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ग्रेटर नोएडा हादसा: कौन है असल ज़िम्मेदार, बिल्डर या...
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता दिल्ली
- प्रकाशित
दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में मंगलवार की रात दो इमारतें ढह गईं. अब तक तीन शवों के मलबे से निकाले जाने की आधिकारिक पुष्टि हुई है. अभी कुछ और लोगों के दबे होने की आशंका जताई जा रही है. एनडीआरएफ़, पुलिस और प्रशासन राहत कार्य में जुटे हैं. प्रशासन ने इस मामले में चार बिल्डरों को गिरफ़्तार किया गया है.
शाह बेरी गांव में यह हादसा मंगलवार की रात आठ से साढ़े आठ बजे के क़रीब हुआ. ढहने वाली इमारतों में से एक निर्माणाधीन थी जबकि दूसरी दो साल पहले बनकर तैयार हुई थी.
अब तक क्या पता है
- उत्तर प्रदेश के एडीजीपी प्रशांत कुमार के मुताबिक अब तक मलबे से तीन शव निकाले गए हैं. उनका कहना है कि मलबे में केवल चार और लोग फंसे हो सकते हैं.
- हालांकि स्थानीय लोग पुलिस के इस दावे को ख़ारिज कर रहे हैं. उनका कहना है कि मलबे में अभी भी कई लोग हो सकते हैं.
- मलबे में दबे लोगों के कुछ परिजन वहां विलाप करते हुए देखे गए. इनमें से एक नेहा हैं जिनके रिश्तेदार ध्वस्त इमारत में से एक में रहते थे.
- वहां पास के ही रहने वाले (पड़ोसी) लोगों का कहना है कि उन्होंने बहुत तेज़ आवाज़ सुनी, जैसे कि कोई धमाका हुआ हो.
- पड़ोसी प्रमोद पांडे ने कहा, "चारो ओर धुंआ फैला था. बहुत भगदड़ मची थी. हम फंसे हुए लोगों की मदद को दौड़ते हुए पहुंचे. लेकिन हम कुछ कर पाने में सक्षम नहीं थे. फिर पुलिस आई, लेकिन बहुत देर से.
- घटना स्थल से महज़ 50 मीटर की दूरी पर रहने वाली प्रीति ने बीबीसी को बताया कि इनमें से एक इमारत की बेसमेंट में कई मज़दूर रहते थे. उन्होंने उन मज़दूरों के फंसे होने का अंदेशा जताया.
- प्रशासन का कहना है कि इस हादसे में कुल कितने लोग फंसे हैं, यह राहत कार्यों के ख़त्म होने पर ही पता चल सकेगा.
- दूसरी ओर स्थानीय लोग राहत कार्य की गति को लेकर नाखुश हैं. उनका कहना है कि राहतकर्मियों की संख्या बहुत कम है और जब तक ये लोग फंसे हुए लोगों तक पहुंचेंगे तब तक तो बहुत देर हो चुकी होगी.
ज़िम्मेदारी किसकी?
देश की राजधानी दिल्ली से सटे इस हादसे के बाद संदेह इस बात का है कि ऐसे और भी हादसे हो सकते हैं. कारण अवैध इमारतों का निर्माण ज़ोरों पर है.
प्रशासन ने जाँच के आदेश दे दिए हैं. गौतमबुद्धनगर के ज़िला मजिस्ट्रेट बी एन सिंह ने बीबीसी को बताया कि जाँच की रिपोर्ट 15 दिनों के अंदर आएगी.
इलाक़े में रहने वालों की शिकायत है कि बिल्डिंग बाइलॉज़ का उल्लंघन आम होता जा रहा है.
मंगलवार की घटना के बाद ग़ाज़ियाबाद में अपार्टमेंट के मालिकों के संघ का नेतृत्व करने वाले अलोक कुमार कहते हैं कि उन्हें जिस बात का डर था वही हुआ. उन्होंने कहा, "इस तरह के हादसे और भी हो सकते हैं."
'ख़तरे और भी हैं'
कुमार के अनुसार ग़ैर क़ानूनी इमारतें और नई इमारतों से संबंधित नियमों के उल्लंघन के कारण हादसों का ख़तरा बढ़ गया है.
"जिस गांव में ये हादसा हुआ है और इस तरह के दूसरे गांवों के बारे में डेवेलपमेंट अथॉरिटी कहती है ये उनके क्षेत्र से बाहर का इलाक़ा है. डेवेलपमेंट अथॉरिटी पूरे इलाक़े की होनी चाहिए, लेकिन ये लोग पलड़ा झाड़ लेते हैं."
ग्रेटर नॉएडा डेवेलपमेंट अथॉरिटी से प्रतिक्रिया लेने की तमाम कोशिश नाकाम रही. लेकिन बीएन सिंह के मुताबिक़ जिस गाँव में ये घटना घटी है वो नोटिफ़ाएड गांव था. इसका मतलब ये हुआ कि वहां बनने वाली इमारतों पर बिल्डिंग बाइलॉज़ लागू होते हैं. इमारतों के मालिकों को अथॉरिटी से इजाज़त लेना लाज़मी था. उन्होंने कहा, "इजाज़त ली गयी थी या नहीं ये जाँच में पता चलेगा."
मंगलवार रात के हादसे के बाद आमलोग ये सवाल कर रहे हैं कि इस घटना का ज़िम्मेदार कौन है? इसका जवाब राज्य सरकार देगी. शायद हादसे की जांच के नतीजे में भी इसका जवाब मिले.
फ़िलहाल इस घटना को बिल्डिंग बाइलॉज़ के उल्लंघन की तरह से देखा जा रहा है.
नियमों में कमी कहां
आधुनिक भारत में दो तरह के शहरों का विकास हो रहा है. एक योजनाबद्ध और अधिकृत शहर जिसका उदाहरण नोएडा और ग्रेटर नोएडा में बनने वाली सोसाइटीज़ हैं. इन कॉलोनीज़ के लिए सरकार ने अथॉरिटीज़ बनाई हैं जिनकी स्वीकृति से ही नए प्रोजेक्ट्स लांच किए जाते हैं. इन इलाक़ों में बन रही रिहाइशी और कमर्शियल इमारतों के लिए बिल्डिंग बाइलॉज़ बनाए गए हैं.
देश में जिन दूसरे शहरों का विकास हो रहा है वो अनियोजित, अनधिकृत होते हैं जिनको रेगुलेट करने के लिए कोई सरकारी संस्था या अथॉरिटी नहीं है. सोमवार रात हुई घटना शाह बेरी गांव में हुई.
इलाक़े के लोगों के अनुसार वहां अनियोजित और अनधिकृत प्रोजेक्ट्स बनाए जा रहे हैं. ये अवैध विकास की एक मिसाल बताई जाती है. ढहने वाली इमारतों में से एक निर्माणाधीन थी जबकि दूसरी वाली दो साल पहले बनकर तैयार हुई थी.
विशेषज्ञों के अनुसार बिल्डिंग बाइलॉज़ वो क़ानूनी उपकरण हैं जो इमारतों के कवरेज एरिया, इसकी ऊंचाई और इसको नियंत्रित करने के लिए उपयोग किए जाते हैं. ये सभी नई योजनाओं के लिए अनिवार्य हैं. ये आग, भूकंप, शोर और अन्य ख़तरों से रक्षा करने के लिए बनाए गए हैं.
क्या है सज़ा का प्रावधान
देश में कई ऐसे छोटे शहर, क़स्बे या गांव है जहाँ ये क़ानून नहीं लागू किए जा सके हैं और किसी भी नियामक अथॉरिटी की अनुपस्थिति में ऐसे शहरों का विकास होता जा रहा है.
लेकिन कुमार के अनुसार अधिकृत परियोजनाओं में भी बिल्डिंग बाइलॉज़ का उल्लंघन आम बात है. यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण की वेबसाइट पर छपी एक रिपोर्ट के अनुसार 28 रिहाइशी इमारतों ने पिछले साल बिल्डिंग बाइलॉज़ का उल्लंघन किया है.
इनके ख़िलाफ़ कार्रवाई का सिलसिला जारी है. अथॉरिटी को इन प्रोजेक्ट्स को रोकने, इनके ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई करने या उनको रद्द करने का पूरा अधिकार है.
उत्तर प्रदेश अपार्टमेंट्स एक्ट के तहत बिल्डिंग बाइलॉज़ का उल्लंघन करने वालों को छह साल की सज़ा हो सकती है.
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