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उत्तर प्रदेश: बीजेपी उपचुनावों में सपा-बसपा के अलग होने का फायदा उठा सकेगी?
- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, लखनऊ से, बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल गठबंधन भारतीय जनता पार्टी को अपेक्षित चुनौती नहीं दे पाया.
ऐसे में चुनाव परिणाम के बाद ही गठबंधन के टूट गया और अब उत्तर प्रदेश में विपक्ष पूरी तरह से बिखरा नज़र आ रहा है.
वहीं, लोकसभा चुनाव में बड़ी सफलता के बाद भारतीय जनता पार्टी अब विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनावों को लेकर भी गंभीर दिख रही है. विपक्षी दलों में बीजेपी की तरह की गंभीरता नहीं दिख रही है.
हालांकि बहुजन समाज पार्टी ने पहली बार पूरी तैयारी के साथ उपचुनाव लड़ने की घोषणा की है और पार्टी नेता मायावती ने इस संदर्भ में बैठकें भी शुरू की हैं लेकिन बीजेपी को अकेले चुनौती देने में वो कितनी सक्षम है, ये देखने वाली बात होगी.
जहां तक लोकसभा चुनाव में हुए गठबंधन का सवाल है तो इसका प्रयोग पूरे उत्तर प्रदेश में भले ही बहुत ज़्यादा सफल न रहा हो लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीजेपी और मोदी लहर के बावजूद ये ख़ासा सफल रहा. इस इलाक़े में गठबंधन को लोकसभा में आठ सीटें मिली हैं और कुछ सीटों पर हार-जीत का अंतर बेहद कम रहा.
आने वाले दिनों में यूपी की 11 सीटों पर विधानसभा के उपचुनाव होने हैं. ये सीटें विधायकों के सांसद बनने से खाली हुई हैं और इनमें से ज़्यादातर पर पहले बीजेपी ही काबिज़ थी.
11 में से पांच सीटें पश्चिमी उत्तर प्रदेश की हैं और इसीलिए राजनीतिक दलों की सक्रियता इस इलाक़े में अभी से बढ़ गई है, ख़ासतौर पर भारतीय जनता पार्टी की.
तैयारी में जुटे योगी
जानकारों के मुताबिक, बीजेपी के नए सिरे से सदस्यता अभियान की शुरुआत हो या फिर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ज़िलावार समीक्षा बैठकें, ये सब जिन सीटों पर उपचुनाव होने हैं, उन्हें ध्यान में रखकर ही तैयार किए जा रहे हैं. पिछले दिनों सहारनपुर और मुरादाबाद में मुख्यमंत्री ने समीक्षा बैठकें की थीं.
वरिष्ठ पत्रकार रियाज़ हाशमी कहते हैं, "योगी जी विपक्षी एकता में फूट का फ़ायदा उठाने और उपचुनाव में भी जीत हासिल करने के मक़सद से निकल पड़े हैं."
"पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उन्होंने बड़ी जीत के बाद उपचुनाव की हार का कड़वा स्वाद चखा था. वो इस बार उसकी नौबत क़तई नहीं आने देना चाहते. दूसरे, विपक्षी एकता की शुरुआत भी यहीं से हुई थी और अब उसके ख़ात्मे के बाद के राजनीतिक अनुभव का भी पहला मौक़ा होगा."
पिछले हफ़्ते योगी आदित्यनाथ सहारनपुर और मुरादाबाद में क़ानून-व्यवस्था की समीक्षा के लिए तो गए ही थे लेकिन बीजेपी नेताओं के साथ उन्होंने गंगोह और रामपुर सदर सीटों पर होने वाले उपचुनाव के बारे में भी चर्चा की. इसके अलावा अलीगढ़ की इगलास और फ़िरोज़ाबाद में टूण्डला विधानसभा सीट पर भी उपचुनाव होने हैं.
गंगोह विधानसभा सीट कैराना लोकसभा क्षेत्र के तहत आती है और यहां के बीजेपी विधायक प्रदीप चौधरी अब कैराना से सांसद बन चुके हैं. 2017 में प्रदीप चौधरी ने इस सीट पर कांग्रेस के नोमान मसूद को हराया था जो कि कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष इमरान मसूद के भाई हैं.
बताया जा रहा है कि उपचुनाव में भी इस सीट पर बीजेपी को कांग्रेस से ही टक्कर मिलने वाली है.
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निराशा और हताशा
आम चुनाव के बाद से ही बीजेपी जहां पूरे जोश में है वहीं विपक्षी दलों में बीएसपी के अलावा किसी की सक्रियता नहीं दिख रही है.
इस मुद्दे पर बातचीत के दौरान मेरठ में समाजवादी पार्टी के एक पदाधिकारी का दर्द छलक आया. नाम न छापने की शर्त पर बोले, "पार्टी की इतनी दुर्गति हो गई, मायावती ने गठबंधन तोड़ दिया, तमाम तरह के इल्ज़ाम लगा डाले लेकिन हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष विदेश में छुट्टियां मनाते रहे हैं. मायावती की बातों का जवाब तक ठीक से नहीं दे पाए हैं."
इस इलाक़े में समाजवादी पार्टी के कई नेता ऐसे मिले जो कि पार्टी नेतृत्व की कथित निष्क्रियता को लेकर ख़ुद के राजनीतिक भविष्य को संकट में देख रहे हैं.
मोहम्मद अज़ीम पार्टी में नहीं हैं लेकिन समाजवादी पार्टी के प्रति उनकी हमदर्दी है. कहते हैं, "बहुत मुश्किल लग रहा है कि सपा दोबारा यहां खड़ी हो पाएगी. कार्यकर्ता पूरी तरह से निराश और हताश हो गए हैं. उन्हें लखनऊ से भी कोई समर्थन नहीं मिल रहा है. अल्पसंख्यक वर्ग तेज़ी से बीएसपी की ओर भाग रहा है."
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फायदे की स्थिति में मायावती?
मेरठ में हिन्दुओं के कथित पलायन को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कड़े रुख के बाद बीजेपी के लोगों ने भले ही चुप्पी साध ली हो लेकिन बताया ये भी जा रहा है कि इसके ज़रिए हवा का रुख भांपने की भरपूर कोशिश हुई है.
लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार शरद प्रधान कहते हैं, "ये तो ऐसा मुद्दा है जिस पर बीजेपी अपना एकाधिकार समझती है. अब ख़ुद सत्ता में है तो इसकी वजह से क़ानून-व्यवस्था पर उंगली उठेगी, इसलिए सबको चुप करा दिया गया है. लेकिन जब इसके राजनीतिक लाभ लेने होंगे तो बीजेपी ले लेगी क्योंकि उसे पता है कि इसका इस्तेमाल कब और कैसे करना है."
वहीं इस मुद्दे पर अन्य राजनीतिक दलों ने पूरी तरह से चुप्पी साध रखी है. कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने राज्य में क़ानून-व्यवस्था का मामला उठाते हुए कुछ ट्वीट ज़रूर किए लेकिन उससे आगे ये मामला वहां भी न बढ़ सका.
अक़्सर तमाम मुद्दों को लेकर सड़कों पर उतरने वाली समाजवादी पार्टी फ़िलहाल कहीं भी किसी तरह के आंदोलन के मूड में नहीं दिख रही है.
शरद प्रधान कहते हैं कि गठबंधन तोड़ने के बाद अखिलेश यादव भले ही चुपचाप बैठे हैं लेकिन मायावती एक ख़ास रणनीति के तहत राजनीतिक समीकरण साधने की जुगत में लगी हैं और लगातार लखनऊ में सक्रिय हैं.
वो कहते हैं, "मायावती ख़ुद को अब पुराने दलित-मुस्लिम समीकरण पर केंद्रित कर रही हैं, विशेषकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में. यहां दलितों और मुसलमानों की संख्या भी काफ़ी ज़्यादा है और इस इलाक़े का मुसलमान सपा की तुलना में बसपा पर कहीं ज़्यादा भरोसा भी करता है. और यदि ऐसा हो गया कि मुसलमान एकतरफ़ा बीएसपी की ओर चला गया तो समाजवादी पार्टी का राजनीतिक भविष्य संकट में ही समझिए."
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सपा से दूर हो रहे हैं यादव?
शरद प्रधान ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि समाजवादी पार्टी के आधार वोट बैंक यानी यादव जाति पर अब बीजेपी की भरपूर नज़र है.
शामली में समाजवादी पार्टी के एक कार्यकर्ता नीलेश यादव कहते हैं, "अभी जो सदस्यता अभियान बीजेपी ने चलाया है वो ख़ासतौर पर यादवों के लिए ही चलाया गया है. कई यादव इससे जुड़े भी हैं और व्हाट्सएप के ज़रिए बीजेपी के सदस्य बन रहे हैं. हालांकि ये लोग सदस्य भले ही बन रहे हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि वो समाजवादी पार्टी से दूर चले जाएंगे."
लेकिन जानकारों के मुताबिक़, बड़ी संख्या में सदस्य बनने के बावजूद यादव समाज के ज़्यादातर लोग समाजवादी पार्टी के प्रति निष्ठावान बने रहेंगे, ऐसा समझना भूल होगी.
समाजवादी पार्टी के ही एक नेता 'ऑफ़ द रिकॉर्ड' इस बात को स्वीकार करते हैं कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में यादवों की एक बड़ी संख्या बीजेपी में चली गई है और ये लगातार बढ़ रही है. उनके मुताबिक़, पश्चिम में भी ऐसा होना कोई आश्चर्यजनक नहीं है.
वहीं दूसरी ओर, मेरठ में पिछले दिनों मॉब लिंचिंग के ख़िलाफ़ जुलूस निकालने और उसे हिंसक बनाने के आरोप में जिस बदर अली को गिरफ़्तार किया गया है उससे भी कुछ नए राजनीतिक समीकरण के संकेत मिलते हैं.
बदर अली की गिरफ़्तारी पर समाजवादी पार्टी के नेताओं ने छिटपुट बयान ज़रूर जारी किए लेकिन याकूब क़ुरैशी समेत किसी भी बीएसपी नेता का कोई बयान उस संदर्भ में नहीं आया.
मेरठ में एक मदरसा चलाने वाले मोहम्मद इदरीस कहते हैं, "बदर अली को पुलिस ने गिरफ़्तार भले ही किया है लेकिन वो एनजीओ चलाने वाले व्यक्ति हैं और पुलिस वालों से तो उनकी ख़ुद दोस्ती है. मुसलमानों को पुलिस वालों से कोई दिक़्क़त होती है तो वो बदर अली के ही पास जाते थे और बदर अली उनकी मदद करते थे."
फ़िलहाल पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राजनीतिक गतिविधियों के ठप होने के बावजूद राजनीतिक हलचल बनी हुई है और उपचुनाव की घोषणा के साथ ही गतिविधियों का बढ़ना भी तय है.
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