जिन्हें मिला कम जनादेश, वो भी बने सीएम-पीएम!

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बीजेपी विधायक दल के नेता बीएस येदियुरप्पा ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद की शपथ ज़रूर ले ली है, लेकिन जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) नेता एचडी कुमारास्वामी ने अभी भी हार नहीं मानी है.

विधानसभा चुनाव में कुमारस्वामी की जेडीएस तीसरे नंबर पर रही है. उनकी पार्टी ने 37 सीटें जीती हैं. 78 सीट जीतने वाली कांग्रेस ने उनको समर्थन दिया है जिसके बल पर वह मुख्यमंत्री बनने का सपना देख रहे हैं. मंगलवार को आए 222 सीटों के परिणामों में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनी.

उसने 104 सीटें जीती हैं, लेकिन सरकार बनाने के लिए उसे भी पूर्ण बहुमत नहीं मिला है. पूर्ण बहुमत न मिलने के बाद भी येदियुरप्पा मुख्यमंत्री बन गए और चुनावों में तीसरे पायदान पर रहने के बाद भी कुमारस्वामी मुख्यमंत्री बनने की उम्मीद लगाए बैठे हैं.

कुमारस्वामी मुख्यमंत्री बनेंगे या नहीं ये तो वक़्त बताएगा, लेकिन भारतीय राजनीति में ऐसा काफ़ी अर्से से होता रहा है कि सदन में कम संख्या होने पर भी कई नेता महत्वपूर्ण पदों पर पहुंचे हैं.

चौधरी चरण सिंह

1977 में जनता पार्टी के नेतृत्व में पहली ग़ैर-कांग्रेसी सरकार बनी. इसके प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई चुने गए थे.

वैचारिक मतभेदों के कारण दो साल बाद देसाई को इस्तीफ़ा देना पड़ा. इसके बाद गठबंधन में शामिल भारतीय लोक दल के नेता चरण सिंह ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली.

उस समय चरण सिंह के पास केवल 64 सांसद थे. जनता पार्टी के बाकी सहयोगियों ने उनका समर्थन करने से इनक़ार कर दिया.

बाद में कांग्रेस ने उन्हें समर्थन करने का वादा किया, लेकिन कोई समर्थन न होने के कारण तीन हफ़्तों के अंदर चरण सिंह को इस्तीफ़ा देना पड़ा.

हालांकि, जनवरी 1980 में जब तक दोबारा चुनाव कराए गए तब तक वह प्रधानमंत्री पद पर रहे.

वी.पी. सिंह

1989 के आम चुनावों में किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला. कांग्रेस को 195 और जनता दल को 142 सीटें मिली थीं.

बीजेपी और वामपंथी पार्टियों के समर्थन से जनता दल के नेता विश्वनाथ प्रताप सिंह ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली.

लेकिन राम मंदिर मुद्दे पर बीजेपी ने उनसे समर्थन वापस ले लिया. एक साल से कम ही समय में वीपी सिंह ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया.

चंद्रशेखर

वीपी सिंह के इस्तीफ़े के बाद जनता दल नेता चंद्रशेखर ने अपने समर्थकों के साथ पार्टी छोड़ दी और समाजवादी जनता पार्टी का गठन किया.

उस समय उनके पास केवल 64 सांसद थे लेकिन कांग्रेस के समर्थन के कारण चंद्रशेखर ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली.

चंद्रशेखर तकरीबन सात महीने प्रधानमंत्री पद पर रहे लेकिन कांग्रेस ने उनसे समर्थन वापस ले लिया और चंद्रशेखर को छह मार्च 1991 को इस्तीफ़ा देना पड़ा.

वाजपेयी, देवगौड़ा और गुजराल

11वीं लोकसभा के लिए 1996 में हुए चुनावों में बीजेपी को 161, कांग्रेस को 140 और राष्ट्रीय मोर्चे को 79 सीटें मिली थीं.

सबसे बड़ी पार्टी के नेता की हैसियत से अटल बिहारी वाजपेयी को तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने प्रधानमंत्री नियुक्त किया.

लेकिन बहुमत साबित न कर पाने के कारण वाजपेयी सरकार केवल 13 दिन में गिर गई. इसके बाद कांग्रेस के समर्थन से संयुक्त मोर्चे की सरकार बनी.

आज कर्नाटक में सरकार बनाने के लिए कोशिश कर रहे कुमारास्वामी के पिता एचडी देवगौड़ा उस समय संयुक्त मोर्चा के नेता की हैसियत से प्रधानमंत्री बने थे.

इससे पहले जनता दल नेता देवगौड़ा कर्नाटक के मुख्यमंत्री रह चुके थे.

लेकिन बाहर से समर्थन कर रही कांग्रेस ने एक बार फिर समर्थन ले लिया और अप्रैल 1997 में देवगौड़ा सरकार गिर गई. वे तकरीबन 10 महीने देश के प्रधानमंत्री पद पर रहे.

इसके बाद संयुक्त मोर्चा ने इंद्र कुमार गुजरात को अपना नेता चुना और कांग्रेस के समर्थन से वे प्रधानमंत्री रहे. गुजराल इस पद पर करीब 11 महीने तक रहे.

कोड़ा निर्दलीय होकर सीएम

ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) से राजनीति शुरू करने वाले मधु कोड़ा पहली बार बीजेपी के टिकट पर विधायक बने थे.

झारखंड की पहली सरकार में मंत्री रहने वाले मधु कोड़ा को 2005 में बीजेपी ने विधानसभा का टिकट देने से इनक़ार कर दिया था लेकिन वह निर्दलीय चुनाव जीत गए.

2005 में एनडीए को 36 और यूपीए को 26 सीटें मिलीं. पहले कांग्रेस-झामुमो गठबंधन के उम्मीदवार शिबू सोरेन मुख्यमंत्री बने जो बहुमत साबित नहीं कर पाए.

इसके बाद बीजेपी समर्थित एनडीए के नेता अर्जुन मुंडा ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और उसमें मधु कोड़ा खनन मंत्री बने.

सितंबर 2006 में कोड़ा और दूसरे निर्दलीय विधायकों ने समर्थन वापस ले लिया और मुंडा सरकार गिर गई.

इसके बाद कोड़ा ने झामुमो, आरजेडी और अन्य दलों के समर्थन से अपनी सरकार बनाई और कांग्रेस ने उसे बाहर से समर्थन दिया.

दो साल बाद झामुमो नेता शिबू सोरेन मुख्यमंत्री पद की मांग करने लगे और झामुमो ने उनसे समर्थन वापस ले लिया.

इसके बाद 2008 में कोड़ा को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा.

एक दिन के सीएम

1996 में उत्तर प्रदेश की 13वीं विधानसभा के चुनाव हुए. 425 सीटों की विधानसभा में बीजेपी को 173, सपा को 108, बसपा को 66 और कांग्रेस को 33 सीटें मिली थीं.

21 फ़रवरी 1998 को राज्यपाल रोमेश भंडारी ने कल्याण सिंह सरकार को बर्ख़ास्त कर कांग्रेस नेता जगदंबिका पाल को रात में मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी.

इसको कल्याण सिंह ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी जिसके बाद कोर्ट ने इस फ़ैसले को असंवैधानिक क़रार दिया और कल्याण सिंह फिर मुख्यमंत्री बने.

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