You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
सीजेपी के संसद मार्च में मीडिया के ख़िलाफ़ नाराज़गी को लेकर आपस में भिड़े पत्रकार
किसी भी बड़े विरोध प्रदर्शन में मीडिया या पत्रकारों का निशाना बनना अब कोई नई बात नहीं है. पिछले साल नेपाल में जेन ज़ी के विरोध प्रदर्शन में भी यह देखने को मिला था.
नेपाली भाषा के प्रमुख अख़बार कांतिपुर के दफ़्तर में प्रदर्शनकारियों ने आग लगा दी थी. ऐसा ही बांग्लादेश में भी हुआ था. वहां के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार द डेली स्टार के दफ़्तर को आग के हवाले कर दिया गया था.
भारत में 20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी के संसद मार्च में भी मीडिया को लेकर नाराज़गी साफ़ दिखी. दरअसल पिछले कुछ वर्षों में भारत में मीडिया की भूमिका को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं.
एक इम्प्रेशन बना है कि कौन मीडिया घराना सरकार परस्त है और कौन सरकार विरोधी. ऐसे में कहा जाता है कि भारत में मीडिया बहुत ही ध्रुवीकृत हो गया है.
20 जुलाई के विरोध-प्रदर्शन के दौरान चुनिंदा मीडिया घरानों को पत्रकारों के ख़िलाफ़ लोगों ने नाराज़गी जताते हुए नारे लगाए. इसे लेकर सोशल मीडिया पर बहस हो रही है कि प्रदर्शनकारियों का मीडिया को लेकर यह रुख़ कितना सही है.
सोमवार को मीडिया के ख़िलाफ़ नाराज़गी में कुछ वैसे पत्रकार भी रिपोर्टिंग के दौरान निशाने पर आए जिनकी छवि सरकार परस्त वाली नहीं है.
विरोध प्रदर्शन में पत्रकारों के ख़िलाफ़ नाराज़गी का एक वीडियो क्लिप रीपोस्ट करते हुए पत्रकार पूनम पांडे ने एक्स पर लिखा है, ''मीडिया से नाराज़गी हो सकती है लेकिन रिपोर्टर को टारगेट करना सही नहीं है. रिपोर्टर ही है जो ग्राउंड पर उतरता है, तपती धूप हो या बरसात. नाराज़गी सही जगह निकलनी चाहिए.''
इसके जवाब में प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू की डिप्टी एडिटर विजेता सिंह ने लिखा, ''टीवी पर नफ़रत फैलाने वाले एंकरों, प्रेजेंटरों और वरिष्ठ पत्रकारों के साथ टीवी रिपोर्टरों के बीच फ़र्क़ करना ज़रूरी है. टीवी रिपोर्टरों में से अधिकांश काफ़ी मेहनती होते हैं.''
पत्रकारों की आपस में बहस
लेकिन विजेता सिंह की यह बात इंडियन एक्सप्रेस के पूर्व संपादक और द प्रिंट के संस्थापक शेखर गुप्ता को पसंद नहीं आई.
जवाब में शेखर गुप्ता ने लिखा, ''नहीं विजेता, हम यह फ़ैसला भीड़ पर नहीं छोड़ सकते कि किस पत्रकार से प्यार किया जाए और किससे नफ़रत. वरिष्ठ हों या जूनियर, हर पत्रकार को अपना काम करते समय पूरी तरह सुरक्षित महसूस होना चाहिए. एक भीड़ के लिए जो 'अच्छा' पत्रकार है, वही दूसरी भीड़ के लिए 'ख़लनायक' हो सकता है.''
''इस प्रवृत्ति की शुरुआत अन्ना आंदोलन के दौरान हुई थी और उस समय भी कई पक्षधर लोगों ने इसका समर्थन किया था. तब भी यह ग़लत था और आज भी ग़लत है.''
विजेता सिंह की टिप्पणी से अल्ट न्यूज़ के सह-संस्थापक और संपादक प्रतीक सिन्हा सहमत नहीं दिखे. उन्होंने जवाब में एक्स पर लिखा है, ''मेहनती होने का इससे क्या संबंध है? क्या हम यह कह रहे हैं कि उनके बॉस मेहनत नहीं करते? अगर मैं किसी नाज़ी पार्टी के प्रचार तंत्र से जुड़ जाऊँ और वहाँ पूरी मेहनत से काम करूँ, तो क्या सिर्फ़ इसलिए कि फ़ैसले मैं नहीं ले रहा, मुझे आलोचना से बख्श दिया जाना चाहिए? क्या ऐसा ही होता है?''
''एक पुलिस कॉन्स्टेबल भी कड़ी मेहनत करता है. लेकिन जब वह लाठी चलाता है, तो क्या उसे जवाबदेह नहीं ठहराया जाना चाहिए? यह सही है कि युवा पत्रकारों के लिए नौकरी खोजना आसान नहीं है. लेकिन ऐसे भी कई युवा पत्रकार हैं जो भारतीय मुख्यधारा के मीडिया के उस माहौल में काम करना नहीं चुनते, जिसे वे विषाक्त मानते हैं. जो भी किसी भी रूप में एक निरंकुश सरकार का विस्तार बनने का चुनाव करता है, उसे उस फ़ैसले के परिणामों का डर महसूस होना चाहिए और उसे हर रात उसी डर के साथ सोना चाहिए.''
शेखर गुप्ता की दलील से वरिष्ठ पत्रकार अभिसार शर्मा सहमत नहीं हैं. उन्होंने जवाब में लिखा, ''अन्ना आंदोलन के दौरान भी केवल दो तरह के पत्रकारों को निशाना बनाया गया था. एक वह, जिन्हें राडिया का समर्थक कहा जाता था और जिन्होंने न्यूज़क्लिक के ख़िलाफ़ भी घिनौना प्रचार किया था. दूसरे, वह जिन्हें शराबी और सत्ता समर्थक बताते हुए पत्रकार का मुखौटा पहनने वाला कहा जाता था. किसी भी तरह की हिंसा का समर्थन नहीं किया जा सकता. न ज़मीनी रिपोर्टरों के ख़िलाफ़ और न ही एंकरों के ख़िलाफ़.
लेकिन स्वतंत्र पत्रकारों और मीडिया संस्थानों के साथ इस सरकार की कथित नाइंसाफ़ी पर आपकी आलोचना इतनी धीमी क्यों रही है? आप कभी प्रेरणा हुआ करते थे. ऐसा क्या बदल गया? पत्रकारों को वास्तव में निशाना बनाए जाने की घटनाओं पर इतना आक्रोश क्यों नहीं दिखता, शेखर जी?''
ध्रुवीकृत मीडिया
न्यूज़ लॉन्ड्री के सह-संस्थापक अभिनंदन सिकरी ने भी शेखर गुप्ता की इस टिप्पणी की आलोचना की और एक्स पर लिखा, ''आपका यह बयान कई स्तरों पर खामियों से भरा हुआ है और उन्हें ट्विटर पर समेटकर समझाना संभव नहीं है. अगर आप निमंत्रण स्वीकार करें, तो मैं ख़ुशी से इस पर विस्तार से चर्चा करना चाहूंगा.''
अभिनंदन सिकरी ने एक और टिप्पणी में लिखा है, ''जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को बदनाम करने के लिए पहुँचे तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया को ज़रा गौर से देखिए. वहाँ उन गैर-पत्रकारीय गुंडों को भी पहचानिए जो उसी मक़सद से मौजूद हैं. यही उनका स्तर है और यही वह जमात है, जिससे उनका संबंध है.''
लेकिन आज तक की राजनीतिक संपादक मौसमी सिंह ने शेखर गुप्ता की बातों का समर्थन करते हुए लिखा है, ''मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ. मुझे भी सबरीमला आंदोलन और किसानों के विरोध प्रदर्शन के दौरान धमकियों, मारपीट और गाली-गलौज का सामना करना पड़ा था.''
''एक महिला रिपोर्टर, जो दूसरे न्यूज़ नेटवर्क से थीं और राष्ट्रीय राजमार्ग पर आंदोलन की कवरेज कर रही थीं, उनके साथ पुल के नीचे कथित तौर पर छेड़छाड़ की गई और उन्हें खींचा गया. वह नई-नई रिपोर्टिंग शुरू करने वाली पत्रकार थीं और इस घटना से पूरी तरह सहम गई थीं. पत्रकारों के ख़िलाफ़ किसी भी तरह की हिंसा, चाहे वह शारीरिक हो या मौखिक, उसे किसी भी हालत में उचित नहीं ठहराया जा सकता.''
जानी-मानी कॉलमिस्ट और लेखक तवलीन सिंह ने एक्स पर लिखा है, ''भारतीय मीडिया का लगभग 50 वर्षों तक हिस्सा रहने के नाते मैं यह दर्ज कराना चाहती हूँ कि मुझे हमारे तथाकथित 'स्वतंत्र' टीवी चैनलों पर शर्म आती है. उन्हें ख़ुद को दूरदर्शन 2.0 घोषित कर देना चाहिए और अपनी स्वतंत्रता का दावा छोड़ देना चाहिए.''
शॉर्ट पोस्ट के संस्थापक संपादक एबी रवि ने पिछले महीने 28 जून को अंग्रेज़ी पत्रिका ओपन में एक लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने बताया है कि आज के "डॉग-ईट-डॉग" माहौल, शोर-शराबे वाली टीवी पत्रकारिता और सोशल मीडिया की विषाक्त बहसों के कारण चीज़ें बहुत बदली हैं.
एबी रवि ने लिखा था, ''उनका कहना है कि इस बदलाव की एक वजह यह भी रही कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पत्रकारों की मंत्रालयों तक अनौपचारिक पहुँच सीमित कर दी और विदेश यात्राओं में पत्रकारों को साथ ले जाने की परंपरा समाप्त कर दी. आज पत्रकारिता आजीवन पेशा बनने के बजाय राजनीति या जनसंपर्क (पीआर) में जाने का माध्यम बनती जा रही है.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें
BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह
कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.