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GST बनाम फसलों के वाजिब दाम: बीजेपी का नुकसान किसने किया?
- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
गुजरात में बीजेपी को 22 साल बाद भी भले ही सरकार बनाने का मौका मिल गया हो, लेकिन ग्रामीण इलाकों में बीजेपी वोटरों को कम ही लुभा पाई है.
ग्रामीण इलाकों में बीजेपी को मिले वोटों को देखा जाए तो पार्टी को कम ही समर्थन मिला है.
कपास और मूंगफली की सबसे ज्यादा फसल वाले सौराष्ट्र की कुल 48 सीटों में से बीजेपी को 19 और कांग्रेस को 30 सीटें मिली हैं.
चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने कई बार किसानों की आत्महत्या से लेकर कर्ज़ माफी का मुद्दा उठाया था.
कपास और मूंगफली की फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और किसानों की आत्महत्या के मुद्दे जमकर उठाए गए.
वहीं, शहरी वोटों की बात करें तो बीजेपी इनके सहारे सत्ता की सीढ़ियां चढ़ गई. बीजेपी को 72 प्रतिशत की बढ़त शहरी इलाकों से ही मिली है जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में कांग्रेस का ये आंकड़ा 89 प्रतिशत रहा.
जीएसटी का मुद्दा पड़ा फीका?
वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का मसला उठाने में कांग्रेस ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी. राहुल ने जीएसटी को ''गब्बर सिंह टैक्स'' कहा था और व्यापारियों की परेशानी को कई रैलियों में उठाया था.
बीजेपी ने सूरत जिले की 12 सीटों में से 11 अपने नाम कर ली, जहां जीएसटी के फैसले का व्यापारियों ने काफी विरोध किया था.
ऐसे में क्या माना जा सकता है कि जीएसटी का मुद्दा लगभग फीका पड़ गया और एमएसपी से लेकर कर्ज़माफी तक के वादे काम कर गए?
इस संबंध में वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत दयाल कहते हैं, ''बीजेपी की सीटें कम होने के पीछे पाटीदार आरक्षण और फसलों का न्यूनतम मूल्य- ये दो बड़े कारण रहे. इन इलाकों में ज्यादातर पटेल समुदाय के लोग रहते हैं. फिर यहां पाटीदारों के साथ अन्य समुदायों के भी किसान हैं. उन्हें कपास और बाजार का न्यूनतम मूल्य नहीं मिल रहा था और इसे लेकर वो सरकार से नाराजगी जता रहे थे.
- हुआ ये कि जब तक नरेंद्र मोदी गुजरात में सीएम थे तो वो कहते थे कि केंद्र सरकार के कारण एमएसपी में बढ़ोतरी नहीं हो रही. लेकिन, अब कहने के लिए कुछ नहीं था. इसका खामियाजा बीजेपी को भुगतना पड़ा.
- एमएसपी के अलावा भी सरकार का दावा रहा है कि गांवों में 24 घंटे बिजली मिलती है, ये दावा ज़मीनी हकीकत से दूर है. किसानों की दूसरी मांग है कि वो खेतों के लिए पानी चाहते हैं. सरकार का कहना था कि नर्मदा की नहर गांव-गांव तक ले गए लेकिन उप नहर न होने के कारण लोगों को पानी नहीं मिल रहा था. फिर ग्रामीण इलाकों में बेरोजगारी भी लोगों में असंतुष्टि का कारण बनी है. ''
राहुल गांधी ने उठाए थे सही मुद्दे?
अर्थशास्त्र के प्रोफेसर कार्तिके भट्ट बताते हैं, ''गांव में बुनियादी सुविधाओं का बहुत अभाव है. यहां सड़क, अस्पताल और स्कूल नहीं है. इनके लिए लोगों को बहुत दूर जाना पड़ता है. खासकर के साबरकांठा और बनासकांठा में हालत बहुत बुरी है.
- ऐसे में लोगों की नाराजगी इतनी बढ़ गई थी कि उन्हें लगा कि ये पार्टी 22 सालों से सत्ता में है, विकास की बात कर रही है और व्यापारियों का फायदा पहुंचा रही है लेकिन किसानों की हालत खराब है. बीजेपी के नए वादों का असर भी उन पर नहीं हुआ.
- गांवों में फैली इस नाराज़गी को भांपते हुए राहुल गांधी ने कर्ज माफी और किसानों की बदहाली का मुद्दा कई बार रैलियों में उठाया. कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में एमएसपी की समीक्षा करने व उसे बढ़ाने, 16 घंटे बिजली देने और कर्ज माफी करने का वादा किया.''
तो क्या वाकई कांग्रेस की यह रणनीति कामयाब हुई
क्या गुजरात चुनावों में किसानों को बीजेपी का विकल्प कांग्रेस में दिखा?
प्रशांत दयाल कहते हैं, ''कांग्रेस ने सही समय पर मसलों को उठाया तो सही लेकिन लोगों ने कांग्रेस से उम्मीद लगाकर उसे वोट नहीं दिया बल्कि वो एंटी बीजेपी वोट था. लोगों ने बीजेपी से नाराजगी के कारण कांग्रेस को वोट दिया.
- इसका फायदा कांग्रेस को शहर में नहीं हो पाया, क्योंकि वहां सांप्रदायिक मसला ज्यादा हावी रहता है. उन्हें यह बताया गया है कि यहां सुरक्षा बीजेपी के कारण है. अहमदाबाद, बड़ौदा, सूरत जैसे शहरों में मुस्लिमों की संख्या ज्यादा होने के कारण इस रणनीति का फायदा मिलता है.
- लेकिन, शहरी क्षेत्रों में कांग्रेस को एंटी बीजेपी वोट भी नहीं मिले. पार्टी ने जीएसटी को बहुत बड़ा मुद्दा बनाकर इसका प्रचार किया था पर उसका फायदा नहीं दिखा.''
कार्तिके भट्ट कहते हैं, ''गुजरात में जीएसटी का विरोध हुआ लेकिन व्यापारियों ने इसका राजनीतिक फायदा उठाया. उन्होंने चुनावों में सरकार पर दबाव बनाकर कई चीजों की स्लैब कम करा दी. सरकार ने लोगों को भरोसा भी दिया कि अगले कुछ दिनों में हम स्लैब में बदलाव कर देंगे. इस बात को व्यापारी मान गए. वो संतुष्ट थे कि उनकी एक बात तो मान ही ली गई है.''
गुजरात में आगे किसानों के प्रति राजनीतिक दलों के रुख पर कार्तिके भट्ट कहते हैं, ''हम ग्रामीण क्षेत्रों को भूलते जा रहे हैं लेकिन आज उन्होंने अपना महत्व दिखाया है. बीजेपी ही नहीं किसी भी सरकार को गांव की तरफ देखना पड़ेगा. उनके नेता भी मान रहे हैं कि जो जनता हमें 99 पर ला सकती है वो 91 से नीचे भी ले जा सकती है.''
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