी रहे.
जब दिसंबर 15-16 की रात पुलिस ने एएमयू में कार्रवाई की तो शाह जमाल और जमालपुर के लोगों ने बाहर निकलकर सड़कें बंद करके पुलिस से हिरासत में लिए गए छात्रों को रिहा करने की मांग की.
एएमयू की छात्राओं पर भी सवाल
एएमयू की एक छात्रा ने बताया कि अगले दिन जब विश्वविद्यालय के हॉस्टल बंद कर दिए गए तो कुछ लड़कियों ने पड़ोसी इलाकों से संपर्क किया जहां महिलाओं ने हाइवे को बंद कर दिया था. इस छात्रा ने कहा, "हम चाहते हैं कि वो सीएए और एनआरसी पर बात करें."
प्रशासन का कहना है कि एएमयू की छात्राओं ने इन प्रदर्शनकारियों को संगठित किया और उनका पता लगाकर उन्हें ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा.
कोई भी व्यक्ति जो शाह जमाल से नहीं है, वो उनके लिए बाहरी है. उन्हें शक़ है कि पुलिस के जासूस और ख़बरी सब तरफ़ घूम रहे हैं ताकि वो लोगों के नाम पुलिस को बता कर उनके विरोध प्रदर्शन को तोड़ सकें.
वो बाहर से वक्ताओं को बुलाना अब तक टालते रहे हैं क्योंकि वो नहीं चाहते कि किसी वक्ता के भाषण से हिंसा भड़के और पुलिस कार्रवाई हो.
राजनीतिक प्रतिरोध शुरू होता है और दरम्यानी समय में हर जगह अलग-अलग स्थितियों में जीने वाले लोग सोचने लगते हैं कि वो क्या खोने जा रहे हैं या क्या खो चुके हैं. इसी विचार की वजह से ये महिलाएं डटी हुई हैं.
थोड़ी आशा भी है- शिविर की लाल और सफ़ेद रंग की हवा में फड़फड़ाती चादरों की तरह दीवार पर बैठे पंछियों की तरह.
उम्मीद इसलिए भी है क्योंकि उनके प्रयासों का राजनीतीकरण नहीं हुआ है.
एक घर के टूटे हुए आइने के टुकड़ों की छवि मेरे भीतर घर कर गई है. वो आईना आशा, भय और सपनों का ग़वाह है. सच्चाई यह भी है कि वो आईना टूटा हुआ है.
ये भी पढ़ें:
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)