भारत के आइने में हिंदी राष्ट्रवाद की हक़ीक़त: नज़रिया

    • Author, अनिल यादव
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंद के लिए
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 4 मिनट

अमित शाह विरोधियों को सच्चाई दिखाने के शौक़ीन हैं. वो अक्सर कहते हैं, ''हमने सरकार आपका नहीं, भाजपा का एजेंडा लागू करने के लिए बनाई है जिसके लिए पहले ही चुनाव में जनता की रज़ामंदी ली जा चुकी है.''

हिन्दी थोपने के मसले पर गृहमंत्री बनने के बाद पहली बार ख़ुद उनका ऐसी सच्चाई से सामना हुआ है जिसमें सचमुच का करंट है. नतीजे में उन्हें पलटी मार कर, ख़ुद के गुजराती होने की याद करते हुए क्षेत्रीय भाषाओं के सम्मान की बात करनी पड़ रही है.

इससे पहले छह सालों में भाजपा ने गौमाता, जय श्रीराम, सेना, वंदेमातरम जितने राष्ट्रवादी मुद्दे उठाए उनमें संगठन, सत्ता और मीडिया प्रबंधन से प्रायोजित करंट पैदा किया जा रहा था. हिन्दी का मसला शुद्ध भारतीय हक़ीक़त से टकरा गया है.

तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, बंगाल और उत्तर-पूर्व ही नहीं कनार्टक के मुख्यमंत्री येदुरप्पा भी उबाल खा गए हैं.

बात सिर्फ़ इतनी नहीं है कि येदुरप्पा बीजेपी के सबसे आज़ाद मुख्यमंत्री हैं क्योंकि उन्होंने कर्नाटक में जुगाड़ से नई सरकार बनाने में केंद्र से (अ)नैतिक समर्थन के अलावा कोई चीज़ नहीं ली है.

दांव पर उप-राष्ट्रीयता, पहचान और संस्कृतियां लगी हुई हैं जिनके बीच ऐतिहासिक कारणों से मध्यस्थ की भूमिका अंग्रेज़ी तो निभा सकती है लेकिन हिन्दी या कोई अन्य भारतीय भाषा कभी मंज़ूर नहीं होगी.

किसी सरकारी कोशिश से तो यह क़त्तई संभव नहीं है क्योंकि यहां देहात में हर तीस कोस के आगे की जगह परदेस हो जाती है और राज्यों के पुराने नामों पर एक नज़र डालने भर से पता चल जाता है कि एक इंडिया के भीतर सौराष्ट्र, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उत्कल और नगालैंड जैसे कितने देश धड़क रहे हैं.

हिंदी दिवस पर अमित शाह ने पलटी मारने की जगह नापकर भाषण दिया- "आज ज़रुरत है देश की एक भाषा (हिंदी) हो जिससे विदेशी भाषाओं (अंग्रेज़ी) को जगह न मिले."

इससे पहले यह कहते हुए- "अनेक भाषाएं, अनेक बोलियां कई लोगों को लगता है कि देश के लिए बोझ हैं लेकिन वे देश की सबसे बड़ी ताक़त हैं" अपने बचाव के लिए जगह बनाई थी. अब इसी जगह में खड़े होकर वे कह रहे हैं कि उनकी बात का ग़लत अर्थ लगाया जा रहा है.

वह कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाने की कामयाबी के बाद आरएसएस स्टाइल के राष्ट्रवाद की ओर अगला क़दम उठाने के पहले हिन्दी का सुर्रा छोड़कर देश का मिज़ाज भांपने की कोशिश कर रहे थे.

जब कहा जाता है कि सरकार, भाजपा का एजेंडा लागू करने के लिए बनी है, उसका मतलब होता है कि आरएसएस का एजेंडा लागू किया जा रहा है.

आरएसएस भारत की विविधता के उलट 'हिंदी-हिंदू-हिंदुस्थान' का स्वप्न देखता रहा है.

एक ज़माने से 'एक निशान-एक विधान-एक प्रधान' का अरमान पाले हुए है. यहां निशान भगवा ध्वज है, विधान का अर्थ मनुस्मृति जैसा समान क़ानून और प्रधान से मुराद एक राजा जैसे सर्वशक्ति संपन्न व्यक्ति से है.

इसके लिए वह राजनीति से दूर रहने का दिखावा करते हुए भी संविधान की समीक्षा करना चाहता है, बहुदलीय प्रणाली की जगह राष्ट्राध्यक्ष चाहता है. आदिवासियों को बनवासी कहता है ताकि पहले उनकी हिंदू धर्म से भी आदिम पहचान को जंगल के दायरे में समेट दिया जाए फिर राम को जूठे बेर खिलाने वाली शबरी जैसे प्रतीकों से लुभाकर उन पर हिंदू का ठप्पा लगा दिया जाए.

आरएसएस का सपना दरअसल यूरोपियन ढंग का राष्ट्रवाद है जो समान भाषा, संस्कृति और इतिहास के आधार पर बनाया जाना है जो कि यहां अनुपस्थित हैं. हमारे यहां अंग्रेज़ों के आने से पहले एक देश जैसी कोई अवधारणा ही नहीं थी, हर राजा का अपना देश था. अनेकता में एकता पर आधारित अनूठे भारतीय राष्ट्रवाद का विकास ब्रिटिश साम्राज्य की ग़ुलामी से मुक्ति के लिए लड़ते हुए हुआ.

आज़ादी के बाद कुछ संविधान निर्माताओं ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की कोशिश की लेकिन उनका टकराव जीवंत और उग्र उपराष्ट्रीयताओं से हुआ और उन्होंने अपने क़दम वापस खींच लिए क्योंकि विविधताओं का सम्मान करते हुए एकता के सूत्र तलाशने के अलावा कोई रास्ता नहीं था.

सत्ता ज़बरदस्ती की समान भाषा तो बना सकती थी लेकिन समान संस्कृति और इतिहास बनाना उसके बस में नहीं था. इसकी एक मिसाल भीमा कोरेगांव में दिखती है जहां दो सौ साल पहले अंग्रेज़ों के हाथों पेशवा की पराजय ऊंची जाति के मराठों के लिए शर्म का कारण है लेकिन महारों (अछूतों) के लिए गर्व का विषय है.

सत्ताधारी भाजपा ने हिंदी का चुनाव सोच समझ कर किया है. दरअसल वह तात्कालिक तौर पर हिंदीभाषी प्रदेशों में मिली अप्रत्याशित चुनावी जीत को लंबे समय के लिए पुख़्ता करना चाहती है और अपने दीर्घकालिक लक्ष्य हिंदू राष्ट्र की ओर बड़ी छलांग लगाना चाहती है.

आज़ादी के सत्तर सालों में हिंदी रोज़गार, क़ानून, प्रशासन, अकादमी की भाषा नहीं बन पाई लेकिन वह रोज़गार की तलाश में पलायन करने वाले ग़रीब उत्तर भारतीयों के साथ देश भर में ज़रुर फैली है. उसका साहित्य महान हो सकता है लेकिन वह ज़मींन पर ऐसे मजबूर लोगों की भाषा है जो ख़ुद अपने बच्चों को अंग्रेज़ी स्कूलों में पढ़ाकर शक्तिशाली होना चाहते हैं. हिंदू राष्ट्र बनाने वालों को सोचना चाहिए कि ख़ुद को राष्ट्र से कम न समझने वाली ताक़तवर संस्कृतियां देश पर बोझ और 'बीमारु' कहे जाने वाले हिस्सों की भाषा को अपने सिर पर क्यों बिठाएंगी.

( ये लेखक के निजी विचार हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)